शराब बन रही काल, बचने का क्या है उपाय?

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जहरीली शराब की त्रासदियां केवल मिलावट नहीं, पुलिस-प्रशासन की विफलता और संगठित अपराध का भी प्रमाण

ज्ञान चंद पाटनी

देश में जहरीली शराब से होने वाली मौतों के बढ़ते मामले गंभीर चिंता का विषय हैं। ताजा घटना मध्यप्रदेश के सागर जिले की है, जहां कथित जहरीली शराब ने 22 लोगों की जान ले ली और बड़ी संख्या में लोगों को अस्पताल पहुंचा दिया। शराब ठेकेदार सहित 30 लोगों के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया और कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। मध्यप्रदेश शराब त्रासदी की रिपोर्ट

एक माह के भीतर देश में यह दूसरी बड़ी शराब त्रासदी है। इससे पहले गुजरात के भावनगर जिले में कथित नकली और जहरीली शराब से एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत हुई थी। इन घटनाओं ने एक बार फिर साबित किया है कि अवैध शराब का कारोबार किसी एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि देशव्यापी संगठित अपराध बन चुका है।

हादसे बार-बार, सबक एक बार भी नहीं

महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम सहित अनेक राज्यों में जहरीली शराब से सामूहिक मौतों की घटनाएं हो चुकी हैं। वर्ष 2015 में मुंबई के मालवानी में जहरीली शराब ने करीब 100 लोगों की जान ले ली थी। पंजाब में वर्ष 2020 में मिलावटी शराब पीने से 100 से अधिक लोग काल के ग्रास में समा गए थे।

शराबबंदी वाले बिहार के सारण जिले में वर्ष 2022 की त्रासदी ने पूरे देश को झकझोर दिया था। जून 2024 में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची जिले में भी जहरीली शराब से 50 से अधिक लोगों की मौत हुई। प्रश्न यह है कि हर बड़ी घटना के बाद जांच, गिरफ्तारी और कठोर कार्रवाई की घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन अवैध शराब का नेटवर्क समाप्त क्यों नहीं होता?

हमारे समाज में शराब की लत के शिकार व्यक्ति को अक्सर घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। इसी कारण जहरीली शराब से मरने वालों और उनके परिवारों को वह सहानुभूति भी नहीं मिल पाती, जिसके वे अधिकारी हैं। शराब पीना व्यक्ति की कमजोरी हो सकती है, लेकिन उसे जहरीला पदार्थ बेचकर मार देना सुनियोजित अपराध है।

बोतल ब्रांडेड, भीतर मौत

मध्यप्रदेश और गुजरात की हालिया घटनाओं में एक समानता सामने आई है—शराब को कथित रूप से ब्रांडेड उत्पाद बताकर बेचा गया। इससे संकेत मिलता है कि शराब माफिया अवैध रूप से तैयार शराब को नकली लेबल और पैकिंग के सहारे बाजार में उतार रहा है। उपभोक्ता बोतल और ब्रांड देखकर उसे असली समझ लेता है, जबकि भीतर मौत भरी होती है।

पीने योग्य शराब में एथेनॉल होता है, जबकि जहरीली शराब में प्रायः मेथनॉल की मिलावट पाई जाती है। मेथनॉल एक विषैला औद्योगिक रसायन है। इसकी गंध और स्वाद एथेनॉल से मिलते-जुलते हो सकते हैं, इसलिए सामान्य व्यक्ति मिलावट को आसानी से पहचान नहीं पाता। इसके सेवन से आंखों की रोशनी जाने, गुर्दे और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचने तथा मृत्यु तक का खतरा रहता है।

इसलिए केवल उपभोक्ता को सावधान रहने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। नकली बोतल, ढक्कन, होलोग्राम और लेबल तैयार करने वाले पूरे नेटवर्क की पहचान कर उसे ध्वस्त करना होगा।

महंगी शराब, मजबूत होता अवैध बाजार

संविधान के अनुच्छेद 47 में राज्य से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन को रोकने की दिशा में प्रयास करने की अपेक्षा की गई है। इसी आधार पर शराब पर अधिक कर लगाने और शराबबंदी लागू करने की पैरवी होती रही है।

स्वास्थ्य, परिवार और समाज को शराब से होने वाले नुकसान को देखते हुए इन कदमों की भावना उचित लगती है। लेकिन इनके व्यावहारिक परिणामों की भी समीक्षा आवश्यक है। अत्यधिक कर के कारण वैध शराब महंगी होती है तो कम आय वाले लोग सस्ते अवैध विकल्पों की ओर मुड़ते हैं। इसी मांग का लाभ शराब माफिया उठाता है।

सागर के मामले में भी बताया गया कि कथित नकली शराब वैध शराब से सस्ती थी और बेचने वालों ने लोगों को उसके असली होने का भरोसा दिलाया था। सस्ती कीमत और परिचित विक्रेता पर विश्वास अनेक लोगों के लिए जानलेवा साबित हुआ।

शराब पर कर लगाते समय केवल सरकारी राजस्व नहीं, जनस्वास्थ्य और अवैध कारोबार पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए। कीमतों को इस प्रकार तर्कसंगत बनाया जाए कि अवैध शराब के लिए बड़ा बाजार तैयार न हो।

शराबबंदी से समस्या खत्म क्यों नहीं होती?

