स्वर्ग और नरक कहीं दूर नहीं, इसी धरती पर हैं

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सम्मानजनक जीवन ही स्वर्ग है; अभाव, अन्याय और अपमान मनुष्य द्वारा निर्मित नरक

सरदूल सिंह

‘स्वर्ग’ और ‘नरक’ ऐसे शब्द हैं, जिन्हें मनुष्य सदियों से सुनता आया है। धार्मिक आख्यानों और लोककथाओं में स्वर्ग को सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण तथा नरक को असहनीय पीड़ा के स्थान के रूप में चित्रित किया गया है। इन दोनों अवस्थाओं को सामान्यतः मृत्यु के बाद मिलने वाले फल से जोड़कर देखा जाता है।

लेकिन क्या स्वर्ग और नरक केवल किसी अदृश्य लोक की कल्पनाएँ हैं? हमारे आसपास उपस्थित आर्थिक विषमता, गरीबी, बीमारी और अभाव बताते हैं कि मनुष्य अपने जीवनकाल में ही इन दोनों अनुभवों से गुजरता है।

बदली स्वर्ग और नरक की परिभाषा

विज्ञान और सामाजिक चेतना के विकास के साथ इन अवधारणाओं की व्याख्या भी बदली है। पृथ्वी के बाहर जीवन की अब तक कोई प्रमाणित वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए मनुष्य का प्रत्यक्ष सुख-दुख इसी धरती और इसी जीवन से जुड़ा है।

जिस व्यक्ति को पौष्टिक भोजन, सुरक्षित आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समय पर उपचार, सम्मानजनक रोजगार और सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है, उसके लिए यही संसार स्वर्ग जैसा हो सकता है। इसके विपरीत भूख, बेरोजगारी, बीमारी, उत्पीड़न और अपमान के बीच जीवन बिताने वाला व्यक्ति इसी धरती पर नरक का अनुभव करता है।

एक देश में दो दुनिया

भारत की आर्थिक और सामाजिक विषमता इस अंतर को और स्पष्ट करती है। विश्व असमानता प्रयोगशाला के अध्ययन के अनुसार वर्ष 2022-23 में देश की शीर्ष एक प्रतिशत आबादी के पास लगभग 40.1 प्रतिशत संपत्ति थी। यह आँकड़ा बताता है कि आर्थिक विकास के बावजूद संसाधनों का वितरण अत्यंत असमान बना हुआ है।

एक ओर सुरक्षित आवास, वातानुकूलित विद्यालय, आधुनिक अस्पताल और आरामदायक परिवहन उपलब्ध हैं। दूसरी ओर बड़ी आबादी जर्जर विद्यालयों, अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं, असुरक्षित रोजगार और भीड़भरे सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर है। इसी विरोधाभास को कई बार सुविधासंपन्न ‘इंडिया’ और संघर्षरत ‘भारत’ के रूप में व्यक्त किया जाता है।

स्वास्थ्य और शिक्षा में गहरी खाई

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार देश में छह महीने से पांच वर्ष तक के 67.1 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से प्रभावित पाए गए। प्रजनन आयु वर्ग की 57 प्रतिशत महिलाओं और 52.2 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में भी एनीमिया दर्ज किया गया। मूल आलेख में गर्भवती महिलाओं के लिए 57 प्रतिशत लिखा गया था, जिसे आधिकारिक आँकड़े के अनुसार सुधारा गया है।

शिक्षा में भी यही अंतर दिखाई देता है। एक तरफ आधुनिक प्रयोगशालाओं, डिजिटल कक्षाओं और पर्याप्त शिक्षकों वाले महंगे निजी विद्यालय हैं; दूसरी ओर अनेक सरकारी विद्यालय शिक्षकों तथा बुनियादी संसाधनों की कमी से जूझते हैं। अवसरों का यह असमान आरंभ आगे चलकर आय और जीवन-स्तर की विषमता को और बढ़ा देता है।

