जंतर-मंतर की एफआईआर पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

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अनुच्छेद 142 के तहत छात्रों को राहत देने की केंद्र की अपील; गंभीर आरोपों का सामना कर रहे लोगों पर जारी रह सकती है कानूनी प्रक्रिया

निर्दोष छात्रों और आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त आरोपियों के बीच कानूनी सीमा तय करने की चुनौती

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया (महाराष्ट्र) – भारत में लोकतांत्रिक विरोध, युवाओं के भविष्य और कानून के शासन के बीच संतुलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला मंगलवार, 1 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आने वाला है। नीट-यूजी परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ जंतर-मंतर सहित विभिन्न स्थानों पर हुए छात्र आंदोलनों से संबंधित एफआईआर रद्द करने के लिए केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सोमवार, 31 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया। अदालत ने केंद्र को आवेदन दाखिल करने की अनुमति देते हुए मामले पर मंगलवार को सुनवाई करने पर सहमति जताई।

यह मामला केवल कुछ एफआईआर रद्द करने तक सीमित नहीं है। अदालत के सामने बड़ा सवाल यह है कि शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रदर्शन में शामिल छात्रों के शैक्षणिक और रोजगार संबंधी भविष्य को आपराधिक मुकदमों के बोझ से कैसे बचाया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रदर्शन की आड़ में हिंसा या गंभीर अपराध करने वालों को कानून से अनुचित छूट न मिले।

सभी प्रदर्शनकारियों को स्वतः राहत नहीं

क्या जंतर-मंतर आंदोलन से जुड़े सभी लोगों के मुकदमे समाप्त हो जाएंगे? फिलहाल इसका उत्तर ‘हां’ में देना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा। केंद्र ने छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग जरूर की है, लेकिन अंतिम आदेश, राहत का दायरा और उसकी शर्तें सुप्रीम कोर्ट ही निर्धारित करेगा।

अदालत पूर्व में संकेत दे चुकी है कि जिन मामलों में केवल छात्र शामिल हैं, उनमें अनुच्छेद 142 का प्रयोग कर राहत देने पर विचार किया जा सकता है। वहीं हत्या, दुष्कर्म, अपहरण और पॉक्सो अधिनियम जैसे गंभीर मामलों का सामना कर रहे व्यक्तियों के प्रकरण अलग रखे जा सकते हैं।

इसलिए संभावित न्यायिक समाधान सभी को सामूहिक क्षमादान देने के बजाय शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को राहत और गंभीर अपराध के आरोपियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया जारी रखने पर आधारित हो सकता है।

क्या है अनुच्छेद 142?

संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को उसके समक्ष लंबित किसी मामले में ‘पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश पारित करने की असाधारण शक्ति देता है।

केंद्र का पक्ष है कि यदि प्रत्येक एफआईआर को अलग-अलग पुलिस, मजिस्ट्रेट और अदालत की सामान्य प्रक्रिया से गुजारा गया तो निर्दोष छात्रों को वर्षों तक मुकदमों का सामना करना पड़ सकता है। इससे उनकी पढ़ाई, रोजगार और सामाजिक प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

हालांकि इस असाधारण शक्ति का इस्तेमाल किन व्यक्तियों और किन मामलों में किया जाएगा, इसका अंतिम फैसला अदालत करेगी।

2,873 लोगों का आंकड़ा दोषसिद्धि नहीं

इस मामले में 2,873 लोगों का आंकड़ा भी चर्चा का विषय बना हुआ है। दिल्ली पुलिस ने बताया है कि चेहरा पहचान प्रणाली के माध्यम से प्रदर्शन से जुड़े 2,873 व्यक्तियों का मिलान पुलिस के मौजूदा रिकॉर्ड से हुआ था। इनमें 2,402 लोगों की पहचान ‘क्राइम कुंडली’ डेटाबेस और 471 की डोसियर रिकॉर्ड के माध्यम से होने का दावा किया गया।

पुलिस के अनुसार इनमें 92 लोगों के खिलाफ दस से अधिक मामले दर्ज थे और 47 को हिस्ट्रीशीटर के रूप में चिह्नित किया गया था।

