क्रीमी लेयर से लेकर कौशल विकास तक—सामाजिक न्याय की व्यवस्था में सुधार जरूरी, लेकिन ऐतिहासिक भेदभाव और संवैधानिक तथ्यों की अनदेखी भी उचित नहीं
अनिल धर्मदेश

आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था में बदलाव और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए भी क्रीमी लेयर लागू करने की मांग को लेकर दिल्ली में हाल में प्रदर्शन हुए हैं। प्रदर्शनकारियों ने जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा, आर्थिक स्थिति को अधिक महत्व देने और आरक्षण का लाभ वास्तविक रूप से वंचित परिवारों तक पहुंचाने की मांग उठाई। अगस्त 2026 में जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस पर हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में भी लिया।
आंदोलनकारियों का तर्क है कि विधायक, मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के बच्चों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आरक्षण का लाभ मिलने से उसी समुदाय के अत्यंत गरीब और वंचित परिवार पीछे रह जाते हैं। इसलिए आरक्षण के भीतर ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिससे लाभ कुछ प्रभावशाली परिवारों तक सीमित न रहे।
यह प्रश्न विचार योग्य है, लेकिन इसे केवल सामान्य और आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों के अंकों की तुलना तक सीमित कर देना समस्या का अत्यधिक सरलीकरण होगा। आरक्षण मूलतः गरीबी उन्मूलन योजना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और सरकारी संस्थानों में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को दूर करने का संवैधानिक उपाय है। आर्थिक संपन्नता से किसी परिवार की शैक्षणिक सुविधाएं बढ़ सकती हैं, लेकिन उससे जातिगत भेदभाव स्वतः समाप्त हो जाए, यह आवश्यक नहीं।
क्रीमी लेयर पर अधूरी बहस
अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू है, लेकिन अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण में अभी ऐसी सार्वदेशिक व्यवस्था नहीं है। अगस्त 2024 के पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय संविधान पीठ ने अनुसूचित जातियों के भीतर उपवर्गीकरण की संवैधानिक अनुमति दी थी। निर्णय में कुछ न्यायाधीशों ने एससी-एसटी में क्रीमी लेयर की पहचान करने की आवश्यकता भी व्यक्त की, पर इसे अपने-आप लागू हो चुका देशव्यापी नियम नहीं माना जा सकता।
केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने का विरोध किया। सरकार का तर्क है कि इन वर्गों का पिछड़ापन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अस्पृश्यता, सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव से जुड़ा है।
इसलिए आवश्यक है कि क्रीमी लेयर पर निर्णय नारे या राजनीतिक दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, शिक्षा, सामाजिक भेदभाव और आरक्षण के वास्तविक लाभार्थियों से संबंधित विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर लिया जाए।
क्या आरक्षण केवल दस वर्ष के लिए था?
यह प्रचलित दावा तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है कि संविधान निर्माताओं ने शिक्षा और सरकारी नौकरियों का आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए दिया था। संविधान के अनुच्छेद 334 में दस वर्ष की प्रारंभिक समय-सीमा लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए सीटों के आरक्षण तथा एंग्लो-इंडियन प्रतिनिधित्व से संबंधित थी। शिक्षा और सरकारी सेवाओं के आरक्षण पर यह समय-सीमा लागू नहीं थी।
इस तथ्य के बावजूद यह सवाल पूरी तरह उचित है कि दशकों से लागू किसी भी नीति के परिणामों की समय-समय पर निष्पक्ष समीक्षा क्यों न हो। समीक्षा का अर्थ अधिकारों को समाप्त करना नहीं, बल्कि यह देखना है कि नीति अपने घोषित उद्देश्य तक कितनी पहुंची और उसके लाभ में कहीं असमानता तो पैदा नहीं हुई।
आरक्षण के साथ क्षमता निर्माण भी जरूरी
