त्याग की घोषणा से 1,322 करोड़ की कथित ऋण धोखाधड़ी तक: मोदीजी के मुरीद सुभाष चंद्रा फिर सुर्खियों में!

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डॉ रविशंकर कुमार चौधरी

राजनीति और कारोबार की दुनिया में चेहरे कितनी तेजी से बदलते हैं, इसका एक दिलचस्प उदाहरण मीडिया कारोबारी और जी मीडिया समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा हैं। 

कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से उनकी त्याग-तपस्या की प्रशंसा की थी। राज्यसभा सांसद रहते हुए महज एक रुपये मासिक वेतन लेने की उनकी घोषणा को एक आदर्श उदाहरण के रूप में पेश किया गया था लेकिन आज वही सुभाष चंद्रा 1,322 करोड़ रुपये की कथित ऋण धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं।

13 अप्रैल, 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुभाष चंद्रा के त्याग और समर्पण की प्रशंसा करते हुए तालियां बजाई थीं। दरअसल, 24 मार्च 2017 को चंद्रा ने घोषणा की थी कि हरियाणा से राज्यसभा के स्वतंत्र सदस्य के रूप में वह अपने वेतन के तौर पर प्रतिमाह केवल एक रुपया लेंगे और शेष पूरी राशि प्रधानमंत्री राहत कोष में दान कर देंगे। उनकी इस घोषणा को राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में त्याग की मिसाल के तौर पर प्रचारित किया गया था।

लेकिन वक्त का पहिया घूम चुका है। जिस व्यक्ति की सार्वजनिक मंच से प्रशंसा की गई थी, अब उसी के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया है। मामला एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (LICHFL) से जुड़े 1,322 करोड़ रुपये के कथित ऋण घोटाले का है।

आरोप है कि सुभाष चंद्रा ने ऋण हासिल करने के लिए अपनी संपत्ति का मूल्य वास्तविकता से कहीं अधिक बढ़ाकर दिखाया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस की शिकायत के आधार पर पहले ही प्राथमिकी दर्ज की थी। इसी प्राथमिकी को आधार बनाकर ईडी ने धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत जांच शुरू की है।

59 हजार करोड़ की संपत्ति का दावा!

इस मामले का सबसे दिलचस्प पहलू चंद्रा की कथित संपत्ति के मूल्यांकन से जुड़ा है। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस की शिकायत के अनुसार, ऋण हासिल करने के लिए जमा कराए गए एक प्रमाणपत्र में उनकी कुल संपत्ति लगभग 59,000 करोड़ रुपये बताई गई थी। यह प्रमाणपत्र डीजेएम एंड कंपनी ने 28 मार्च, 2018 को जारी किया था।

वहीं, एक अन्य प्रमाणपत्र में उनकी संपत्ति 40,562 करोड़ रुपये बताई गई थी। इसे एमपीजे एंड कंपनी ने 6 जुलाई, 2018 को जारी किया था। आरोप है कि इन प्रमाणपत्रों के आधार पर ऋण मंजूर कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी लेकिन बाद में ऋण का भुगतान नहीं किया गया।

CBI की प्राथमिकी के अनुसार, जिन कंपनियों के माध्यम से ऋण लिया गया, उनमें वसंत सागर प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड, पैन इंडिया इंफ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड, डिजिटल सब्सक्राइबर मैनेजमेंट एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड और स्पिरिट इंफ्रापावर एंड मल्टीवेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।

शिकायत में दो प्रमुख ऋण सुविधाओं का उल्लेख है। पहली 500 करोड़ रुपये की ऋण सुविधा वसंत सागर प्रॉपर्टीज को दी गई थी, जिसमें पैन इंडिया इंफ्रा प्रोजेक्ट्स सह-ऋणकर्ता थी। दूसरी 480 करोड़ रुपये की ऋण सुविधा डिजिटल सब्सक्राइबर मैनेजमेंट एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज को दी गई थी, जिसमें स्पिरिट इंफ्रा पावर एंड मल्टी वेंचर्स सह-ऋणकर्ता थी।

इन दोनों ऋणों की मूल राशि 980 करोड़ रुपये थी, लेकिन ऋण के भुगतान में कथित चूक के कारण एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने 1,322 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा किया है।

40 हजार करोड़ से 31.79 करोड़ तक संपत्ति का हिसाब!

