जातिगत अत्याचार के पीड़ितों को त्वरित न्याय मिले और निर्दोष के अधिकार भी सुरक्षित रहें
गजेन्द्र सिंह

नकल नहीं करने दी तो एससी-एसटी एक्ट, परीक्षा में नंबर कम आए तो एससी-एसटी एक्ट, जमीन पर कब्जे के विवाद में एससी-एसटी एक्ट, किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई का डर हो तो एससी-एसटी एक्ट, क्या एक विशेष कानून, जिसे ऐतिहासिक भेदभाव और जातिगत अत्याचार का सामना करने वाले समुदायों को कानूनी सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था, कभी-कभी दबाव बनाने या भय पैदा करने के आरोपों के कारण भी चर्चा में आ सकता है? यह सवाल किसी कानून के मूल उद्देश्य को नकारने के लिए नहीं, बल्कि यह पूछने के लिए है कि क्या किसी विशेष कानून की कठोरता उसके न्यायपूर्ण इस्तेमाल की गारंटी भी देती है?
चूरू में प्रैक्टिकल के कम अंकों से जुड़े विवाद में एससी/एसटी एक्ट के इस्तेमाल की चर्चा हो, आईआईटी बॉम्बे के छात्र की मौत के बाद संस्थान के एक प्रोफेसर के खिलाफ इस कानून के तहत मामला दर्ज होने का प्रसंग हो या उत्तर प्रदेश के विष्णु तिवारी का मामला ऐसे अलग-अलग प्रसंग एक साझा सवाल की ओर संकेत करते हैं: क्या कानून की शक्ति और नागरिक के अधिकारों के बीच पर्याप्त संतुलन मौजूद है?
विष्णु तिवारी का मामला इस सवाल को और गंभीर बनाता है। उन्होंने लगभग दो दशक जेल में बिताए और बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। किसी व्यक्ति का जीवन, उसके परिवार की आर्थिक स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य, इन सब पर लंबी न्यायिक प्रक्रिया का असर पड़ सकता है। अंतिम निर्णय यदि उसके पक्ष में भी आए, तब तक खोया हुआ समय वापस नहीं आता। यही किसी भी कठोर आपराधिक कानून के सामने सबसे कठिन प्रश्नों में से एक है दोषी को दंडित करने में हुई देरी अन्याय है लेकिन निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक मुकदमे में उलझाए रखना भी न्याय नहीं है।
यहां से बहस को कानून के मूल उद्देश्य की ओर लौटना जरूरी है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से भेदभाव और अत्याचार का सामना करने वाले समुदायों को प्रभावी कानूनी संरक्षण प्रदान करना है। इसलिए वास्तविक अत्याचार के मामलों में पीड़ितों को त्वरित न्याय और प्रभावी कानूनी संरक्षण मिलना इस कानून की मूल आवश्यकता है। लेकिन जब किसी विवाद में इस कानून के नाम पर दूसरे पक्ष को शिकायत करने, अपनी बात रखने या कानूनी कार्रवाई की मांग करने से डराने के आरोप सामने आते हैं, तो बहस केवल किसी एक मामले तक सीमित नहीं रहती। तब सवाल कानून की आवश्यकता के साथ-साथ उसके बार-बार किए गए बदलावों, उनके औचित्य और कानून के निष्पक्ष, पारदर्शी एवं जवाबदेह इस्तेमाल की व्यवस्था पर भी उठता है। आखिर ऐसा विशेष कानून, जो सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है, अपने मूल उद्देश्य की रक्षा करते हुए वास्तविक पीड़ितों को संरक्षण दे और साथ ही उसके दुरुपयोग की आशंकाओं को भी कैसे संबोधित करे यह आज की महत्वपूर्ण सार्वजनिक बहस है।
पिछले एक दशक के घटनाक्रम इस बहस को और गंभीर बनाते हैं। 2015 में मोदी सरकार ने एससी/एसटी अधिनियम में संशोधन कर इसके तहत आने वाले अपराधों की संख्या 22 से बढ़ाकर 47 कर दी। 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले ने गिरफ्तारी और प्राथमिकी से पहले कुछ प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय सुझाए लेकिन केंद्र सरकार ने संसद के माध्यम से न्यायालय के फैसले को पलट प्रावधानों को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी कर दिया । अब 2026 में केंद्र सरकार ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर अत्याचार पीड़ितों की राहत और पुनर्वास राशि को अधिकतम 8.25 लाख से बढ़ाकर 12 लाख रुपये करने का प्रस्ताव रखा है जबकि वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 4.4 प्रतिशत रहा।
एक ओर सरकार इस कानून के संरक्षण को लगातार मजबूत कर रही है, वहीं दूसरी ओर वर्षों से इसके कथित दुरुपयोग, झूठे मुकदमों, कम दोषसिद्धि दर, लंबे समय तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया और कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों द्वारा मुआवजा राशि वापस करने के आदेशों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे मामले भी सामने आते रहे हैं, जहां आरोपी वर्षों तक मुकदमे और कानूनी प्रक्रिया में उलझा रहता है और अंततः उसकी उम्र बीत जाती है, परिवार बिखर जाता है या परिस्थितियां पूरी तरह बदल जाती हैं। तब स्वाभाविक प्रश्न उठता है आखिर 21वीं सदी के भारत में इस विशेष कानून की आवश्यकता आज भी क्यों बनी हुई है? क्या यह केवल सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों की सुरक्षा का प्रश्न है, या इसके पीछे बदलती दलित राजनीति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और वोट-बैंक की राजनीति की भी कोई भूमिका है?
