साइबर ठगी पर अंकुश के लिए कठोर दंड के साथ त्वरित जांच, धनवापसी और जनजागरूकता जरूरी
सौरभ वार्ष्णेय

डिजिटल तकनीक ने जीवन को जितना सरल बनाया है, साइबर अपराधियों ने उसी सुविधा का दुरुपयोग कर ठगी के नए रास्ते खोज लिए हैं। कभी बैंक अधिकारी बनकर लोगों की जमा पूंजी लूटी जाती है, तो कभी पुलिस, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो या प्रवर्तन निदेशालय का अधिकारी बनकर उन्हें डराया जाता है। वीडियो कॉल पर फर्जी वर्दी, सरकारी कार्यालय जैसी पृष्ठभूमि और गिरफ्तारी के कथित आदेश दिखाकर किसी व्यक्ति को घंटों या कई दिनों तक मानसिक दबाव में रखना तथा उससे धन हस्तांतरित कराना इस अपराध का खतरनाक रूप है। इसे प्रचलित भाषा में ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहा जाता है। वास्तव में यह कोई वैधानिक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि भय, भ्रम और तकनीक के दुरुपयोग से की जाने वाली ठगी है। सरकारी जागरूकता सामग्री भी स्पष्ट करती है कि भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसे साइबर अपराधों को ‘डिजिटल डकैती’ कहना उनकी गंभीरता रेखांकित करता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इन अपराधों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाने वाले गिरोहों के प्रति कठोर रुख अपनाने की आवश्यकता जताई है। यह विषय केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है। इसका संबंध नागरिकों की मानसिक शांति, सामाजिक प्रतिष्ठा और कानून-व्यवस्था के प्रति विश्वास से भी है।
ऐसे में मूल प्रश्न यही है कि अपराधियों के मन में कानून का भय क्यों नहीं दिखाई देता? केवल कठोर सजा का प्रावधान पर्याप्त नहीं हो सकता। कानून का वास्तविक प्रभाव तब बनता है, जब अपराध का पता लगने, अपराधी तक पहुंचने और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से दंड मिलने की संभावना मजबूत हो। जांच में देरी, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी और धन के अंतिम लाभार्थी तक पहुंचने की कठिनाई दूर किए बिना इस चुनौती का प्रभावी सामना नहीं किया जा सकता।
इस ठगी की सबसे चिंताजनक विशेषता यह है कि अपराधी पीड़ित के कानून के प्रति सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा खोने के भय का फायदा उठाते हैं। किसी व्यक्ति को बताया जाता है कि उसके नाम से प्रतिबंधित सामग्री का पार्सल भेजा गया है, उसके बैंक खाते का इस्तेमाल अवैध धन के लेन-देन में हुआ है अथवा वह किसी गंभीर आपराधिक मामले में संदिग्ध है। इसके बाद गिरफ्तारी, जेल और परिवार की बदनामी का डर दिखाया जाता है। पीड़ित को किसी से बात न करने और लगातार वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए बाध्य किया जाता है। अंततः कथित जांच, सत्यापन या मामले से बचाने के नाम पर उससे धन वसूल लिया जाता है।
यह केवल धन की चोरी नहीं, व्यक्ति के आत्मविश्वास और विवेक पर भी हमला है। भयभीत व्यक्ति अपनी वर्षों की बचत, सेवानिवृत्ति के बाद मिली राशि और परिवार की आर्थिक सुरक्षा तक अपराधियों के हवाले कर देता है। इसलिए इस अपराध को तकनीकी धोखाधड़ी के साथ मनोवैज्ञानिक दबाव के माध्यम से की जाने वाली संगठित आर्थिक लूट के रूप में भी समझना होगा।
