वृक्षारोपण की सफलता पौधों की संख्या से नहीं, सही स्थान, देशी प्रजातियों, जीवित रहने की दर और पारिस्थितिकी संतुलन से तय होनी चाहिए
डॉ. विजय गर्ग

पेड़ लगाना जलवायु परिवर्तन से निपटने के सबसे सरल और प्रभावी उपायों में माना जाता है। पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं, ऑक्सीजन छोड़ते हैं, छाया देते हैं, मिट्टी की रक्षा करते हैं और जैव-विविधता को सहारा देते हैं। लेकिन यह मान लेना सही नहीं कि हर खाली दिखाई देने वाली जगह पर अधिक से अधिक पेड़ लगा देना अपने आप पर्यावरण के लिए लाभकारी होगा। पेड़ कहाँ लगाए जा रहे हैं, कौन-सी प्रजातियाँ चुनी गई हैं और उनके कारण किस प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव आएगा—इन सभी प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।
हर खुला क्षेत्र बंजर नहीं
वन केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र होता है। इसी प्रकार घास के मैदान, सवाना, आर्द्रभूमि और झाड़ीदार क्षेत्र भी प्राकृतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। ये जैव-विविधता को बनाए रखने, कार्बन संचित करने और जल-संतुलन नियंत्रित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
इसलिए हर खुले भूभाग को वृक्षारोपण क्षेत्र में बदल देना उचित नहीं है। ऐसा करने से उन प्राकृतिक प्रणालियों को नुकसान पहुँच सकता है, जिनका संरक्षण स्वयं जलवायु कार्रवाई का उद्देश्य है।
प्राकृतिक घास के मैदान और सवाना अनेक पौधों, कीटों, पक्षियों तथा वन्यजीवों के आश्रय स्थल होते हैं। ऐसे क्षेत्रों में घना वृक्षारोपण करने से खुले आवासों पर निर्भर प्रजातियाँ संकट में पड़ सकती हैं। मिट्टी की प्राकृतिक विशेषताएँ बदल सकती हैं और अधिक पानी लेने वाली प्रजातियाँ भूजल पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं।
एकल प्रजाति के जंगल का खतरा
अनुपयुक्त वृक्ष प्रजातियों का चयन भी गंभीर समस्या है। केवल एक प्रजाति के हजारों पेड़ लगाकर तैयार किया गया क्षेत्र देखने में हरा-भरा भले लगे, लेकिन वह विविध प्राकृतिक वन जैसे पारिस्थितिक लाभ नहीं दे सकता।
एकल-प्रजातीय वृक्षारोपण कीटों, रोगों, सूखे और जंगल की आग के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकता है। ऐसे क्षेत्रों में वन्यजीवों को भी भोजन और आश्रय के सीमित विकल्प मिलते हैं। इसके विपरीत देशी प्रजातियों वाला प्राकृतिक वन स्थानीय जलवायु, मिट्टी और जीव-जंतुओं के साथ कहीं बेहतर तालमेल बनाता है।
जल संकट को भी समझना होगा
पेड़ों को बढ़ने के लिए पानी चाहिए। पहले से जल-संकट झेल रहे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण नदियों, जलधाराओं और भूजल पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि पेड़ हानिकारक हैं, बल्कि वृक्षारोपण की योजना स्थानीय जल उपलब्धता, मिट्टी और पारिस्थितिकी परिस्थितियों के अनुरूप बनाई जानी चाहिए।
वृक्षारोपण और वन बहाली में अंतर
पेड़ लगाने और प्राकृतिक वन को पुनर्जीवित करने में बड़ा अंतर है। प्राकृतिक वन कई वर्षों में पेड़ों, झाड़ियों, घास, कवकों, कीटों, पक्षियों और जानवरों की पारस्परिक क्रियाओं से विकसित होता है। हजारों पौधों वाला कृत्रिम वृक्षारोपण भी इस प्राकृतिक जटिलता को पूरी तरह नहीं दोहरा सकता।
इसलिए मौजूदा प्राकृतिक वनों की रक्षा करना अक्सर उन स्थानों पर नए पेड़ लगाने से अधिक महत्वपूर्ण होता है, जहाँ पहले प्राकृतिक रूप से वन थे ही नहीं। क्षतिग्रस्त वनों की बहाली को भी केवल पौधरोपण तक सीमित रखने के बजाय पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्जीवन से जोड़ना होगा।
पौधे लगाने के बाद संरक्षण जरूरी
जलवायु के लिए पेड़ों का लाभ उनकी दीर्घकालिक सुरक्षा पर निर्भर करता है। पेड़ बढ़ने के साथ कार्बन संचित करते हैं, लेकिन वन कटाई, आग, सूखे या रोगों से नष्ट होने पर यही कार्बन दोबारा वायुमंडल में पहुँच सकता है।
इसलिए केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि कितने लाख पौधे लगाए गए। यह भी देखा जाना चाहिए कि उनमें से कितने जीवित बचे, उनकी देखभाल कैसी हुई और वे संबंधित क्षेत्र की पारिस्थितिकी के लिए कितने उपयोगी साबित हुए।
गिनती नहीं, गुणवत्ता बने पैमाना
समाधान वृक्षारोपण बंद करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और समझदारीपूर्ण तरीके से पेड़ लगाना है। स्थानीय एवं देशी प्रजातियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वृक्षारोपण की योजना वैज्ञानिक अध्ययनों, जल उपलब्धता और स्थानीय पारिस्थितिकी के आधार पर तैयार होनी चाहिए।
सरकारों, समुदायों और पर्यावरण संगठनों को सफलता का मूल्यांकन केवल लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं करना चाहिए। पौधों की जीवित रहने की दर, जैव-विविधता को मिलने वाला लाभ, पानी पर प्रभाव, पारिस्थितिक महत्व और दीर्घकालिक कार्बन भंडारण क्षमता भी मूल्यांकन का आधार बनने चाहिए।
जलवायु संरक्षण केवल पौधों की गिनती नहीं, प्रकृति के संतुलन को समझने और बचाने का दायित्व है।
सही जगह पर लगाया गया सही पेड़ एक शक्तिशाली जलवायु समाधान बन सकता है, लेकिन गलत जगह पर गलत प्रजाति का पेड़ नई पर्यावरणीय समस्याएँ पैदा कर सकता है। भविष्य की वनीकरण नीति केवल ‘हर जगह अधिक से अधिक पेड़ लगाओ’ के नारे पर आधारित नहीं होनी चाहिए। उसका मूल सिद्धांत होना चाहिए—प्राकृतिक वनों की रक्षा करें, क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्रों को पुनर्जीवित करें और वहीं पेड़ लगाएँ जहाँ वे प्राकृतिक रूप से उपयुक्त हों।








