डॉ. विनोद बब्बर

शरद हमारी जिजीविषा का प्रतीक है। तभी तो ऋतुओं का राजा वसंत है, लेकिन लंबे जीवन की कामना करते हुए हमारे पूर्वजों ने सौ वसंत नहीं, सौ शरद माँगे। वैदिक वाङ्मय सौ शरद का उद्घोष करते हुए कहता है—‘जीवेम शरदः शतम्।’ अर्थात् हम सौ शरद तक जीवित रहें। कर्म करते हुए दीर्घ जीवन जिएँ। जीवन में राग और रस-रंग का प्रतीक वसंत है, तो संघर्ष के बीच जीने की प्रेरणा शरद देती है।
धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा का चंद्रमा सोलह कलाओं से युक्त होता है और इस रात उसकी किरणों से अमृत बरसता है। इसलिए शरद को अमरत्व का प्रतीक भी माना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो चंद्रमा शीतलता का प्रतीक है। बाहर कितनी भी प्रतिकूल परिस्थितियाँ आएँ, हमारा मन-मस्तिष्क इतना दृढ़ होना चाहिए कि सांसारिक बाधाएँ, व्याधियाँ और कठिनाइयाँ हमें विचलित न कर सकें।
यूं तो प्रत्येक महीने पूर्णिमा आती है, लेकिन शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। वर्षा ऋतु की विदाई और शरद के आगमन का यह सुंदर संयोग मन मोह लेता है। साफ आकाश में पूर्ण चंद्रमा की छटा निराली दिखाई देती है। इसीलिए इसे उल्लास और आनंद से भर देने वाली चमचमाती, खिलखिलाती रात कहा गया है।
हमारी धार्मिक परंपराओं में भी इस पूर्णिमा को विशेष स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि समृद्धि और वैभव की देवी लक्ष्मी का प्राकट्य शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। आश्विन मास की पूर्णिमा को आदिकवि महर्षि वाल्मीकि की जयंती भी मनाई जाती है। धार्मिक कथाओं में महर्षि वाल्मीकि द्वारा भगवान राम के जन्म से पूर्व ही रामायण की रचना किए जाने का उल्लेख मिलता है। माता जानकी ने उन्हीं के आश्रम में निवास किया और वहीं लव-कुश का जन्म हुआ। महर्षि ने दोनों बालकों को अनेक विद्याओं में पारंगत बनाया।
आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा, रास पूर्णिमा और कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। लोकविश्वास है कि इस रात्रि की उज्ज्वल चंद्रकिरणें विशेष कल्याणकारी होती हैं। इन किरणों के संपर्क में रखे गए खाद्य पदार्थों को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है। इसके पीछे स्वस्थ और पुष्ट जीवन की कामना निहित है।
भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय के तेरहवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
‘पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः।’
अर्थात् रसस्वरूप सोम होकर मैं समस्त औषधियों और वनस्पतियों का पोषण करता हूँ।
इस दिन को कोजागरी पूर्णिमा कहने के पीछे भी एक कथा है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात माँ लक्ष्मी विचरण करते हुए पूछती हैं—‘को जागर्ति?’ अर्थात् कौन जाग रहा है? जो भक्त इस रात्रि जागकर उनकी आराधना करते हैं, देवी उन्हें अपना आशीर्वाद प्रदान करती हैं। इसी विश्वास के साथ लोग रात्रि जागरण करते हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं।
इस जागरण का आध्यात्मिक संदेश भी है। मनुष्य अपने जीवन, कर्म और कर्तव्यों के प्रति सजग रहे। आलस्य से दूर रहकर पुरुषार्थ करे और अपने अंतर्मन को प्रकाशित रखे।
शरद पूर्णिमा को रासलीला की रात भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी रात भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। भक्ति परंपरा में यह महारास प्रेम, समर्पण और दिव्य आनंद का प्रतीक है।
इस पर्व का मनोवैज्ञानिक पक्ष देखें तो यह मौसम में परिवर्तन और शीत ऋतु की ओर बढ़ने का समय है। धान आदि की फसलें अपने यौवन पर होती हैं। किसान दैवी शक्तियों से अच्छी फसल की कामना करते हुए आशीर्वाद माँगते हैं। प्रकृति के प्रति आभार और समृद्ध जीवन की अभिलाषा इस उत्सव को विशेष बनाती है।
पूर्वी भारत में भी यह पर्व विभिन्न परंपराओं के साथ मनाया जाता है। ओडिशा में कुमार पूर्णिमा के अवसर पर कन्याएँ सूर्य और चंद्रमा की पूजा करती हैं। लोकमान्यता है कि इस उपासना से योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। इस प्रकार सभी अपने-अपने ढंग से स्वस्थ तन, प्रसन्न मन और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
यह भी स्मरणीय है कि उत्तर भारत की पूर्णिमांत परंपरा में शरद पूर्णिमा के अगले दिन से कार्तिक मास आरंभ होता है। इसके कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ, अष्टमी को अहोई अष्टमी, त्रयोदशी को धनतेरस और अमावस्या को दीपावली मनाई जाती है। इसके बाद गोवर्धन पूजा तथा भाई दूज सहित अनेक पर्व आते हैं। कार्तिक स्नान का भी विशेष महत्व है। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान और गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।
लोकमान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चंद्रकिरणें अमृतमयी होती हैं। एक लोककथा के अनुसार लंकाधिपति रावण इस रात चंद्रकिरणों को अपनी नाभि पर ग्रहण करके प्राण-ऊर्जा का संचय करता था। ऐसी कथाएँ इस पर्व से जुड़ी लोकआस्था और कल्पना को अभिव्यक्त करती हैं।
शरद पूर्णिमा की रात घरों की छतों अथवा खुले स्थानों पर खीर रखने की परंपरा भी इसी अमृत वर्षा की मान्यता से जुड़ी है। श्रद्धालु मानते हैं कि चाँदनी के संपर्क में रखी खीर विशेष पुण्यदायी और आरोग्यकारी होती है। अगले दिन इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है और परिवार तथा परिचितों में बाँटा जाता है।
कुछ स्थानों पर इस अवसर पर खीर के साथ पारंपरिक औषधियाँ देने के आयोजन भी होते हैं। इनके साथ विशेष रूप से श्वास संबंधी रोगों में लाभ की लोकमान्यताएँ जुड़ी हैं। यह धार्मिक और पारंपरिक विश्वास का विषय है, प्रमाणित उपचार का दावा नहीं।
शरद पूर्णिमा हमें प्रकृति की निर्मलता, चंद्रमा की शीतलता और जीवन के प्रति सजगता अपनाने की प्रेरणा देती है। श्रद्धा, प्रेम, संयम और सद्भाव के साथ मनाया गया यह पर्व हमारे भीतर भी ऐसी उजली चाँदनी भर सकता है, जो कठिन परिस्थितियों में मन का संतुलन और जीवन के प्रति विश्वास बनाए रखे।








