दो हजार दीये जले और गुरुग्राम की सारी समस्याएं ‘रोशन’ हो गईं!

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सड़कों के गड्ढे भर गए, कूड़े के ढेर गायब हो गए और सीवर ने बहना छोड़ दिया—विश्वास न हो तो निगम की चमकती तस्वीरें देख लीजिए

‘आशीर्वाद का दीया’ जला तो जनता पूछ बैठी—हुजूर! एक दीया हमारे मोहल्ले की बंद स्ट्रीट लाइट के नाम भी जला देते

ऋषिप्रकाश कौशिक*

गुरुग्राम की जनता को अब बिल्कुल चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। शहर की सभी समस्याओं का अचूक उपचार नगर निगम ने खोज लिया है। न सड़क बनाने का झंझट, न सीवर साफ करने की मेहनत, न कूड़ा उठाने की परेशानी और न ही बंद स्ट्रीट लाइटों की मरम्मत पर खर्च। बस दीये जलाइए, तस्वीर खिंचवाइए और घोषणा कर दीजिए—स्वच्छ गुरुग्राम, स्वस्थ गुरुग्राम, समृद्ध गुरुग्राम!

सदर बाजार की मल्टी लेवल पार्किंग में नगर निगम द्वारा आयोजित ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम में कथित रूप से 2,000 दीये प्रज्ज्वलित किए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की मंगलकामना की गई। महापौर राज रानी मल्होत्रा, पार्षद, निगम अधिकारी, स्थानीय दुकानदार और नागरिक हाथों में दीये लेकर खड़े हुए। कैमरे चमके, तस्वीरें बनीं और सरकारी प्रेस नोट ने गुरुग्राम को कुछ समय के लिए जगमगाता हुआ घोषित कर दिया।

अब गुरुग्राम की जनता इंतजार कर रही है कि इन 2,000 दीयों का प्रकाश आखिर उसके मोहल्ले तक कब पहुंचेगा।

एक दीया टूटी सड़कों के नाम भी

गुरुग्राम की सड़कों के गड्ढों ने जनता से विनम्र निवेदन किया है कि अगली बार कुछ दीये उनके नाम पर भी जलाए जाएं। वर्षों से वे सड़क के बीच पूरी ईमानदारी के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। बारिश आते ही गड्ढे छोटे-छोटे तालाब बन जाते हैं और वाहन चालक उनमें डुबकी लगाकर नगर निगम की विकास यात्रा का अनुभव करते हैं।

जिस शहर को मिलेनियम सिटी और वैश्विक नगर कहा जाता है, वहां कई सड़कों पर वाहन चलाते समय ऐसा अनुभव होता है, मानो नागरिक चंद्रमा की ऊबड़-खाबड़ सतह पर चल रहे हों। संभव है कि निगम अब गड्ढों को भरने के बजाय उनमें दीये सजाकर उन्हें पर्यटन स्थल घोषित कर दे।

नाम भी अच्छा रहेगा—‘गुरुग्राम गड्ढा दर्शन योजना’।

सीवर बोला—मेरे लिए आशीर्वाद कब?

शहर के सीवर भी इस आयोजन से बहुत प्रभावित हुए हैं। जगह-जगह उफनते सीवर पूछ रहे हैं कि उनके उद्धार के लिए कौन-सा दीपक जलाया जाएगा। जिन कॉलोनियों और सेक्टरों में गंदा पानी सड़कों पर बहता रहता है, वहां के निवासी सोच रहे हैं कि शायद 2,000 दीयों की लौ देखकर सीवर शर्मिंदा हो जाए और वापस पाइपों में चला जाए।

नगर निगम को इस वैज्ञानिक संभावना पर तुरंत शोध कराना चाहिए। यदि दीये जलाने से सीवर साफ हो सकते हैं, तो मशीनों, कर्मचारियों और सफाई बजट की आवश्यकता ही क्या है?

हर मैनहोल के पास दो दीये रख दिए जाएं और उसके सामने एक बोर्ड लगा दिया जाए—
“सीवर देवता, कृपया शांत रहें; नगर निगम आपकी दीर्घायु की कामना करता है।”

कूड़े के पहाड़ पर भी हो दीपोत्सव

गुरुग्राम के कूड़े के ढेर भी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। शहर के अनेक इलाकों, खाली प्लॉटों, सड़कों के किनारे और बाजारों में पड़ा कचरा पूछ रहा है कि जब स्वच्छ गुरुग्राम के नाम पर इतना बड़ा आयोजन हुआ, तो उसे निमंत्रण क्यों नहीं दिया गया?

