प्रॉक्सी शिक्षक, अनुपस्थिति और नशाखोरी जैसी शिकायतें शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल; सम्मान, संसाधन और जवाबदेही—तीनों का संतुलन जरूरी
शिक्षा के मंदिर में ‘गुरु’ या महज गैर-जिम्मेदार कर्मचारी? कुछ शिक्षकों की लापरवाही से पूरे समुदाय की प्रतिष्ठा प्रभावित न हो, इसके लिए निष्पक्ष निगरानी और समयबद्ध कार्रवाई आवश्यक
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया, महाराष्ट्र – भारत में हर वर्ष 5 सितंबर को पूर्व राष्ट्रपति दार्शनिक और शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती राष्ट्रीय शिक्षक दिवस के रूप में मनाई जाती है। इस दिन विद्यार्थी शिक्षकों को शुभकामनाएं देते हैं, फूल भेंट करते हैं और शिक्षण संस्थानों में सम्मान समारोह आयोजित किए जाते हैं।
लेकिन शिक्षक दिवस का अर्थ केवल अभिनंदन और औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह शिक्षा व्यवस्था के आत्ममंथन का भी अवसर है। समाज को पूछना होगा कि राष्ट्र निर्माता कहे जाने वाले शिक्षक की सामाजिक प्रतिष्ठा, पेशेवर जिम्मेदारी और जवाबदेही आज किस स्थिति में है।
भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा में गुरु को केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि संस्कार, चरित्र, विवेक और जीवन-दृष्टि देने वाला मार्गदर्शक माना गया है। इसलिए शिक्षक का आचरण उसका निजी मामला भर नहीं रह जाता। उसका प्रभाव विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और अंततः समाज के चरित्र पर पड़ता है।
अधिकार के साथ जुड़ी है जवाबदेही
संविधान का अनुच्छेद 21-ए और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 छह से चौदह वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देते हैं। इसी कानून की धारा 24 में शिक्षकों के कर्तव्य और शिकायत निवारण का प्रावधान है, जबकि धारा 28 शिक्षकों द्वारा निजी ट्यूशन देने पर रोक लगाती है।
इससे स्पष्ट है कि शिक्षक का नियमित रूप से विद्यालय आना, समय पर पाठ्यक्रम पूरा करना, प्रत्येक बच्चे की सीखने की क्षमता का आकलन करना और अभिभावकों को उसकी प्रगति की जानकारी देना केवल नैतिक अपेक्षा नहीं, कानूनी दायित्व भी है।
इसके बावजूद कुछ विद्यालयों से शिक्षकों की अनियमित उपस्थिति, समय से पहले चले जाने, शिक्षण के स्थान पर केवल कागजी खानापूर्ति करने और नशे की हालत में विद्यालय पहुंचने जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसी घटनाओं को पूरे शिक्षक समुदाय का चरित्र नहीं माना जा सकता। देश के लाखों शिक्षक कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बीच समर्पण से बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं। फिर भी प्रमाणित कदाचार को शिक्षक सम्मान के नाम पर छिपाना भी उचित नहीं होगा।
प्रॉक्सी शिक्षक सबसे गंभीर छल
सबसे चिंताजनक शिकायत कथित ‘प्रॉक्सी शिक्षक’ व्यवस्था की है। इसका अर्थ है—नियुक्त शिक्षक का स्वयं विद्यालय न जाकर किसी रिश्तेदार अथवा कम वेतन पर रखे गए व्यक्ति से अपनी जगह पढ़ाई करवाना।
यदि किसी मामले में ऐसा आरोप प्रमाणित होता है तो यह साधारण अनुपस्थिति नहीं, बल्कि विद्यार्थियों, सरकार और सार्वजनिक धन—तीनों के साथ गंभीर विश्वासघात है। नियुक्त शिक्षक को वेतन निर्धारित सेवा के लिए दिया जाता है। उसके स्थान पर अनधिकृत व्यक्ति से शिक्षण कराना बच्चों की सुरक्षा, शिक्षण गुणवत्ता और शिक्षा के अधिकार पर भी सवाल खड़ा करता है।
ऐसे मामलों में पहले निष्पक्ष विभागीय जांच होनी चाहिए। आरोप सिद्ध होने पर सेवा नियमों के अनुसार कठोर कार्रवाई और परिस्थितियों के अनुरूप कानूनी उत्तरदायित्व तय किया जाना चाहिए। शिकायत और दोषसिद्धि के अंतर को बनाए रखना भी आवश्यक है, क्योंकि बिना जांच किसी शिक्षक को सार्वजनिक रूप से दोषी ठहराना प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध होगा।
