दीपावली: अलग-अलग आस्थाएँ, उजाले का साझा संदेश

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भगवान राम की अयोध्या वापसी, महावीर के निर्वाण और बंदी छोड़ दिवस से जुड़ी हैं परंपराएँ

संजय कुमार सुमन

दीपावली भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसमें आस्था, उल्लास और उजाले के अनेक रंग दिखाई देते हैं। कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल दीप जलाने और घर सजाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ विभिन्न धार्मिक परंपराएँ, पौराणिक कथाएँ और सांस्कृतिक मान्यताएँ जुड़ी हैं। अलग-अलग समुदाय इसे अपने विश्वास और रीति-रिवाजों के अनुसार मनाते हैं। इन परंपराओं को समझते समय धार्मिक मान्यता, लोककथा और ऐतिहासिक तथ्य के बीच अंतर करना भी आवश्यक है।

हिंदू परंपरा में दीपावली की सबसे लोकप्रिय मान्यता भगवान राम की अयोध्या वापसी से जुड़ी है। माना जाता है कि चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाए। इसी स्मृति में दीपावली पर दीपमालाएँ सजाने की परंपरा प्रचलित है। यह प्रसंग सत्य, मर्यादा और धर्म की विजय का संदेश देता है।

कुछ लोकपरंपराएँ दीपावली को पांडवों की वनवास और अज्ञातवास के बाद वापसी से भी जोड़ती हैं। ऐसी कथाओं में उनके स्वागत में दीप जलाने का उल्लेख मिलता है। हालांकि इसे दीपावली की उत्पत्ति का निर्विवाद ऐतिहासिक प्रमाण मानने के बजाय प्रचलित मान्यता के रूप में समझना उचित है।

दीपावली पर देवी लक्ष्मी की आराधना का विशेष महत्त्व है। श्रद्धालु घरों की सफाई करते हैं, दीप जलाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। लोकविश्वास है कि दीपावली की रात देवी लक्ष्मी का आगमन होता है। इस अवसर पर घर-परिवार की खुशहाली और मंगल की प्रार्थना की जाती है।

दक्षिण भारत की अनेक परंपराओं में दीपावली का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय से है। पौराणिक कथा के अनुसार नरकासुर ने अनेक महिलाओं को बंदी बना रखा था। उसके वध के बाद उन्हें मुक्ति मिली। नरक चतुर्दशी से जुड़ा यह प्रसंग अत्याचार के अंत और बंधन से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है।

जैन धर्म में दीपावली का अत्यंत विशिष्ट आध्यात्मिक महत्त्व है। जैन परंपरा के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने इसी अवसर पर बिहार के पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था। इसलिए जैन समाज इसे महावीर निर्वाण पर्व के रूप में मनाता है। दीपों का प्रकाश उनके ज्ञान और उपदेशों की स्मृति से जुड़ा है। इस अवसर पर श्रद्धालु पूजा, स्वाध्याय, संयम और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से भगवान महावीर का स्मरण करते हैं। दीपावली पर्वकाल का संबंध उनके प्रमुख शिष्य इंद्रभूति गौतम की केवलज्ञान प्राप्ति से भी है। जैन दृष्टि से यह पर्व अहिंसा, अपरिग्रह और आत्मकल्याण की प्रेरणा देता है।

सिख परंपरा में इस अवसर का संबंध बंदी छोड़ दिवस से है। यह छठे गुरु हरगोबिंद साहिब की ग्वालियर किले से रिहाई और उनके प्रयासों से बावन बंदी राजाओं की मुक्ति की स्मृति में मनाया जाता है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के विवरण के अनुसार गुरु हरगोबिंद साहिब दीपावली के अवसर पर अमृतसर पहुँचे थे और उनके स्वागत में दीप जलाए गए थे। उनकी रिहाई के वर्ष को लेकर ऐतिहासिक विवरणों में मतभेद मिलते हैं। इस पर्व का केंद्रीय संदेश दूसरों की स्वतंत्रता के लिए खड़े होना और अन्याय के विरुद्ध साहस दिखाना है।

बौद्ध समुदायों के संदर्भ में सावधानी आवश्यक है। दीपावली समस्त बौद्ध जगत का एक समान प्रमुख धार्मिक पर्व नहीं है। कुछ बौद्ध समुदाय स्थानीय और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार इसमें भाग लेते हैं। इसलिए किसी एक कथा या प्रथा को सभी बौद्ध अनुयायियों की साझा मान्यता के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

दीपावली की विविध परंपराएँ भारतीय समाज की सांस्कृतिक बहुलता को सामने लाती हैं। कहीं यह अपने प्रिय आराध्य के लौटने का उल्लास है, कहीं आत्ममुक्ति का स्मरण और कहीं बंदियों की स्वतंत्रता का उत्सव। इन सबके बीच दीपक आशा का प्रतीक बनकर उपस्थित रहता है। इस उजाले की सार्थकता तब और बढ़ जाती है, जब हम एक-दूसरे की आस्थाओं का सम्मान करें और अपने आसपास के जीवन में करुणा, सद्भाव तथा प्रसन्नता का प्रकाश फैलाएँ।

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Author: Bharat Sarathi

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