सुप्रीम कोर्ट का आदेश बनाम स्थानीय प्रशासन

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जब न्यायपालिका को पूछना पड़ा—मजिस्ट्रेट ऐसा करने की हिम्मत कैसे कर सकता है?

न्यायालय के स्पष्ट आदेश का पालन वैकल्पिक नहीं, संवैधानिक दायित्व है

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी,

लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि सत्ता और प्रशासन कानून के प्रति कितने जवाबदेह हैं। संविधान सर्वोच्च है और न्यायालयों के आदेशों का पालन प्रत्येक अधिकारी की अनिवार्य जिम्मेदारी है। अधिकारी कानून के संरक्षक हैं, कानून से ऊपर नहीं।

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष के एक छात्र से जुड़ा मामला इसी संवैधानिक सिद्धांत पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। रिपोर्टों के अनुसार, ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने 4 सितंबर को छात्र को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया। इसमें छह महीने तक शांति बनाए रखने के लिए पांच लाख रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानतदार देने को कहा गया।

आरोप था कि छात्र ने अन्य विद्यार्थियों को सीजेपी के नेतृत्व वाले प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया, जिससे परिसर में तनाव उत्पन्न होने और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी। छात्र का कहना था कि उसने केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लिया था।

आदेश के बाद भी कार्रवाई क्यों?

मामले की गंभीरता इसलिए बढ़ गई क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर को 20 से 25 जुलाई के प्रदर्शनों से संबंधित अधिकांश एफआईआर रद्द करते हुए छात्रों के खिलाफ आगे दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था। अदालत ने युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए अनुच्छेद 142 के तहत यह राहत दी थी। गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के मामलों को अलग रखा गया था।

ऐसे में सवाल उठा कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के बाद उसी आंदोलन से जुड़े छात्र को नया नोटिस कैसे जारी कर दिया गया?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 9 सितंबर को इस कार्रवाई पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने पूछा कि उसके स्पष्ट आदेश के बावजूद कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऐसा कदम उठाने की हिम्मत कैसे कर सकता है। संबंधित अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगने की बात भी कही गई।

निवारक शक्ति की भी संवैधानिक सीमा

शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र मांगना अपने आप में किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करना नहीं है। कानून-व्यवस्था बिगड़ने की वास्तविक आशंका होने पर प्रशासन को निवारक कार्रवाई का अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का प्रयोग भी संविधान, नागरिक अधिकारों और न्यायिक आदेशों की सीमा के भीतर ही किया जा सकता है।

यदि सुप्रीम कोर्ट किसी आंदोलन में शामिल छात्रों को संरक्षण देता है तो स्थानीय प्रशासन किसी दूसरी प्रक्रिया के माध्यम से उस संरक्षण को अप्रत्यक्ष रूप से निष्प्रभावी नहीं कर सकता। आदेश को लेकर संदेह हो तो अधिकारी कानूनी राय या उच्च अधिकारियों से मार्गदर्शन ले सकता है, लेकिन स्पष्ट निर्देश की अनदेखी कानून के शासन पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

स्थानीय प्रशासन ने बाद में नोटिस वापस ले लिया। फिर भी केवल नोटिस निरस्त करना पर्याप्त नहीं है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह किस आधार पर जारी हुआ, न्यायालय के आदेश की अनदेखी क्यों हुई और भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या व्यवस्था की जाएगी।

जवाबदेही तय करना जरूरी

न्यायालय की अवमानना केवल उसकी प्रतिष्ठा का विषय नहीं, बल्कि नागरिकों को मिले न्यायिक संरक्षण की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है। अदालत से राहत मिलने के बाद भी यदि स्थानीय अधिकारी उसी विषय में कार्रवाई कर सके तो नागरिकों में भय और अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है।

इस विवाद का प्रश्न किसी एक छात्र, मजिस्ट्रेट या पांच लाख रुपये के मुचलके तक सीमित नहीं है। यह न्यायिक आदेश की सर्वोच्चता, प्रशासनिक जवाबदेही, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और कानून के शासन की परीक्षा है।

सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशानिर्देशों का सम्मान करना किसी अधिकारी की इच्छा पर निर्भर नहीं है। यह उसका संवैधानिक दायित्व है। इसलिए नोटिस वापस लेने के साथ यह भी तय होना चाहिए कि न्यायिक आदेश की अवहेलना का उत्तरदायित्व किसका था।

-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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