नशा केवल अनुशासनहीनता नहीं
यदि कोई शिक्षक विद्यालय में नशे की हालत में आता है या परिसर में तंबाकू अथवा दूसरे नशीले पदार्थों का सेवन करता है तो उसका प्रभाव सेवा अनुशासन से कहीं आगे जाता है। बच्चे शिक्षक को आदर्श मानते हैं। शिक्षक का ऐसा आचरण विद्यार्थियों के सामने गलत सामाजिक उदाहरण प्रस्तुत करता है और विद्यालय के सुरक्षित वातावरण को प्रभावित करता है।
प्रमाणित मामले में तत्काल प्रशासनिक कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, जहां नशे की निर्भरता स्वास्थ्य समस्या बन चुकी हो, वहां दंड के साथ परामर्श और नशामुक्ति उपचार की व्यवस्था भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। उद्देश्य केवल कर्मचारी को दंडित करना नहीं, बच्चों के हितों और विद्यालय की गरिमा की रक्षा करना होना चाहिए।
केवल तकनीकी निगरानी पर्याप्त नहीं
बायोमेट्रिक या स्थान-आधारित उपस्थिति, डिजिटल निरीक्षण रिकॉर्ड और ऑनलाइन शिकायत प्रणाली से पारदर्शिता बढ़ाई जा सकती है। लेकिन चेहरे की पहचान जैसी तकनीक लागू करते समय निजता, डेटा सुरक्षा, गलत पहचान और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट-बिजली की उपलब्धता का ध्यान रखना जरूरी है।
तकनीक यह बता सकती है कि शिक्षक विद्यालय पहुंचा या नहीं, लेकिन यह नहीं बता सकती कि उसने कक्षा में कितनी संवेदनशीलता और गुणवत्ता से पढ़ाया। इसलिए डिजिटल उपस्थिति के साथ शैक्षणिक निरीक्षण, विद्यार्थियों की सीखने की प्रगति और अभिभावकों की प्रतिक्रिया को भी महत्व देना होगा।
सम्मान और अनुशासन दोनों जरूरी
समस्या का समाधान केवल कठोर दंड में नहीं है। शिक्षकों से जवाबदेही मांगने के साथ सरकार को पर्याप्त स्टाफ, सुरक्षित कार्यस्थल, नियमित प्रशिक्षण, समय पर पदोन्नति और गैर-शैक्षणिक कार्यों से राहत भी देनी होगी।
ईमानदार एवं उत्कृष्ट शिक्षकों को सार्वजनिक सम्मान और प्रोत्साहन मिले, जबकि प्रमाणित गंभीर कदाचार पर राजनीतिक, प्रशासनिक या संगठनात्मक संरक्षण न दिया जाए। शिकायत प्रणाली स्वतंत्र और समयबद्ध हो तथा झूठी अथवा दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से शिक्षक की प्रतिष्ठा की रक्षा का प्रावधान भी रहे।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 1966 की आईएलओ-यूनेस्को सिफारिश शिक्षकों के अधिकारों और उत्तरदायित्वों के साथ उनके प्रशिक्षण, रोजगार तथा कार्य-परिस्थितियों को एक-दूसरे से जुड़ा मानती है। यह वैश्विक मानक वर्तमान तकनीकी और सामाजिक बदलावों के अनुरूप संशोधन की प्रक्रिया में भी है।
भारत में भी एक प्रभावी शिक्षक जवाबदेही व्यवस्था चार स्तंभों पर खड़ी की जा सकती है—
- स्पष्ट और समान पेशेवर आचार संहिता।
- पारदर्शी उपस्थिति एवं नियमित शैक्षणिक निरीक्षण।
- शिकायतों की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच।
- ईमानदार एवं उत्कृष्ट शिक्षकों को सम्मान, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन।
शिक्षक दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि शिक्षक का सम्मान और उसकी जवाबदेही परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। सरकार संसाधन और बेहतर कार्य परिस्थितियां दे, समाज शिक्षक को उचित प्रतिष्ठा प्रदान करे और शिक्षक समुदाय भी अपने पेशे की असाधारण जिम्मेदारी को स्वीकार करे।
एक चिकित्सक की गलती किसी व्यक्ति का जीवन प्रभावित कर सकती है, लेकिन शिक्षक की निरंतर उपेक्षा पूरी पीढ़ी की सोच, क्षमता और चरित्र को नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए 5 सितंबर केवल फूल और शुभकामनाएं देने का दिन नहीं, शिक्षा की आत्मा को बचाने का संकल्प दिवस भी बने। यही डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।