आरक्षण को सामाजिक न्याय का एकमात्र साधन मान लेना भी पर्याप्त नहीं है। वंचित समुदायों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, छात्रावास, छात्रवृत्ति, डिजिटल संसाधन, प्रतियोगी परीक्षाओं की निशुल्क तैयारी और कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराना कहीं अधिक स्थायी परिवर्तन ला सकता है।
प्रत्येक जिले में उच्च गुणवत्ता वाले आवासीय विद्यालय तथा कौशल विकास केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं। विद्यार्थियों की रुचि और योग्यता पहचानकर उन्हें तकनीकी शिक्षा, कृषि प्रसंस्करण, आधुनिक सेवाओं, उद्यमिता और स्थानीय उद्योगों से जोड़ा जाना चाहिए। स्वरोजगार शुरू करने के इच्छुक युवाओं को प्रशिक्षण के साथ ब्याजमुक्त या कम ब्याज वाला ऋण, बाजार तक पहुंच और शुरुआती मार्गदर्शन मिलना चाहिए।
लेकिन ऐसी संस्थाएं किसी समुदाय को शेष समाज से अलग रखने वाली नहीं होनी चाहिए। केवल एससी-एसटी विद्यार्थियों के लिए पृथक विश्वविद्यालय बनाने का विचार भेदभाव रहित वातावरण की दृष्टि से आकर्षक लग सकता है, पर इससे सामाजिक अलगाव का खतरा भी पैदा होगा। अधिक उपयोगी मॉडल समावेशी और उत्कृष्ट सार्वजनिक संस्थानों का होगा, जिनमें वंचित विद्यार्थियों को तैयारी, आर्थिक सहायता और सुरक्षित वातावरण की विशेष सुविधा मिले।
अवसर की समानता केवल परीक्षा कक्ष से शुरू नहीं होती
प्रतियोगिता में प्राप्त अंक महत्वपूर्ण हैं, पर सभी अभ्यर्थियों की शुरुआती परिस्थितियां समान नहीं होतीं। एक विद्यार्थी अच्छे निजी विद्यालय, कोचिंग और शिक्षित पारिवारिक वातावरण के साथ परीक्षा देता है, जबकि दूसरा कमजोर विद्यालय, संसाधनों की कमी और सामाजिक भेदभाव से जूझते हुए उसी परीक्षा में पहुंचता है। इसलिए अंक को प्रतिभा का एकमात्र और अंतिम पैमाना मानना भी उचित नहीं होगा।
साथ ही, आरक्षण के नाम पर न्यूनतम योग्यता और संस्थागत गुणवत्ता से समझौता नहीं होना चाहिए। समाधान आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को अयोग्य घोषित करना नहीं, बल्कि विद्यालय से उच्च शिक्षा तक उनकी तैयारी मजबूत करना और चयन के बाद आवश्यक शैक्षणिक सहयोग उपलब्ध कराना है।
आंकड़ों पर आधारित सुधार की आवश्यकता
सरकार को जातिवार सामाजिक-आर्थिक स्थिति, उच्च शिक्षा में भागीदारी, सरकारी सेवाओं में वास्तविक प्रतिनिधित्व और आरक्षण से लाभान्वित परिवारों की पीढ़ीगत स्थिति पर विश्वसनीय आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। इन्हीं के आधार पर उपवर्गीकरण, क्रीमी लेयर अथवा अन्य सुधारों पर राष्ट्रीय सहमति बनाई जा सकती है।
नीति का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि लाभ समुदाय के सबसे प्रभावशाली परिवारों तक सीमित न रहे और वास्तविक वंचित पीछे न छूटें। इसके साथ ही सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए शिक्षा, छात्रवृत्ति और अवसरों का विस्तार भी आवश्यक है।
2047 का लक्ष्य : आरक्षण-मुक्ति नहीं, भेदभाव-मुक्ति
आरक्षण की समाप्ति की कोई तारीख घोषित कर देना आसान है, लेकिन उसके मूल कारणों—जातिगत भेदभाव, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की असमानता और प्रतिनिधित्व के अंतर—को समाप्त करना कठिन है। विकसित भारत का लक्ष्य केवल आरक्षण-मुक्त समाज नहीं, बल्कि ऐसा भेदभाव-मुक्त और अवसर-संपन्न समाज होना चाहिए जिसमें आरक्षण की आवश्यकता स्वाभाविक रूप से कम होती जाए।
आरक्षण पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है और उसके भीतर सुधार की मांग को भी असंवेदनशील कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। उसी प्रकार आरक्षण को केवल अंक और आर्थिक स्थिति के चश्मे से देखकर ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय को नकारना भी उचित नहीं होगा। देश को टकराव नहीं, तथ्यों पर आधारित संवाद और आरक्षण के साथ शिक्षा, कौशल तथा आर्थिक स्वावलंबन का व्यापक मॉडल चाहिए।