शराबबंदी के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क जनस्वास्थ्य, महिलाओं की सुरक्षा और परिवारों को आर्थिक-सामाजिक बर्बादी से बचाना है। लेकिन पूर्ण शराबबंदी लागू होने पर यदि निगरानी और कानून का पालन कमजोर रहे तो भूमिगत बाजार तेजी से फैलता है।

हरियाणा ने वर्ष 1996 में शराबबंदी लागू की थी, लेकिन वर्ष 1998 में इसे वापस लेना पड़ा। आंध्र प्रदेश में भी शराबबंदी लंबे समय तक नहीं चल सकी। केरल, मणिपुर और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी अलग-अलग समय पर इसके प्रयोग और बदलाव हुए हैं। गुजरात और बिहार में शराबबंदी लागू है, फिर भी वहां शराब की तस्करी और जहरीली शराब की घटनाएं सामने आती रहती हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि शराबबंदी का उद्देश्य गलत है। वास्तविक समस्या उस नीति को लागू करने की क्षमता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक ईमानदारी की है। प्रतिबंध तभी प्रभावी हो सकता है, जब तस्करी, अवैध निर्माण और संरक्षण देने वाले तंत्र पर एक साथ प्रहार किया जाए।

मिलीभगत की जांच भी जरूरी

जिन राज्यों में शराबबंदी है, वहां भी शराब माफिया सक्रिय है और जिन राज्यों में शराबबंदी नहीं है, वहां भी नकली शराब खुलेआम बिक रही है। ऐसे में सवाल पुलिस, आबकारी विभाग और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर उठता है।

अवैध शराब का निर्माण और वितरण कोई ऐसा अपराध नहीं, जो एक रात में अचानक खड़ा हो जाए। इसके लिए कच्चा माल आता है, शराब बनाई जाती है, बोतलें और नकली लेबल तैयार होते हैं, माल का परिवहन होता है और फिर उसे गांवों एवं बस्तियों में बेचा जाता है। इतना बड़ा नेटवर्क स्थानीय संरक्षण या गंभीर प्रशासनिक लापरवाही के बिना लंबे समय तक नहीं चल सकता।

हर त्रासदी में केवल छोटे विक्रेताओं को गिरफ्तार कर कार्रवाई पूरी मान लेना पर्याप्त नहीं है। शराब माफिया को राजनीतिक अथवा प्रशासनिक संरक्षण देने वालों, संदिग्ध अधिकारियों और वित्तीय लाभार्थियों तक जांच पहुंचनी चाहिए। दोषी अधिकारियों पर भी आपराधिक दायित्व तय किया जाना चाहिए।

दंड के साथ उपचार और पुनर्वास भी

विश्व स्वास्थ्य संगठन के नवीनतम उपलब्ध वैश्विक आकलन के अनुसार वर्ष 2019 में शराब के सेवन से लगभग 26 लाख मौतें हुई थीं। यह आंकड़ा बताता है कि समस्या केवल जहरीली शराब तक सीमित नहीं है; शराब का सामान्य सेवन भी बीमारियों, दुर्घटनाओं, हिंसा और असमय मृत्यु का बड़ा कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट

शराब की लत को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना भूल होगी। यह जनस्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न भी है। नशामुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए, उपचार को गरीबों की पहुंच में लाया जाए और पुनर्वास के बाद रोजगार से जोड़ने की व्यवस्था बने। महिलाओं और बच्चों के लिए सहायता तंत्र तथा घरेलू हिंसा से सुरक्षा के उपाय भी मजबूत किए जाएं।

जहरीली शराब से होने वाली मौतें रोकने के लिए अवैध निर्माण के ठिकानों पर कठोर कार्रवाई, औद्योगिक मेथनॉल की आपूर्ति की निगरानी, शराब की बोतलों की डिजिटल पहचान, नियमित नमूना जांच और त्वरित सूचना तंत्र जरूरी है।

सबसे बढ़कर समाज में शराब के विरुद्ध प्रभावी जनजागरण चलाना होगा। लोगों को यह समझना होगा कि शराब कम पी जाए या अधिक, वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ही है। सरकार को भी तय करना होगा कि उसके लिए शराब से मिलने वाला राजस्व अधिक महत्वपूर्ण है या नागरिकों का जीवन।

जहरीली शराब से मौतें तभी रुकेंगी, जब कार्रवाई हादसे के बाद नहीं, जहरीली शराब बनने और बाजार तक पहुंचने से पहले होगी।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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