अपने भीतर विवेक, कर्तव्य और सत्य की चेतना जगाने का पर्व है जन्माष्टमी
डॉ. घनश्याम बादल

जन्माष्टमी केवल श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नहीं, उस चेतना के प्रकट होने का पर्व है, जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश, मोह से विवेक और स्वार्थ से सत्य की ओर ले जाती है। कारागार में कृष्ण का जन्म भी प्रतीक है कि जब मनुष्य का विवेक भय, लोभ, अहंकार और मोह की बेड़ियों में कैद हो जाए, तब उसके भीतर कृष्ण-चेतना का जन्म आवश्यक हो जाता है।
कृष्ण को केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व, राजा, कूटनीतिज्ञ अथवा देवता के रूप में देखना उनके विराट स्वरूप को सीमित करना होगा। कृष्ण उस परम चेतना के प्रतीक हैं, जो जीवन के प्रत्येक द्वंद्व में मनुष्य को दिशा देती है। इसी दृष्टि से महाभारत केवल कौरवों और पांडवों का युद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले धर्म-अधर्म, विवेक-अविवेक और सत्य-मोह के संघर्ष का आख्यान है।
महाभारत का कुरुक्षेत्र वास्तव में हमारा अपना जीवन है। धृतराष्ट्र का अंधत्व पुत्रमोह और सत्तामोह का, दुर्योधन अहंकार और अधिकार की भूख का तथा शकुनि छल और षड्यंत्र का प्रतीक है। वहीं अर्जुन सामर्थ्यवान होते हुए भी संशयग्रस्त मनुष्य का प्रतिनिधि है। उसके पास शस्त्र हैं, लेकिन निर्णय का साहस नहीं। वह कर्तव्य जानता है, पर मोह उसे रोक देता है।
ऐसे समय में कृष्ण सारथी बनकर सामने आते हैं। वे अर्जुन के स्थान पर निर्णय नहीं लेते, बल्कि उसे सही दिशा चुनने का विवेक देते हैं। यही कृष्ण का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश है—परमात्मा मनुष्य की यात्रा अपने हाथ में नहीं लेता, वह उसे सही मार्ग पहचानने की दृष्टि देता है।
कुरुक्षेत्र में कृष्ण का सबसे बड़ा चमत्कार अस्त्र चलाना नहीं, बल्कि अर्जुन के भीतर सोए विवेक को जगाना है। वे उसे युद्ध के लिए उकसाते नहीं, बल्कि कर्म, आत्मा, कर्तव्य और निष्कामता का अर्थ समझाते हैं। गीता केवल युद्ध का उपदेश नहीं, मनुष्य के भीतर छाए अंधकार से संवाद है।
आज प्रश्न यह नहीं कि कुरुक्षेत्र कहां था, बल्कि यह है कि हमारा कुरुक्षेत्र कहां है। परिवार में संबंध और स्वार्थ, राजनीति में सत्ता और सेवा, व्यापार में लाभ और नैतिकता तथा डिजिटल संसार में सूचना और भ्रम के बीच संघर्ष जारी है। हमारी समस्याएं आधुनिक हो गई हैं, लेकिन लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार जैसे विकार आज भी पुराने हैं।
ऐसे समय में कृष्ण की आवश्यकता पहले से अधिक है। कृष्ण हमारे भीतर का वह विवेक हैं, जो गलत मार्ग पर जाने से रोकता है। वे अंतरात्मा की वह आवाज हैं, जो सफलता में अहंकार और असफलता में निराशा से बचाती है।
कृष्ण की बांसुरी भी सुंदर प्रतीक है। बांसुरी भीतर से खोखली होती है, तभी उससे संगीत निकलता है। इसी प्रकार मनुष्य जब अहंकार, स्वार्थ और विकारों से स्वयं को खाली करता है, तभी उसके भीतर परम चेतना का संगीत सुनाई देता है।
कृष्ण संसार छोड़ने का नहीं, संसार में रहते हुए सात्विक जीवन जीने का संदेश देते हैं। वे कर्म से पलायन नहीं, कर्म की शुद्धता चाहते हैं। जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ अपने भीतर उस कृष्ण को जन्म देना है, जो हमारे निर्णयों का सारथी बने।
कृष्ण केवल मथुरा में जन्म लेने वाली देह नहीं, बल्कि चेतना, दृष्टि और विवेक हैं। हर उस मन में कृष्ण का जन्म आवश्यक है, जहां अंधकार है; हर उस जीवन में कृष्ण की आवश्यकता है, जहां मोह है और हर उस समाज में कृष्ण-चेतना जरूरी है, जहां अन्याय है।








