बड़े नेताओं के भाषणों और प्रशंसा के बीच अनुत्तरित रहे सवाल—
जिला कार्यालय निष्क्रिय, पुराने नेता उपेक्षित और चुनाव लड़ने वाले चेहरे भी क्षेत्र में सक्रिय नहीं
ऋषिप्रकाश कौशिक*

गुरुग्राम। सेक्टर-17 स्थित ब्लिस प्रीमियर बैंक्वेट हॉल में आयोजित कांग्रेस के गुड़गांव ब्लॉक कार्यकर्ता सम्मेलन में पार्टी के कई बड़े नेता एक मंच पर दिखाई दिए। हरियाणा कांग्रेस प्रभारी संजय दत्त, प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह, सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा और पूर्व सांसद एवं फिल्म अभिनेता राज बब्बर की उपस्थिति के कारण कार्यक्रम को भव्य तथा ऐतिहासिक बताया गया।
मंच से संगठन की मजबूती, कार्यकर्ताओं के सम्मान और बूथ स्तर तक पार्टी को सक्रिय करने के दावे किए गए। शहरी जिला अध्यक्ष पंकज डावर के काम की प्रशंसा भी हुई। लेकिन भाषणों और जारी प्रेस नोट से अलग, सम्मेलन कई ऐसे सवाल छोड़ गया जिनका उत्तर कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ता तलाश रहे हैं।
कांग्रेस कार्यालय होते हुए होटल क्यों?

गुड़गांव में कांग्रेस का वर्षों पुराना जिला कार्यालय मौजूद है। पंकज डावर को शहरी जिला अध्यक्ष बने एक वर्ष से अधिक समय हो चुका है, लेकिन कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जिला कार्यालय में उनकी बात सुनने के लिए कोई जिम्मेदार पदाधिकारी नियमित रूप से नहीं बैठता।
जब पार्टी का अपना कार्यालय है तो ब्लॉक कार्यकर्ता सम्मेलन होटल के बैंक्वेट हॉल में क्यों किया गया? यदि कार्यालय में जगह कम थी तो कोई सार्वजनिक सभागार, धर्मशाला या खुला मैदान चुना जा सकता था। होटल का चुनाव कहीं कार्यकर्ताओं से संवाद के बजाय बड़े नेताओं के सामने चमकदार शक्ति प्रदर्शन की आवश्यकता के कारण तो नहीं किया गया?
किसी राजनीतिक दल का जिला कार्यालय केवल पार्टी का बोर्ड लगाने की जगह नहीं होता। वहां पदाधिकारियों की नियमित उपलब्धता, कार्यकर्ताओं की सुनवाई, आम नागरिकों की शिकायतों का संकलन और जनसमस्याओं पर आंदोलन की रूपरेखा बननी चाहिए। यदि कार्यालय में कार्यकर्ता को सुनने वाला कोई नहीं है, लेकिन संगठन की मजबूती दिखाने के लिए होटल में बड़ा मंच सजाया जाता है, तो कथनी और जमीनी वास्तविकता के बीच अंतर साफ दिखाई देता है।
चुनाव के बाद राज बब्बर की सक्रियता कहां?

गुड़गांव लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी रहे राज बब्बर सम्मेलन में पहुंचे और उन्होंने कार्यकर्ताओं को पार्टी की जान बताया। उन्होंने जिला अध्यक्ष की प्रशंसा करते हुए दावा किया कि गुड़गांव में कांग्रेस अपना पुराना इतिहास दोहराएगी।
लेकिन कार्यकर्ताओं के मन में सवाल है कि लोकसभा चुनाव के बाद राज बब्बर स्वयं गुड़गांव में कितने सक्रिय रहे? चुनाव के दौरान जिन कार्यकर्ताओं ने उनके लिए दिन-रात मेहनत की, उनसे चुनाव के बाद नियमित संवाद कितना हुआ? स्थानीय लोगों का कहना है कि राज बब्बर अब कुछ त्योहारों अथवा विशेष कार्यक्रमों में अतिथि की तरह दिखाई देते हैं और फिर लंबे समय तक क्षेत्र में नजर नहीं आते।
चुनाव लड़ने वाला प्रत्याशी केवल चुनाव के दिनों का नेता नहीं होता। हार के बाद भी उसे क्षेत्र की समस्याओं, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच बने रहना चाहिए। यदि नेता त्योहारों अथवा बड़े आयोजनों पर केवल दर्शन देकर लौट जाए तो कार्यकर्ता के भीतर निराशा पैदा होना स्वाभाविक है।
मंच से कार्यकर्ताओं को संगठन मजबूत करने का उपदेश देने से पहले राज बब्बर को यह भी बताना चाहिए था कि आने वाले समय में वह गुड़गांव लोकसभा क्षेत्र में कितने दिन उपलब्ध रहेंगे और कार्यकर्ताओं तथा जनता से नियमित संवाद की उनकी क्या योजना है।
विधानसभा प्रत्याशी भी कुछ समय बैठकर लौटे
यही स्थिति विधानसभा चुनाव लड़ चुके कुछ कांग्रेस प्रत्याशियों को लेकर भी बताई जा रही है। सम्मेलन में वे उपस्थित तो हुए, लेकिन कुछ समय मंच अथवा सभागार में बैठकर वापस चले गए। यदि कार्यक्रम वास्तव में संगठनात्मक चिंतन और ब्लॉक कार्यकर्ताओं से संवाद के लिए था तो चुनाव लड़ चुके नेताओं को पूरे कार्यक्रम में उपस्थित रहना चाहिए था।
चुनाव के समय कार्यकर्ता से सुबह से रात तक काम करने की अपेक्षा की जाती है। वही प्रत्याशी यदि चुनाव के बाद कार्यकर्ता सम्मेलन को भी पर्याप्त समय नहीं देता तो समर्पण का संदेश कमजोर पड़ता है। नेताओं की औपचारिक उपस्थिति से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वे कार्यकर्ताओं को सुनें, उनके सुझाव लिखें और उनके साथ अगली राजनीतिक कार्ययोजना बनाएं।
ब्लॉक अध्यक्षों को क्या समझाया गया?
