जंतर-मंतर 2.0 : विरोध के अधिकार की परीक्षा

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हिरासत और पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप; संयुक्त राष्ट्र की चिंता को भारत ने बताया आंतरिक मामलों में दखल

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया, महाराष्ट्र – दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर विरोध के अधिकार, चुनावी विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही की बहस के केंद्र में है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन के दौरान हिरासत, बैरिकेडिंग और सार्वजनिक सेवाओं पर प्रतिबंधों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इन सवालों पर 11 अक्टूबर को रविवार के दिन सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई हुई। न्यायालय ने वैधानिक प्रक्रिया के बिना हिरासत नहीं लेने और सार्वजनिक सेवाओं तथा आवाजाही पर लगाए गए प्रतिबंधों की समीक्षा के निर्देश दिए। UNI India

इस घटनाक्रम का महत्व किसी एक संगठन की राजनीतिक सफलता या सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह प्रश्न है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति को कितनी जगह मिलती है और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की प्रशासनिक शक्ति की सीमाएं क्या हैं। नागरिकों की सुरक्षा तथा उनके अधिकारों का संरक्षण एक ही शासन व्यवस्था की जिम्मेदारियां हैं। किसी एक के नाम पर दूसरे की अनदेखी लोकतांत्रिक विश्वास को कमजोर करती है।

चुनावी भरोसे से जुड़ा आंदोलन

कॉकरोच जनता पार्टी, यानी सीजेपी, के आंदोलन का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की निष्पक्षता और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही है। आंदोलनकारी मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। सरकार और निर्वाचन आयोग ने पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है। इसलिए चुनावी अनियमितताओं के आरोपों और प्रमाणित निष्कर्षों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना जरूरी है। apnews.com

मतदाता सूची पर भरोसा चुनावी लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है। किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना गंभीर विषय है, जबकि अपात्र अथवा दोहरी प्रविष्टियों का नियमानुसार सुधार भी आवश्यक है। विवाद का समाधान तभी संभव है जब संबंधित प्रक्रिया, आपत्तियों के निस्तारण और सुधार के अवसरों के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध हो। आरोप लगाने वालों को प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए और संस्थाओं को उन प्रमाणों का तथ्यपरक उत्तर देना चाहिए।

आंदोलन में युवाओं की भागीदारी राजनीतिक व्यवस्था के लिए संवाद का अवसर भी है। उनकी मांगों से असहमति हो सकती है, लेकिन प्रश्न पूछने को अपने आप में व्यवस्था-विरोधी गतिविधि मान लेना उचित नहीं होगा। इसी तरह जनसमर्थन का दावा किसी संगठन को कानून से ऊपर नहीं रखता।

अनुमति और प्रतिबंधों की कसौटी

दिल्ली पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने के पीछे कम समय पहले आवेदन, पुराने प्रदर्शनों में शर्तों के कथित उल्लंघन तथा सार्वजनिक सुरक्षा और यातायात संबंधी चिंताओं का हवाला दिया। इन कारणों का उल्लेख सामने आई रिपोर्टों में हुआ है। India News

प्रशासन को संभावित भीड़, यातायात और सुरक्षा का आकलन करना पड़ता है। लेकिन किसी आयोजन की अनुमति का प्रश्न और पूरे शहर में व्यापक प्रतिबंध लगाने का औचित्य अलग-अलग जांचे जाने चाहिए। क्या सीमित क्षेत्र में व्यवस्था की जा सकती थी? क्या वैकल्पिक स्थान या समय दिया जा सकता था? क्या प्रतिबंधों की अवधि और भौगोलिक सीमा आवश्यकतानुसार रखी गई? ऐसे प्रश्न प्रशासनिक निर्णयों की विश्वसनीयता बढ़ाते हैं।

मूल लेख में उठाया गया अनुच्छेद 19 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 का प्रश्न इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। संवैधानिक स्वतंत्रताओं और सार्वजनिक व्यवस्था संबंधी शक्तियों का संतुलन केवल आदेश जारी कर देने से स्थापित नहीं होता। उसके लिए आदेश के आधार, उसके क्रियान्वयन और प्रभावित नागरिकों को उपलब्ध राहत पर भी विचार जरूरी है।

रविवार की सुनवाई का संदेश

सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना ने संबंधित मामलों की सुनवाई की। अदालत ने मेट्रो और रेल सेवाओं के सामान्य संचालन, इंटरनेट पर गैरकानूनी व्यवधान नहीं डालने तथा बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा के निर्देश दिए। सार्वजनिक व्यवस्था की वास्तविक जरूरतों और लागू नियमों को भी ध्यान में रखा गया। indianexpress.com

अदालत ने विशेष रूप से शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों की सभा के संदर्भ में वैधानिक प्रक्रिया के बिना हिरासत नहीं लेने पर जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट के आसपास धारा 163 लागू होने की सूचना वाला बोर्ड, यदि अभी लगा हो, हटाने का निर्देश भी दिया गया, ताकि अदालत तक पहुंच को लेकर आशंका उत्पन्न न हो। livelaw.in