लेकिन यहां महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना आवश्यक है। किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले से एफआईआर या आपराधिक मामला दर्ज होना उसकी दोषसिद्धि का प्रमाण नहीं होता। इसी प्रकार, चेहरा पहचान प्रणाली से हुआ मिलान भी यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति ने आंदोलन के दौरान कोई अपराध किया था।

इसलिए प्रत्येक व्यक्ति की वास्तविक भूमिका, उसके खिलाफ लगाए गए आरोप और उपलब्ध साक्ष्यों की स्वतंत्र जांच आवश्यक होगी।

पहचान और स्क्रीनिंग सबसे संवेदनशील मुद्दा

यदि सुप्रीम कोर्ट छात्रों को व्यापक राहत देता है तो यह तय करने के लिए पारदर्शी प्रक्रिया बनानी होगी कि कौन वास्तविक छात्र था, किसने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया और किसके खिलाफ केवल प्रदर्शनस्थल पर उपस्थित रहने के कारण मामला दर्ज किया गया।

इसके विपरीत, जिन लोगों पर हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने अथवा पुलिसकर्मियों पर हमला करने के विशिष्ट आरोप हैं, उनके मामलों को केवल प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर समाप्त करना न्यायोचित नहीं होगा।

अदालत के सामने मुख्य चुनौती शांतिपूर्ण असहमति और आपराधिक कृत्य के बीच स्पष्ट कानूनी रेखा खींचने की है।

पांच सदस्यीय जांच समिति भी कर रही पड़ताल

सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त को जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती की जांच के लिए पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति गठित की थी। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं।

समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रवि शंकर झा, दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस शालिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक डॉ. एल.आर. बिश्नोई शामिल हैं।

समिति को कथित अत्यधिक और अनुपातहीन बल प्रयोग, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, निगरानी तथा अन्य संबंधित शिकायतों की स्वतंत्र जांच करनी है। पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी कैमरा रिकॉर्ड, वीडियो, वायरलेस संवाद तथा पीसीआर कॉल लॉग सुरक्षित रखकर समिति को उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए हैं।

कुछ याचिकाकर्ताओं ने 25 अगस्त को समिति की संरचना पर सवाल उठाते हुए उसके पुनर्गठन की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समिति उसकी प्रत्यक्ष निगरानी में काम कर रही है और संबंधित आवेदन पर मुख्य मामले के साथ विचार किया जाएगा।

लोकतांत्रिक अधिकार और कानून-व्यवस्था की परीक्षा

यह मामला भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए व्यापक संदेश रखता है। शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या किसी नागरिक अथवा पुलिसकर्मी पर हमला करने की अनुमति नहीं देता।

इसी प्रकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व पुलिस को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अनावश्यक अथवा अनुपातहीन बल प्रयोग का अधिकार नहीं देता। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए न्यूनतम आवश्यक बल का प्रयोग किया गया था। इन विरोधाभासी दावों की जांच अब न्यायिक निगरानी में हो रही है।

आदेश का आगामी प्रदर्शनों पर भी पड़ेगा असर

5 सितंबर को प्रस्तावित दिल्ली मार्च को देखते हुए 1 सितंबर की सुनवाई का महत्व और बढ़ गया है। अदालत का आदेश केवल पहले से दर्ज मुकदमों को ही प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि आगामी प्रदर्शनों को लेकर प्रशासन और आंदोलनकारियों की रणनीति भी तय कर सकता है।

यदि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत वास्तविक छात्र प्रदर्शनकारियों को राहत देने का रास्ता निकालता है तो यह हजारों युवाओं के शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य की रक्षा करने वाला महत्वपूर्ण कदम होगा। साथ ही अदालत को गंभीर आरोपों, पुराने आपराधिक रिकॉर्ड और आंदोलन के दौरान किए गए वास्तविक अपराध के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा।

न्यायसंगत रास्ता यही होगा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले निर्दोष छात्रों को शीघ्र राहत मिले, जबकि हिंसा अथवा अन्य गंभीर अपराधों के ठोस आरोपों की निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रहे।

-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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