दोषियों पर कार्रवाई के बजाय दलित अपमान का मुद्दा उठाने वाले विपक्ष के नेता को बनाया आरोपी
रेवाडी, 31 अगस्त। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल किया है कि देश में संविधान और कानून का राज चल रहा है या कथित संघी फासीवाद का। उन्होंने आरोप लगाया कि हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कथित अपमान के दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय इस मुद्दे को उठाने वाले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज कर दी गई।
विद्रोही ने कहा कि 8 अगस्त को उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित रामलीला मैदान में आयोजित कांग्रेस की सभा को राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने संबोधित किया था। आरोप है कि 10 अगस्त को भाजपा और संघ से जुड़े कुछ लोगों ने उस मंच पर हवन कर कथित ‘शुद्धिकरण’ किया। खरगे ने इसे अपना और पूरे दलित समाज का अपमान बताते हुए दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की थी।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड सरकार और भाजपा की ओर से कार्रवाई नहीं होने पर 28 अगस्त को राहुल गांधी ने दिल्ली में आयोजित पत्रकार वार्ता में यह मामला उठाया। हल्द्वानी में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने धरना-प्रदर्शन कर पुलिस को शिकायत देने का प्रयास किया, लेकिन उनकी शिकायत पर मुकदमा दर्ज नहीं किया गया।
विद्रोही ने आरोप लगाया कि जिन लोगों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई होनी चाहिए थी, उनकी शिकायत पर ही 30 अगस्त को हल्द्वानी पुलिस ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर संख्या 297/26 दर्ज कर ली। उन्होंने बताया कि प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 190 व 299 तथा एससी-एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(क्यू) का उल्लेख किया गया है।
उन्होंने सवाल किया कि संविधान और कानून के शासन में ऐसा कैसे हो सकता है कि कथित अपराध करने वालों के बजाय उस अपराध के खिलाफ आवाज उठाने वाले व्यक्ति को ही आरोपी बना दिया जाए। राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज मामला विपक्ष की आवाज दबाने और संविधान की भावना को कमजोर करने का उदाहरण है।
विद्रोही ने नागरिकों से लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाने का आह्वान किया। उन्होंने चेताया कि यदि ऐसी कार्रवाइयों का विरोध नहीं हुआ तो भविष्य में लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।