अलीगढ़ के हस्तपुर में चंद्रावती देवी से जुड़े मामले में मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उनके परिवार की ओर से वर्षों के दौरान एससी/एसटी एक्ट के तहत अनेक मामले दर्ज कराए गए और लाखो रु की आर्थिक सहायता प्राप्त होने की बात सामने आई। इसी तरह 2015–16 के मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के एक सर्वे में अध्ययन किए गए एससी/एसटी एक्ट के मामलों में लगभग 75 प्रतिशत आरोपियों के बरी होने का दावा किया गया था। इस सर्वे में आरोपियों में 81 प्रतिशत ओबीसी, 14 प्रतिशत सामान्य वर्ग और 5 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदायों से होने की बात कही गई थी। । 2021 में सहारनपुर से जुड़े एक मामले में 12 मामलों में से 11 में आरोपियों के बरी होने तथा शिकायतकर्ताओं के खिलाफ झूठी गवाही से संबंधित कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की रिपोर्ट सामने आई। इन घटनाओं को पूरे देश या पूरे कानून की तस्वीर मानना उचित नहीं होगा। लेकिन इन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। क्योंकि यदि किसी विशेष कानून के तहत दुरुपयोग की आशंका बार-बार सार्वजनिक बहस में आती है, तो सवाल केवल शिकायतकर्ता की नीयत का नहीं, बल्कि कानून की संस्थागत सुरक्षा उपाय का भी होना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर, केंद्र सरकार द्वारा राज्यसभा में दिए गए आंकड़े यह भी बताते हैं कि एससी/एसटी समुदायों के खिलाफ अत्याचार की समस्या वास्तविक और व्यापक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, 2022 में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध 57,569 और अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध 10,064 मामले दर्ज हुए । 2023 में यह संख्या क्रमशः 57,766 और 12,959 तथा 2024 में 55,685 और 9,961 रही। इसी अवधि में केंद्र सरकार ने पीड़ितों को राहत और पुनर्वास के लिए राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को 2022–23 में ₹392.71 करोड़, 2023–24 में ₹535.30 करोड़ और 2024–25 में ₹495.29 करोड़ की केंद्रीय सहायता जारी की, जिससे क्रमशः 88,172, 79,667 और 99,965 पीड़ित लाभान्वित हुए। दोषसिद्धि दर भी 2022 से 2024 के बीच अनुसूचित जाति से संबंधित मामलों में 34.1, 32.4 और 33.9 प्रतिशत तथा अनुसूचित जनजाति से संबंधित मामलों में 28.1, 24.6 और 33.2 प्रतिशत रही, यानी तस्वीर का एक पक्ष यह है कि जातिगत अत्याचार के मामले बड़ी संख्या में दर्ज हो रहे हैं, पीड़ितों को आर्थिक मिल रही है । दूसरा पक्ष यह है कि मामलों में आरोप सिद्ध नहीं होते । इन दोनों वास्तविकताओं को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय यह देखना अधिक जरूरी है कि कानून ऐसा कैसे हो जो वास्तविक पीड़ित को मजबूत सुरक्षा दे और साथ ही झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत की स्थिति में निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों की भी रक्षा करे।
यही वह बिंदु है जहां कानून में बार-बार किए गए बदलावों और उसकी प्रक्रिया पर गंभीर चर्चा आवश्यक हो जाती है। क्या हर संशोधन ने वास्तविक पीड़ित की सुरक्षा के साथ-साथ निष्पक्ष प्रक्रिया को भी मजबूत किया है? क्या कानून के कठोर प्रावधानों के साथ उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त जवाबदेही और सुरक्षा-व्यवस्था मौजूद है? और क्या जाति-आधारित विशेष कानून सामाजिक न्याय की आवश्यकता को पूरा करते हुए कहीं जाति को हमारी प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था में और अधिक संस्थागत बनाने का प्रभाव भी पैदा कर रहे हैं?