बुजुर्गों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं विशेष चिंता का विषय हैं। सरकारी संस्थाओं के प्रति विश्वास रखने वाले वरिष्ठ नागरिक जब किसी कथित अधिकारी से गिरफ्तारी की धमकी सुनते हैं, तो घबराहट में उसकी बात मान सकते हैं। ऐसे लोगों को दोष देने या उनकी समझ पर प्रश्न उठाने के बजाय परिवार और समाज को उनके लिए संवाद तथा सहायता का भरोसेमंद वातावरण बनाना चाहिए। पीड़ित को यह विश्वास होना चाहिए कि गलती या ठगी की आशंका बताने पर उसका उपहास नहीं होगा।
सर्वोच्च न्यायालय में आए एक मामले ने इस अपराध की जांच से जुड़ी जटिलताओं को भी सामने रखा। समाचार विवरणों के अनुसार, गौरब कुमार साहा और निधि भंडारी ने 12 राज्यों में दर्ज 35 आपराधिक मामलों को एक साथ लाने की मांग की थी। आरोप था कि उनकी कंपनी के बैंक खाते का इस्तेमाल साइबर अपराध से जुड़ी रकम प्राप्त करने और आगे भेजने के लिए हुआ। न्यायालय ने याचिका पर विचार करने से इनकार किया और बाद में याचिकाकर्ताओं ने उसे वापस ले लिया। सुनवाई में पीड़ितों तथा जांच एजेंसियों की सुविधा और अधिकारों का प्रश्न भी उठा।
इस तरह के मामलों में निष्पक्ष जांच अत्यंत महत्वपूर्ण है। ठगी की रकम कई बैंक खातों से होकर गुजर सकती है। इसलिए किसी खाते में संदिग्ध धन पहुंचने की जांच उसके वास्तविक उपयोगकर्ता, धन के स्रोत, लेन-देन की प्रकृति और संबंधित व्यक्ति की भूमिका के आधार पर होनी चाहिए। केवल संदेह को अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, यह कह देना कि खाते का इस्तेमाल जानकारी के बिना हुआ, अपने आप में पर्याप्त स्पष्टीकरण भी नहीं है। ऐसे दावे की साक्ष्यों के आधार पर पड़ताल जरूरी है।
पीड़ितों के हितों की रक्षा और आरोपियों को निष्पक्ष सुनवाई का अवसर देना न्याय व्यवस्था की साझा जिम्मेदारी है। कठोर कार्रवाई का अर्थ प्रक्रिया की अनदेखी नहीं होना चाहिए। जांच जितनी प्रमाणिक और विधिसम्मत होगी, दोषियों को दंडित करने का आधार उतना ही मजबूत बनेगा।
साइबर ठगी के मामलों में समय की विशेष भूमिका है। रकम एक खाते से दूसरे खाते में भेजे जाने के बाद उसकी पहचान और वापसी कठिन हो सकती है। इसलिए शिकायत मिलते ही पुलिस, बैंक और संबंधित संस्थाओं के बीच त्वरित समन्वय जरूरी है। संदिग्ध धन के हस्तांतरण पर कानून के अनुरूप रोक लगाना जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। साथ ही, ऐसी कार्रवाई की समयबद्ध समीक्षा और प्रभावित व्यक्तियों की शिकायतों के निवारण की व्यवस्था भी होनी चाहिए। किसी निर्दोष व्यक्ति या वैध कारोबार को अनावश्यक आर्थिक संकट में डालना न्याय का उद्देश्य नहीं हो सकता।
अपराध से जुड़े धन को सुरक्षित करना और किसी व्यक्ति को दोषी ठहराकर सजा देना अलग प्रक्रियाएं हैं। संपत्ति या खाते पर रोक को अंतिम दंड का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए। अपराध की गंभीरता के बावजूद निष्पक्ष सुनवाई और विधिसम्मत प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्धता बनी रहनी चाहिए। नागरिकों को सुरक्षा भी चाहिए और यह भरोसा भी कि कानून का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं होगा।