सम्मेलन की अध्यक्षता गुड़गांव ब्लॉक अध्यक्ष राजपाल यादव ने की। कार्यक्रम में कई अन्य ब्लॉक अध्यक्ष भी उपस्थित बताए गए। इसके बावजूद जारी प्रेस नोट में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि ब्लॉक अध्यक्षों ने अपने क्षेत्रों की क्या रिपोर्ट प्रस्तुत की और प्रदेश नेतृत्व ने उन्हें कौन से निश्चित लक्ष्य दिए।
कितने बूथों पर समितियां बन गई हैं? कितने बूथ अभी संगठनविहीन हैं? निष्क्रिय पदाधिकारियों के स्थान पर सक्रिय कार्यकर्ताओं को कब जिम्मेदारी मिलेगी? जनता की समस्याओं पर ब्लॉक और जिला कांग्रेस कौन से आंदोलन करेगी? इन सवालों पर कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आई।
कार्यक्रम ब्लॉक अध्यक्षों और कार्यकर्ताओं का था, लेकिन प्रचार जिला अध्यक्ष की उपलब्धि और बड़े नेताओं के भाषणों पर केंद्रित रहा। इससे यह प्रश्न पैदा होता है कि सम्मेलन संगठन की समीक्षा के लिए था या किसी पदाधिकारी की राजनीतिक स्थिति मजबूत दिखाने के लिए।
पुराने और जनाधार वाले नेताओं को दूर क्यों रखा गया?
सम्मेलन में उपस्थित नेताओं और कार्यकर्ताओं की एक बहुत लंबी सूची जारी की गई। लेकिन सूची की लंबाई संगठन की एकता का प्रमाण नहीं हो सकती। महत्वपूर्ण यह है कि क्या सभी पुराने, सक्रिय और जनाधार रखने वाले नेताओं को सम्मान के साथ आमंत्रित किया गया?
स्थानीय कांग्रेसजनों का कहना है कि सुशील भारद्वाज और संतोष सिंह जैसे पुराने कार्यकर्ताओं को उचित महत्व नहीं मिला। इसी तरह पिछले चुनाव के आसपास पार्टी से जुड़े नरेश कटारिया, सूबे सिंह बोहरा और जीएल शर्मा जैसे स्थानीय प्रभाव रखने वाले चेहरों की सक्रिय भागीदारी भी दिखाई नहीं दी।
व्यक्तिगत मतभेद अथवा गुटबाजी किसी भी दल में हो सकती है, लेकिन संगठन चलाने वालों का दायित्व सभी को साथ लाना है। केवल अपने निकट माने जाने वाले लोगों के साथ सम्मेलन करके पार्टी का दायरा नहीं बढ़ाया जा सकता।
वास्तविक कार्यकर्ताओं की संख्या पर सवाल
आयोजकों ने सम्मेलन को भव्य और ऐतिहासिक बताया। दूसरी तरफ पार्टी के ही कुछ स्थानीय कार्यकर्ताओं का दावा है कि बड़े नेताओं की उपस्थिति के बावजूद वास्तविक और पुराने कांग्रेस कार्यकर्ताओं की संख्या अपेक्षाकृत कम थी। कुछ लोगों ने सक्रिय कार्यकर्ताओं की उपस्थिति दो से तीन सौ के आसपास होने का अनुमान लगाया है।
कार्यक्रम में संख्या बढ़ाने के लिए बाहरी लोगों को लाए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य नहीं कहा जा सकता। फिर भी संगठन को पारदर्शिता के साथ बताना चाहिए कि सम्मेलन में कितने ब्लॉक प्रतिनिधि, बूथ अध्यक्ष और पंजीकृत कार्यकर्ता शामिल हुए।
कुर्सियों पर बैठे प्रत्येक व्यक्ति को कार्यकर्ता मान लेना आसान है, लेकिन असली संगठन वही है जो चुनाव, आंदोलन और जनता के संकट के समय मैदान में दिखाई दे।
प्रशंसा बहुत हुई, आत्ममंथन नहीं
संजय दत्त, राव नरेंद्र सिंह और राज बब्बर ने शहरी जिला अध्यक्ष पंकज डावर के कार्य की प्रशंसा की। पंकज डावर ने भी कांग्रेस को हर स्तर पर मजबूत बताया। लेकिन सम्मेलन में संगठन की कमियों पर गंभीर आत्ममंथन होता दिखाई नहीं दिया।
यदि संगठन इतना मजबूत है तो जिला कार्यालय नियमित रूप से सक्रिय क्यों नहीं है? पुराने कार्यकर्ता असंतुष्ट क्यों हैं? लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने वाले नेता क्षेत्र में लगातार सक्रिय क्यों नहीं रहते? ब्लॉक अध्यक्षों की उपलब्धियां और कमियां सार्वजनिक क्यों नहीं की गईं? बूथ समितियों की वास्तविक स्थिति क्या है?
