वानप्रस्थ में मानसिक स्वास्थ्य पर संगोष्ठी, सकारात्मक सोच और सक्रिय जीवन का संदेश

हिसार। बढ़ती उम्र में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। इसी संदेश के साथ वानप्रस्थ सीनियर सिटीज़न्स क्लब में “बढ़ती उम्र में मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक सुख-शांति” विषय पर विशेष संगोष्ठी आयोजित की गई। मुख्य वक्ता मनोवैज्ञानिक डॉ. शिवांशी तोमर ने वरिष्ठ नागरिकों से संवाद करते हुए तनाव, अकेलेपन और जीवन में आने वाले बदलावों का सकारात्मक ढंग से सामना करने के उपाय बताए।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. दीप पुनिया की मधुर भजन प्रस्तुति से हुआ। मुख्य वक्ता और उपस्थित सदस्यों का स्वागत करते हुए क्लब के महासचिव डॉ. जे. के. डांग ने कहा कि हम अपने शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं, लेकिन मन का स्वस्थ और प्रसन्न रहना भी उतना ही आवश्यक है। बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं, अकेलापन, पारिवारिक परिस्थितियों में बदलाव तथा किसी प्रियजन को खोने का दुःख मन को प्रभावित कर सकता है। ऐसे समय में सकारात्मक सोच, परिवार और मित्रों का साथ तथा भावनात्मक संबल विशेष महत्व रखते हैं।
समाजसेवी सुनीता रहेजा ने डॉ. शिवांशी तोमर का परिचय देते हुए बताया कि वे विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़ी हैं। वे “हरी-भरी वसुंधरा” के साथ सक्रिय रूप से कार्य करने के अलावा दिव्यांग बच्चों के लिए सेवाएं और परामर्श भी प्रदान करती हैं। उनका जुड़ाव ईशा फाउंडेशन से भी है।
मन की परेशानी पर खुलकर करें बात
डॉ. शिवांशी तोमर ने वरिष्ठ नागरिकों में अकेलापन, तनाव, चिंता, अवसाद, नींद की समस्या और याददाश्त में बदलाव जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ कभी-कभार भूल जाना सामान्य हो सकता है, लेकिन भूलने की समस्या लगातार बढ़ रही हो अथवा दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगे तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न भ्रमों और वास्तविकताओं से भी सदस्यों को अवगत कराया।
डॉ. तोमर ने कहा कि मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए नियमित दिनचर्या, शारीरिक सक्रियता, पर्याप्त नींद और सामाजिक जुड़ाव महत्वपूर्ण हैं। व्यक्ति को अपनी रुचियों के लिए समय निकालना चाहिए और रचनात्मकता बनाए रखनी चाहिए। कुछ लिखना, पहेलियां हल करना अथवा कोई नया कार्य सीखना मस्तिष्क को सक्रिय रखने में सहायक हो सकता है। दूसरों की भलाई के लिए किया गया छोटा-सा कार्य भी मन को खुशी और संतोष देता है।
उन्होंने क्षमा करने, मित्रों से मिलने, मन की बात साझा करने तथा प्रियजनों को फोन करके उनसे जुड़े रहने को भावनात्मक सुख-शांति के लिए उपयोगी बताया। उन्होंने जीवन की अच्छी बातों के प्रति कृतज्ञता रखने और स्वयं के प्रति भी सकारात्मक भाव बनाए रखने का संदेश दिया।
बुजुर्गों को दें समय और भावनात्मक सहारा
डॉ. तोमर ने परिवार के सदस्यों से आग्रह किया कि वे वरिष्ठ नागरिकों की बात ध्यान से सुनें और उनकी भावनात्मक जरूरतों को समझें। उन्होंने कहा कि यदि मानसिक परेशानी लंबे समय तक बनी रहे या रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने लगे तो विशेषज्ञ की सलाह लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।
चर्चा में भाग लेते हुए सत्यवती ने कहा कि सकारात्मक सोच जीवन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बढ़ती उम्र में अनावश्यक बातों को नजरअंदाज करना और उनसे दूरी बनाए रखना भी सीखना चाहिए, ताकि मन की शांति बनी रहे।
इस अवसर पर डॉ. अमृत लाल खुराना, डॉ. आर. के. पूनिया, करतार सिंह, डॉ. एम. एस. मलिक, डॉ. आर. पी. एस. खरब तथा डॉ. आर. डी. शर्मा ने भी अपने विचार साझा किए। सदस्यों की भागीदारी से संगोष्ठी संवादपूर्ण और सार्थक रही।
विश्राम अभ्यास से दिया मन की शांति का संदेश
कार्यक्रम के अंत में डॉ. शिवांशी तोमर ने मानसिक शांति और तनाव कम करने के उद्देश्य से लगभग दस मिनट का विश्राम अभ्यास करवाया। उन्होंने सदस्यों को इसे अपनी नियमित दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दी।
डॉ. जे. के. डांग ने मुख्य वक्ता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसी संगोष्ठियां वरिष्ठ नागरिकों को अपने मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने की महत्वपूर्ण पहल हैं। उन्होंने इन पंक्तियों के साथ अपना संवाद पूरा किया—
“उम्र बढ़े तो हौसला भी बढ़ाइए,
हर दिन को मुस्कुराकर सजाइए।
उम्र नहीं, जज़्बा मायने रखता है,
खुश रहने का हक़ हर उम्र रखता है।”
उपस्थित सदस्यों ने तालियों के साथ डॉ. तोमर का आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में संदेश दिया गया कि बढ़ती उम्र में भी जीवन को नए अर्थ, नई ऊर्जा और नई खुशियों के साथ जिया जा सकता है। कार्यक्रम के बाद सदस्यों ने आपसी बातचीत के साथ जलपान का आनंद लिया।