‘डिजिटल अरेस्ट’ की विशिष्ट कार्यप्रणाली को देखते हुए कानूनी स्पष्टता और जांच के मानकों पर विचार उपयोगी है। हालांकि, इसे ऐसा क्षेत्र मानना भी उचित नहीं होगा, जहां कार्रवाई के लिए कोई कानून उपलब्ध ही नहीं है। सरकार के संसदीय उत्तर के अनुसार, परिस्थितियों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अंतर्गत छल, प्रतिरूपण, पहचान की चोरी तथा अन्य संबंधित अपराधों के प्रावधान लागू हो सकते हैं। आवश्यकता उपलब्ध प्रावधानों के प्रभावी उपयोग और वास्तविक कमियों की पहचान की है। sansad.in
केवल नया कानून बना देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। पुलिस की तकनीकी क्षमता बढ़ाना, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का शीघ्र विश्लेषण करना, बैंकिंग संस्थाओं के साथ समन्वय स्थापित करना और धन के अंतिम लाभार्थियों तक पहुंचना समान रूप से आवश्यक है। अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय गिरोहों के विरुद्ध जांच के लिए सूचनाओं का समय पर आदान-प्रदान भी जरूरी है। कार्रवाई का लक्ष्य केवल इस्तेमाल किए गए खातों तक पहुंचना नहीं, पूरे आपराधिक तंत्र को उजागर करना होना चाहिए।
बैंकों, दूरसंचार कंपनियों और संचार मंचों की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। संदिग्ध संचार की पहचान, फर्जी पहचान के इस्तेमाल पर कार्रवाई, असामान्य वित्तीय गतिविधियों की निगरानी और शिकायत पर तत्काल प्रतिक्रिया से नुकसान कम करने में मदद मिल सकती है। शिकायत की प्रक्रिया इतनी सरल होनी चाहिए कि भयभीत या तकनीक से कम परिचित व्यक्ति भी सहायता प्राप्त कर सके। पीड़ित को अलग-अलग कार्यालयों और संस्थाओं के बीच भटकना न पड़े।
नागरिकों को भी बुनियादी सावधानियां अपनानी होंगी। किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर बैंक संबंधी गोपनीय जानकारी, एकबारगी सत्यापन अंक या गुप्त कूट साझा न करें। अपने उपकरण का नियंत्रण किसी अपरिचित व्यक्ति को न दें। गिरफ्तारी अथवा जांच के नाम पर धन मांगने वाले से बातचीत रोकें और संबंधित संस्था के स्वतंत्र रूप से प्राप्त आधिकारिक संपर्क पर सत्यापन करें। परिवार के किसी विश्वसनीय सदस्य को तुरंत बताना भी भय का घेरा तोड़ने में मदद कर सकता है।
वित्तीय साइबर ठगी होने पर तत्काल बैंक को सूचित करें और सहायता संख्या 1930 अथवा राष्ट्रीय साइबर अपराध शिकायत पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं। लेन-देन का विवरण, संदेश और उपलब्ध अन्य साक्ष्य सुरक्षित रखें। शीघ्र शिकायत धन के आगे हस्तांतरण को रोकने के प्रयास में मदद कर सकती है, हालांकि इसे पूरी राशि वापस मिलने की गारंटी नहीं समझना चाहिए।
अपराधियों के लिए कानून का भय जरूरी है और निर्दोष नागरिकों के लिए कानून पर भरोसा भी। यह भरोसा घोषणाओं से नहीं, त्वरित सहायता, निष्पक्ष जांच, प्रभावी अभियोजन और पीड़ितों को राहत मिलने से मजबूत होगा। कठोर दंड, तकनीकी क्षमता, संस्थागत जवाबदेही और व्यापक जनजागरूकता को साथ लेकर ही साइबर ठगी पर अंकुश लगाया जा सकता है। डिजिटल भारत की सफलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी होना चाहिए कि उसका नागरिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए स्वयं को कितना सुरक्षित महसूस करता है।