इन प्रश्नों का उत्तर भाजपा सरकार की आलोचना करके नहीं दिया जा सकता। विपक्ष का दायित्व सरकार को घेरना है, लेकिन स्वयं को जनता के सामने भरोसेमंद और सक्रिय विकल्प बनाना भी उतना ही जरूरी है।
दीपेंद्र हुड्डा का हमला प्रभावी, मगर संगठन पर मौन
सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने गुरुग्राम की सफाई व्यवस्था, जलभराव, प्रदूषण, टूटी सड़कों और कथित घोटालों को लेकर सरकार पर प्रभावी हमला किया। उनका यह कथन चर्चा में रहा कि “गुडग़ांव में सफाई तो नहीं हुई, पर रुपया साफ हो गया।”
शहर की मौजूदा स्थिति को देखते हुए उनका हमला राजनीतिक रूप से धारदार था। लेकिन कांग्रेस की अपनी संगठनात्मक समस्याओं, निष्क्रिय जिला कार्यालय और पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी पर मंच से कोई स्पष्ट संदेश सामने नहीं आया।
दीपेंद्र हुड्डा की उपस्थिति ने कार्यक्रम को बड़ा अवश्य बनाया, पर स्थानीय कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में यह प्रश्न भी है कि उन्हें वास्तविक संगठनात्मक मार्गदर्शन के लिए बुलाया गया था या सम्मेलन में भीड़ और राजनीतिक महत्व बढ़ाने के लिए।
बड़े नेताओं को भी पूछने चाहिए थे सवाल
हरियाणा प्रभारी संजय दत्त और प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह को केवल प्रशंसा करने के बजाय जिला संगठन से कुछ बुनियादी सवाल पूछने चाहिए थे—
- जिला कांग्रेस कार्यालय नियमित रूप से क्यों नहीं खुलता?
- वहां किस पदाधिकारी की दैनिक जिम्मेदारी निर्धारित है?
- पिछले एक वर्ष में कितने कार्यकर्ताओं और नागरिकों की शिकायतें सुनी गईं?
- ब्लॉक और बूथ समितियों की वर्तमान स्थिति क्या है?
- पुराने तथा नाराज कांग्रेसजनों को साथ लाने के लिए क्या प्रयास किए गए?
- चुनाव लड़ चुके प्रत्याशी क्षेत्र में नियमित रूप से कितने दिन उपलब्ध रहते हैं?
यदि इन सवालों के उत्तर नहीं लिए गए तो प्रदेश नेतृत्व को वही तस्वीर दिखाई जाएगी, जो आयोजक दिखाना चाहते हैं।
संगठन होटल से नहीं, निरंतर उपस्थिति से बनेगा
सम्मेलन में बड़े नेताओं की मौजूदगी और भाजपा सरकार पर तीखे हमलों ने कुछ समय के लिए राजनीतिक माहौल अवश्य बनाया। लेकिन कांग्रेस की वास्तविक मजबूती का फैसला होटल की सजावट, मंच पर बैठे नेताओं, लंबी उपस्थिति सूची या प्रशंसात्मक प्रेस नोट से नहीं होगा।
असली परीक्षा यह है कि जिला कार्यालय के दरवाजे कितने दिन खुले रहते हैं, कार्यकर्ता की बात कौन सुनता है, चुनाव लड़ चुके नेता हार के बाद कितनी बार क्षेत्र में आते हैं और पुराने जनाधार वाले कांग्रेसजनों को कितने सम्मान के साथ संगठन में स्थान मिलता है।
यदि नेता केवल चुनाव और त्योहारों पर दिखाई दें, जिला कार्यालय निष्क्रिय रहे और कार्यकर्ता सम्मेलन आत्ममंथन के बजाय प्रशंसा समारोह बन जाए, तो संगठन की मजबूती के दावे खोखले लगने लगते हैं।
कार्यकर्ता पार्टी की जान तभी माना जाएगा, जब उसकी जरूरत केवल भीड़ जुटाने और चुनाव लड़ाने के समय नहीं, बल्कि संगठन के हर निर्णय में महसूस की जाए।