मामले में एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। CBI की प्राथमिकी के अनुसार, दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के तहत चली कार्यवाही के दौरान सुभाष चंद्रा ने पहले प्रस्तुत किए गए संपत्ति प्रमाणपत्रों में दर्शाई गई संपत्ति पर सवाल उठाए। प्राथमिकी में उल्लेख है कि उन्होंने 2024 में अपनी कुल संपत्ति 31.79 करोड़ रुपये बताई थी, जबकि 2017-18 के दौरान उनकी संपत्ति अधिकतम 40,000 करोड़ रुपये बताई गई थी।

आखिर कुछ ही वर्षों में संपत्ति के आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर कैसे आया? क्या ऋण हासिल करने के लिए संपत्ति का मूल्य बढ़ाकर दिखाया गया था? क्या ऋण की राशि का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य से अलग किया गया? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब जांच एजेंसियों को तलाशना है।

मामला केवल ऋण लेने और उसे वापस नहीं करने तक सीमित नहीं है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कंपनियों के अधिकारियों और निदेशकों के साथ मिलीभगत करके ऋणदाता को गुमराह किया गया तथा ऋण की रकम का दुरुपयोग हुआ।

22 हजार करोड़ के दावों के मुकाबले महज 6.5 करोड़!

इस पूरे प्रकरण का एक दूसरा पहलू भी है। सुभाष चंद्रा की निजी संपत्ति से जुड़े दिवाला समाधान की प्रक्रिया में लगभग 22,006 करोड़ रुपये के दावों के मुकाबले लेनदारों को करीब 6.5 करोड़ रुपये मिलने की प्रस्तावित व्यवस्था का मामला सामने आया है। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस सहित कुछ ऋणदाताओं ने इस समाधान योजना का विरोध करते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) का दरवाजा खटखटाया है।

यह स्थिति उन सवालों को और गंभीर बनाती है कि आखिर बड़े कारोबारी ऋणों की वसूली के मामले में आम जनता और वित्तीय संस्थानों के हितों की रक्षा कैसे होगी?

मोदीजी की प्रशंसा और आज की जांच!

यहां सवाल केवल सुभाष चंद्रा पर लगे आरोपों का नहीं है। सवाल उस राजनीतिक संस्कृति का भी है, जिसमें किसी व्यक्ति की सार्वजनिक छवि, उसकी घोषणाओं और मंचों पर मिलने वाली प्रशंसा को उसके चरित्र का प्रमाण मान लिया जाता है।

2017 में एक रुपये वेतन लेने और शेष राशि प्रधानमंत्री राहत कोष में देने की घोषणा ने सुभाष चंद्रा को त्यागी और आदर्श जनप्रतिनिधि के रूप में प्रचारित किया था। प्रधानमंत्री की प्रशंसा ने भी उस छवि को और चमकाया था लेकिन आज 1,322 करोड़ रुपये की कथित ऋण धोखाधड़ी का मामला उस चमकदार छवि के सामने गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

बहरहाल, जांच अभी जारी है। आरोपों की न्यायिक पुष्टि होना बाकी है और सुभाष चंद्रा का पक्ष भी सामने आना चाहिए। लेकिन सार्वजनिक जीवन में एक रुपये वेतन लेने की घोषणा से लेकर हजारों करोड़ की संपत्ति के दावों और फिर कथित ऋण धोखाधड़ी तक का यह सफर निश्चित रूप से कई सवाल छोड़ जाता है।

आखिर त्याग की घोषणाओं और वास्तविक आर्थिक आचरण के बीच की दूरी को कैसे समझा जाए? और क्या किसी व्यक्ति की प्रशंसा करने से पहले उसकी सार्वजनिक छवि के साथ-साथ उसके आर्थिक और कारोबारी व्यवहार की पड़ताल भी जरूरी नहीं होनी चाहिए?

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Author: Bharat Sarathi

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