कूड़ा शहर की व्यवस्था का सबसे स्थायी निवासी बन चुका है। अधिकारी आते-जाते रहते हैं, योजनाएं बनती और बदलती रहती हैं, ठेकेदार बदलते रहते हैं, लेकिन कूड़े का ढेर पूरी निष्ठा से अपने स्थान पर डटा रहता है।

अगली बार निगम को कूड़े के किसी बड़े ढेर पर सामूहिक दीप प्रज्ज्वलन करना चाहिए। इससे कम से कम तस्वीर में कूड़ा थोड़ा चमकदार दिखाई देगा। बदबू को फोटो में कैद नहीं किया जा सकता, इसलिए प्रचार पर उसका कोई प्रतिकूल प्रभाव भी नहीं पड़ेगा।

बंद स्ट्रीट लाइटों को मिली नई प्रेरणा

बाबा प्रकाश पुरी चौक से सेक्टर-5, कृष्णा चौक और रेजांगला चौक तक बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटों ने भी ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि जब सड़कों को रोशन करने का काम मिट्टी के दीयों से लिया जा सकता है, तो उनकी मरम्मत पर सरकारी पैसा क्यों खर्च किया जाए?

जनता बस इतना चाहती है कि अगली बार अधिकारी एक-एक दीया लेकर उन अंधेरी सड़कों पर भी पैदल निकलें, जहां रात में नागरिक जान जोखिम में डालकर चलते हैं। संभव है, अंधेरे में उन्हें वे समस्याएं दिखाई दे जाएं जो वातानुकूलित कार्यालयों और कैमरों की चमक में नजर नहीं आतीं।

बारिश आएगी तो दीये नाव बनेंगे?

गुरुग्राम में थोड़ी-सी तेज बारिश होते ही अनेक सड़कें नदी और अंडरपास स्विमिंग पूल बन जाते हैं। शहर के नागरिक हर मानसून में कार, स्कूटर और कभी-कभी अपनी जान बचाते हुए विकास का आनंद उठाते हैं।

नगर निगम चाहे तो अगले वर्ष जलभराव वाले स्थानों पर ‘तैरता हुआ आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम करा सकता है। दीयों को पानी में छोड़कर यह संदेश दिया जा सकता है कि गुरुग्राम ने सड़क, सीवर और नदी—तीनों व्यवस्थाओं को एक ही स्थान पर उपलब्ध करा दिया है।

इसे प्रशासनिक भाषा में ‘समेकित शहरी विकास’ भी कहा जा सकता है।

प्रॉपर्टी आईडी की पीड़ा पर कितने दीये?

प्रॉपर्टी आईडी ठीक कराने, नाम बदलवाने, गलत क्षेत्रफल सुधरवाने और टैक्स संबंधी त्रुटियों के निवारण के लिए निगम कार्यालयों के चक्कर काटने वाले नागरिक भी आशावान हैं। वे जानना चाहते हैं कि उनकी फाइलों की दीर्घायु के लिए कितने दीये जलाए जाएंगे।

कई फाइलें इतनी दीर्घायु हो चुकी हैं कि उन्हें अब वरिष्ठ नागरिक पेंशन मिलनी चाहिए। नागरिक बूढ़ा हो जाता है, लेकिन उसकी शिकायत जवान बनी रहती है। हर खिड़की पर नया कागज मांगा जाता है और हर कागज जमा करने के बाद नई आपत्ति जन्म ले लेती है।

शायद निगम अगला अभियान शुरू करे—
“एक फाइल, एक दीया; समाधान की उम्मीद जिंदा रखिए।”

आवारा पशु, अतिक्रमण और जाम भी हुए भावुक

सड़कों पर घूमते बेसहारा पशुओं, आवारा कुत्तों, बाजारों के अतिक्रमण और रोजाना लगने वाले यातायात जाम ने भी सामूहिक बयान जारी करके कहा है कि वे दीपों की रोशनी से अत्यंत भावुक हैं, लेकिन शहर छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।

सदर बाजार में पैदल चलने की जगह तलाशते नागरिकों के लिए ‘आशीर्वाद का दीया’ वास्तव में विश्वास की परीक्षा है। बाजारों में अतिक्रमण बना रहे, पार्किंग व्यवस्था चरमराती रहे और ट्रैफिक रेंगता रहे—फिर भी नागरिक को विश्वास रखना चाहिए कि शहर विश्वस्तरीय बनने जा रहा है।

विश्वस्तरीय शहर की सबसे बड़ी पहचान शायद यही है कि उसकी समस्याएं स्थानीय हों और प्रचार अंतरराष्ट्रीय स्तर का।

एक दीया हड़ताली कर्मचारियों और सफाई व्यवस्था के लिए

नगर निगम के सफाई एवं अग्निशमन कर्मचारियों की लंबी हड़ताल, उनकी मांगें और बिगड़ती सफाई व्यवस्था भी हाल के दिनों में शहर की बड़ी चिंता रही हैं। कर्मचारी सड़कों पर आंदोलन करते रहे और जनता कूड़े व गंदगी से जूझती रही।

