लूर नृत्य से होगी रत्नावली समारोह की शुरुआत, हरियाणा की विलुप्त होती लोक कला को मिलेगा नया मंच

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कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की पहल से जीवंत होगी हरियाणा की पारंपरिक लूर नृत्य विधा।

कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक 31 अक्टूबर : कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के राज्यस्तरीय रत्नावली समारोह की शुरुआत इस बार पारंपरिक हरियाणवी लूर नृत्य से होगी। हरियाणा की समृद्ध लोकसंस्कृति की पहचान रहे लूर नृत्य को पुनर्जीवित करने और युवा पीढ़ी से जोड़ने के उद्देश्य से युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग की ओर से विशेष पहल की जा रही है।

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में इस लोकनृत्य के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक प्रो. विवेक चावला ने बताया कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय सदैव हरियाणवी लोक संस्कृति के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इसी कड़ी में विलुप्त होती लूर नृत्य परंपरा को फिर से मंच प्रदान किया जाएगा।

लोक सम्पर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया ने बताया कि फागुन के महीने में ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाओं एवं महिलाओं द्वारा लूर नृत्य करने की परंपरा रही है। इसमें महिलाएं और बालिकाएं दो समूहों में बंटकर वर एवं वधू पक्ष के रूप में नृत्य के माध्यम से सवाल-जवाब करती हैं। इस दौरान दोनों समूह नाटकीय अंदाज में संवाद और अभिनय प्रस्तुत करते हैं, जिसे लूर नृत्य कहा जाता है। हरियाणा के बांगर और बागड़ क्षेत्र में इस नृत्य की विशेष परंपरा रही है।

उन्होंने कहा कि लूर नृत्य के पुनर्जीवन से न केवल हरियाणा की पारंपरिक लोककला और सांस्कृतिक विरासत संरक्षित होगी, बल्कि युवा पीढ़ी भी अपनी लोकपरंपराओं से जुड़ सकेगी।

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Author: Bharat Sarathi

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