स्वास्थ्य सेवाओं में कहीं अत्याधुनिक कॉरपोरेट अस्पताल हैं, तो कहीं मरीजों को उपचार और जांच के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। उपचार की गुणवत्ता किसी व्यक्ति की आवश्यकता के बजाय उसकी भुगतान-क्षमता पर निर्भर होने लगे, तो स्वास्थ्य अधिकार नहीं, बाजार की वस्तु बन जाता है।

रिश्तों पर भी आर्थिक दबाव

विवाह को केवल आर्थिक अनुबंध मान लेना उचित नहीं होगा, क्योंकि रिश्ते प्रेम, विश्वास, संस्कार और आपसी समझ पर भी टिके होते हैं। फिर भी यह सच है कि आर्थिक असुरक्षा विवाह और पारिवारिक जीवन को प्रभावित करती है। बेरोजगारी, कर्ज और आय की अनिश्चितता रिश्तों में तनाव बढ़ा सकती है, जबकि स्थिर आय और सामाजिक सुरक्षा परिवार को बेहतर जीवन का आधार देती है।

इस प्रकार आर्थिक परिस्थितियाँ कई बार वैवाहिक जीवन को सुखद ‘स्वर्ग’ या तनावपूर्ण ‘नरक’ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

आत्महत्या के आँकड़े की वास्तविकता

मूल आलेख में प्रतिवर्ष लगभग दो लाख आत्महत्याओं और उनमें किसानों, मजदूरों तथा विद्यार्थियों की सर्वाधिक संख्या होने का दावा किया गया था। उपलब्ध नवीनतम एनसीआरबी आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 में देश में 1,71,418 आत्महत्याएँ दर्ज हुईं। इसलिए दो लाख का आँकड़ा और तीन वर्गों को सामूहिक रूप से सर्वाधिक बताना प्रमाणित रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। आत्महत्या के पीछे पारिवारिक, स्वास्थ्य, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक सहित अनेक जटिल कारण होते हैं; इसे केवल गरीबी का प्रत्यक्ष परिणाम नहीं माना जा सकता।

तकनीक किसके लिए?

आधुनिक विज्ञान और तकनीक ने उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ा दी है। मशीनें कठिन शारीरिक श्रम घटा सकती हैं और मनुष्य को शिक्षा, कला, परिवार तथा सामाजिक जीवन के लिए अधिक समय दे सकती हैं। लेकिन तकनीक और संसाधनों का लाभ यदि केवल कुछ लोगों तक सीमित रहेगा, तो समृद्धि भी विषमता को बढ़ाएगी।

प्रश्न उत्पादन की कमी का ही नहीं, उसके न्यायपूर्ण वितरण का भी है। समाज की सफलता का पैमाना केवल गगनचुंबी इमारतें या बढ़ता सकल घरेलू उत्पाद नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि सबसे कमजोर नागरिक किस स्थिति में जीवन जी रहा है।

धरती पर स्वर्ग का निर्माण

एक समतामूलक व्यवस्था का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को घर, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, परिवहन और सामाजिक सुरक्षा की न्यूनतम गारंटी देना होना चाहिए। प्रत्येक सक्षम व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार सामाजिक उत्पादन में योगदान देने और प्रत्येक जरूरतमंद को सम्मानपूर्वक जीवन जीने के साधन मिलने चाहिए।

गरीबी, उत्पीड़न, अपराध, पलायन और पारिवारिक विघटन को भाग्य अथवा पिछले जन्म का फल कहकर छोड़ा नहीं जा सकता। इनमें से अनेक समस्याएँ मानव-निर्मित व्यवस्थाओं, नीतियों और असमान अवसरों से पैदा होती हैं। इसलिए इन्हें सामूहिक इच्छाशक्ति, जवाबदेह शासन और न्यायपूर्ण नीतियों के माध्यम से कम भी किया जा सकता है।

स्वर्ग कहीं आकाश से धरती पर नहीं उतरेगा। उसका निर्माण मनुष्य को स्वयं करना होगा—ऐसा समाज बनाकर, जिसमें किसी की समृद्धि किसी दूसरे की भूख पर खड़ी न हो और सम्मानजनक जीवन कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं, प्रत्येक नागरिक का अधिकार बने।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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