ऐसे में सेवा और स्वच्छता का संदेश देने वाले समारोह की चमक कुछ अलग ही दिखाई देती है। अच्छा होता कि कुछ दीये कर्मचारियों से हुए समझौतों के पालन, समय पर वेतन, सुरक्षित रोजगार और शहर की वास्तविक सफाई व्यवस्था के नाम भी जलाए जाते।

क्योंकि कैमरे के सामने झाड़ू पकड़ लेने से शहर साफ नहीं होता और दीया हाथ में पकड़ लेने से प्रशासन संवेदनशील नहीं हो जाता।

जनता पूछे तो इसे नकारात्मकता न समझें

गुरुग्राम की जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की मंगलकामना करती है। जन्मदिन मनाना, शुभकामनाएं देना और दीप जलाना किसी का लोकतांत्रिक एवं व्यक्तिगत अधिकार है। सवाल शुभकामनाओं पर नहीं, सरकारी संस्थाओं की प्राथमिकताओं पर है।

जब कार्यक्रम नगर निगम के अभियान के अंतर्गत हो, अधिकारी उसमें शामिल हों और सरकारी प्रचार तंत्र उसका गुणगान करे, तब जनता को पूछने का अधिकार है—

  • 2,000 दीयों, तेल, सजावट, बैनर और आयोजन पर कुल कितना खर्च हुआ?
  • खर्च नगर निगम ने किया, किसी ठेकेदार ने, किसी संस्था ने या दुकानदारों से सहयोग लिया गया?
  • दीयों की संख्या किसने गिनी और कार्यक्रम की उपलब्धि किस पैमाने पर मापी गई?
  • क्या उसी दिन 2,000 बंद स्ट्रीट लाइटों, गड्ढों, सीवर शिकायतों अथवा कूड़े के स्थानों की सूची भी बनाई गई?
  • आयोजन के बाद उस स्थान की सफाई किसने की?
  • ‘सेवा मेरा योगदान’ अभियान में निगम का वास्तविक सेवा-योगदान क्या रहा?

इन सवालों का उत्तर देना ही पारदर्शिता है। इन्हें पूछने वालों को विरोधी, नकारात्मक अथवा विकास-विरोधी बताना आसान है; उत्तर देना थोड़ा कठिन।

महापौर जी, अगला दीया जनता की समस्या पर जलाइए

महापौर राज रानी मल्होत्रा ने सही कहा कि एक छोटा-सा दीपक अंधकार दूर करने का संदेश देता है। गुरुग्राम की जनता भी यही चाहती है कि यह संदेश अब भाषण और फोटो से निकलकर निगम की कार्यप्रणाली तक पहुंचे।

एक दीया भ्रष्टाचार के अंधकार के विरुद्ध जलाइए।
एक दीया ठेकेदारी व्यवस्था की जवाबदेही के लिए।
एक दीया टूटी सड़कों के लिए।
एक दीया उफनते सीवरों के लिए।
एक दीया कूड़े और बदबू से परेशान बस्तियों के लिए।
एक दीया बंद स्ट्रीट लाइटों के लिए।
एक दीया गलत प्रॉपर्टी आईडी से पीड़ित नागरिकों के लिए।
और एक दीया उस करदाता के लिए भी, जो हर साल टैक्स भरता है और बदले में शिकायत संख्या लेकर घर लौट आता है।

बाकी 1,992 दीये अधिकारियों की सद्बुद्धि और व्यवस्था की दीर्घायु के लिए सुरक्षित रखे जा सकते हैं।

तस्वीरों में रोशनी, सड़कों पर अंधेरा

इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि गुरुग्राम में समस्याओं का समाधान होना आवश्यक नहीं, समाधान का फोटो दिखाई देना आवश्यक है। सड़क टूटी हो सकती है, मगर बैनर सीधा होना चाहिए। सीवर उफन सकता है, मगर प्रेस नोट साफ-सुथरा होना चाहिए। कूड़े से बदबू आ सकती है, मगर तस्वीर में मुस्कान कम नहीं होनी चाहिए।

दो हजार दीये जल गए। अब संभव है गुरुग्राम विश्व पटल पर चमक उठे। विदेशी निवेशक आएंगे, गड्ढों को विकास की गहराई समझेंगे, जलभराव को झील पर्यटन मानेंगे और कूड़े के पहाड़ को आधुनिक कला की स्थापना घोषित करेंगे।

फिर भी यदि किसी नागरिक को सड़क, सफाई, सीवर, रोशनी, पानी, अतिक्रमण या प्रॉपर्टी आईडी की समस्या दिखाई दे, तो वह अपनी आंखों को दोष दे—क्योंकि नगर निगम ने तो 2,000 दीये जलाकर साफ कर दिया है कि गुरुग्राम में अब अंधेरा बचा ही नहीं है।

बस जनता की किस्मत का दीया शायद अभी जलना बाकी है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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