इन निर्देशों का महत्व नागरिक अधिकारों के व्यावहारिक संरक्षण में है। न्याय तक पहुंच तभी सार्थक है जब नागरिक और अधिवक्ता अदालत पहुंच सकें। इसी तरह सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर व्यक्ति का हित भी सुरक्षा संबंधी निर्णयों में शामिल होना चाहिए।

हालांकि, अंतरिम निर्देशों को हर आरोप पर अंतिम न्यायिक फैसला मान लेना सही नहीं होगा। अवमानना का आरोप लगना, उस पर जवाब मांगा जाना और अवमानना सिद्ध होना अलग-अलग चरण हैं। अदालत की कार्यवाही की रिपोर्टिंग में यह अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

हिरासत के आंकड़ों से आगे का प्रश्न

हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में भिन्न आंकड़े सामने आए हैं। इसलिए किसी एक संख्या को निर्विवाद अंतिम आंकड़े के रूप में प्रस्तुत करने से बचना चाहिए। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हर व्यक्ति की हिरासत का आधार क्या था, उसकी स्थिति की जानकारी उपलब्ध थी या नहीं और उसे कानूनी सहायता मिल सकी या नहीं।

सीजेपी के अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को रविवार को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के बाद शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा किया गया। उनकी रिहाई को सुप्रीम कोर्ट के प्रत्यक्ष रिहाई आदेश के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। m.economictimes.com

ऐसी परिस्थितियों में पारदर्शिता तनाव कम कर सकती है। हिरासत, गिरफ्तारी और रिहाई की स्पष्ट जानकारी परिवारों की अनिश्चितता घटाती है और अफवाहों पर भी अंकुश लगाती है। पुलिस के साथ दुर्व्यवहार अथवा प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध अत्यधिक बल प्रयोग—दोनों प्रकार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र की चिंता और भारत का उत्तर

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने दिल्ली में प्रदर्शन से पहले और उसके दौरान प्रदर्शनकारियों, आंदोलन के नेताओं, नागरिक समाज के सदस्यों, वकीलों तथा पत्रकारों की व्यापक हिरासत की खबरों पर चिंता व्यक्त की। इस प्रतिक्रिया ने घटनाक्रम को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श में भी स्थान दिया। United Nations

भारत ने इस टिप्पणी को अनुचित और अपने आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप बताया। जिनेवा स्थित भारतीय स्थायी मिशन ने संवैधानिक अधिकारों, स्वतंत्र न्यायपालिका और देश की संस्थाओं का उल्लेख करते हुए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय से निष्पक्ष तथा गैर-चयनात्मक दृष्टिकोण की अपेक्षा जताई। Akashvani News

यहां दो बातों को स्पष्ट रखना चाहिए। मानवाधिकार कार्यालय की चिंता भारत के विरुद्ध किसी अंतरराष्ट्रीय अदालत का फैसला नहीं है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय टिप्पणी पर आपत्ति दर्ज कराना घरेलू स्तर पर उठे सवालों का उत्तर देने की जरूरत समाप्त नहीं करता। राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान और नागरिक अधिकारों की जवाबदेही साथ-साथ कायम रह सकते हैं।

“पूरी दुनिया की नजरें भारत पर टिक गईं” जैसे व्यापक दावे की जगह यह कहना अधिक सटीक है कि घटनाक्रम पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया आई है। विश्लेषण की ताकत अतिशयोक्ति से नहीं, स्पष्ट तथ्यों और संतुलित तर्क से बढ़ती है।

संवाद से निकले रास्ता

अब सरकार, पुलिस, निर्वाचन आयोग और आंदोलनकारियों के सामने अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभाने की चुनौती है। प्रशासन को प्रतिबंधों का औचित्य स्पष्ट करना चाहिए। निर्वाचन संबंधी शिकायतों का उत्तर प्रक्रिया और आंकड़ों के आधार पर सामने आना चाहिए। आंदोलनकारियों को भी शांतिपूर्ण आचरण बनाए रखते हुए अपनी मांगों और प्रमाणों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना चाहिए।

जंतर-मंतर 2.0 भारतीय लोकतंत्र का निर्णायक मोड़ बनेगा या नहीं, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इसने विरोध के अधिकार और प्रशासनिक विवेक पर जरूरी बहस अवश्य खड़ी की है। इसका परिणाम इस बात से तय होगा कि शिकायतों की सुनवाई कितनी निष्पक्ष होती है, प्रतिबंध कितने न्यायसंगत साबित होते हैं और सार्वजनिक संस्थाएं लोगों का भरोसा बहाल करने के लिए क्या कदम उठाती हैं।

लोकतंत्र में असहमति का मौजूद होना स्वाभाविक है। उसकी मजबूती तब दिखाई देती है जब नागरिक निर्भय होकर सवाल पूछ सकें, प्रशासन संयम के साथ काम करे और संस्थाएं पारदर्शिता तथा संवैधानिक मर्यादा के साथ उत्तर दें।

-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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