संस्कृत जीवित और व्यावहारिक भाषा, इसमें असीम संभावनाएं : प्रो. वीरेंद्र पाल

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कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा एवं संस्कृत के विविध आयाम’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित

कुरुक्षेत्र, 9 सितम्बर (प्रमोद कौशिक)। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. वीरेंद्र पाल ने कहा कि संस्कृत केवल प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि जीवित एवं व्यावहारिक भाषा है। इसमें ज्ञान, विज्ञान और शोध की असीम संभावनाएं हैं। संस्कृत शास्त्रों की जीवंत परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए उनके अध्ययन और अध्यापन को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।

प्रो. वीरेंद्र पाल बुधवार को कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में संस्कृत विभाग, इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड एंड ऑनर्स स्टडीज तथा हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, पंचकूला के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। संगोष्ठी का विषय ‘भारतीय ज्ञान परम्परा एवं संस्कृत के विविध आयाम’ रहा।

संस्कृत भारत की पहचान : डॉ. प्रशस्यमित्र शास्त्री

राष्ट्रपति सम्मान एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित संस्कृत के राष्ट्रीय कवि डॉ. प्रशस्यमित्र शास्त्री ने मुख्य वक्ता के रूप में संस्कृत के गौरवपूर्ण इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारत की पहचान है। विश्व में भारत की प्रतिष्ठा अनादिकाल से संस्कृत में निहित ज्ञान-विज्ञान के कारण बनी हुई है।

डॉ. शास्त्री ने संस्कृत में काव्यमयी प्रस्तुतियां देकर भाषा की जीवंतता और समृद्ध परम्परा को साकार किया।

संस्थान की प्राचार्या प्रो. रीटा ने अध्यक्षीय वक्तव्य में संस्कृत विभाग को आयोजन के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को भारतीय ज्ञान परम्परा से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

संस्कृत के उन्नयन के लिए शुरू होंगे नए प्रकल्प

संगोष्ठी के संयोजक एवं संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. रामचन्द्र ने बताया कि विश्वविद्यालय परिसर में संस्कृत शिक्षण और शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संगोष्ठी आयोजित की गई है। यहां सामने आए विचारों एवं निष्कर्षों के आधार पर संस्कृत के उन्नयन के लिए नए प्रकल्प आरम्भ किए जाएंगे।

विशिष्ट अतिथि डॉ. सीडीएस कौशल ने सामाजिक मूल्यों के क्षरण पर चिंता व्यक्त करते हुए इनके पुनरुद्धार के लिए संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन को आवश्यक बताया। प्रो. कृष्णा देवी ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में संस्कृत की समृद्ध परम्परा की जानकारी दी।

शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए शोध-पत्र

तकनीकी सत्र में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय तथा हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़ सहित विभिन्न शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों और शोधार्थियों ने ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इनमें अंजु रानी, डॉ. देवेंद्र सिंह, भूपेंद्र शर्मा, मंगतराम, किरण देवी और अनिल कुमार प्रमुख रूप से शामिल रहे।

तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. सीडीएस कौशल ने की, जबकि डॉ. विनोद कुमार शर्मा सह-अध्यक्ष रहे। संगोष्ठी में प्रो. आरके देशवाल, प्रो. भगत सिंह, प्रो. एलके गौड़, प्रो. महासिंह पूनिया, डॉ. जिम्मी शर्मा, डॉ. विजयश्री, डॉ. तेलूराम, डॉ. कृष्ण आर्य और विश्वदीपक आर्य सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।

विश्वविद्यालय के शिलालेखों पर फिर दिखाई देगी संस्कृत

कुलसचिव प्रो. वीरेंद्र पाल ने कहा कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की स्थापना संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में हुई थी और इसके आरम्भिक शिलालेख संस्कृत में लिखे गए थे। विश्वविद्यालय की इस गौरवपूर्ण परम्परा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाएगा। भविष्य में विश्वविद्यालय के शिलालेखों पर संस्कृत भाषा भी दिखाई देगी।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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