मेरिट का मान, मेहनत का सम्मान और मानवता का ध्यान

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योग्यता तथा सामाजिक न्याय को परस्पर विरोधी बनाने के बजाय दोनों के बीच संतुलन तलाशने की जरूरत

डॉ. शैलेश शुक्ला

इस देश का प्रत्येक नागरिक चाहता है कि अस्पताल में उसे योग्य डॉक्टर मिले, विद्यालय में उसके बच्चे को कुशल शिक्षक पढ़ाए, अदालत में उसकी बात अनुभवी न्यायाधीश सुने और देश की सीमा सक्षम सैनिकों के हाथों में सुरक्षित रहे। यह अपेक्षा किसी जाति, धर्म या वर्ग की नहीं, बल्कि हर भारतीय की स्वाभाविक आकांक्षा है।

शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, विज्ञान, रक्षा और प्रशासन—हर क्षेत्र में योग्यता आवश्यक है। किसी भी व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि जिम्मेदारी संभालने वाला व्यक्ति अपने कार्य के लिए कितना प्रशिक्षित, सक्षम और उत्तरदायी है। इसलिए चयन व्यवस्था में योग्यता, परिश्रम और कार्यकुशलता को उचित स्थान मिलना ही चाहिए।

लेकिन इसके साथ एक दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या हमारे समाज में सभी बच्चों को अपनी योग्यता विकसित करने के समान अवसर उपलब्ध हैं?

क्या सभी की शुरुआती रेखा एक है?

मेरिट की तुलना अक्सर एक ऐसी दौड़ से की जाती है जिसमें सभी प्रतिभागी एक ही रेखा से शुरुआत करते हैं और सबसे तेज दौड़ने वाला विजेता बनता है। यह आदर्श स्थिति आकर्षक अवश्य है, लेकिन सामाजिक वास्तविकता इससे अलग है।

किसी बच्चे को अच्छे विद्यालय, पुस्तकें, इंटरनेट, कोचिंग, सुरक्षित घर और शिक्षित परिवार का सहयोग मिलता है। दूसरी ओर कोई बच्चा अभावग्रस्त परिवार, कमजोर विद्यालय, सामाजिक भेदभाव और आजीविका के दबाव के बीच पढ़ता है। दोनों से समान परीक्षा में समान प्रदर्शन की अपेक्षा तो की जा सकती है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों को तैयारी के समान अवसर मिले थे।

योग्यता केवल परीक्षा के अंकों से नहीं बनती। उसके पीछे परिवार, विद्यालय, पोषण, सामाजिक वातावरण और उपलब्ध संसाधनों की भी बड़ी भूमिका होती है।

आरक्षण और योग्यता शत्रु नहीं

यह धारणा भी पूरी तरह सही नहीं है कि आरक्षण का अर्थ योग्यता को समाप्त करना है। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को भी निर्धारित शैक्षणिक योग्यता, परीक्षा, प्रशिक्षण और सेवा संबंधी मापदंड पूरे करने पड़ते हैं। आरक्षण का संवैधानिक उद्देश्य अयोग्य व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंपना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को शासन, शिक्षा और सार्वजनिक संस्थानों में पर्याप्त अवसर एवं प्रतिनिधित्व देना है।

खुली श्रेणी किसी एक जाति की श्रेणी नहीं होती। आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार यदि सामान्य योग्यता क्रम में स्थान प्राप्त करता है, तो उसका चयन खुली श्रेणी में होता है। इस प्रकार मेरिट और प्रतिनिधित्व भारतीय व्यवस्था में एक-दूसरे के साथ चलते हैं।

यह भी तथ्य है कि इसरो और डीआरडीओ जैसे वैज्ञानिक संस्थानों की अनेक भर्तियों में आरक्षण लागू है। इसके बावजूद इन संस्थानों ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। इसलिए उनकी सफलता को केवल आरक्षण न होने से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

गुणवत्ता पर समझौता नहीं होना चाहिए

सामाजिक न्याय की आवश्यकता स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि कार्यकुशलता और न्यूनतम योग्यता की उपेक्षा कर दी जाए। डॉक्टर, शिक्षक, वैज्ञानिक, इंजीनियर, न्यायिक अधिकारी अथवा प्रशासक—हर पद के लिए स्पष्ट योग्यता, पारदर्शी परीक्षा, गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण और नियमित कार्य-मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए।

जनता को केवल नियुक्त कर्मचारी नहीं, बल्कि योग्य, संवेदनशील और जवाबदेह जनसेवक चाहिए। यदि किसी अस्पताल में चिकित्सक उपलब्ध नहीं है, विद्यालय में शिक्षक पढ़ाता नहीं या अधिकारी नागरिकों की समस्याएँ नहीं सुनता, तो केवल उसकी नियुक्ति प्रक्रिया पर बहस करने से व्यवस्था नहीं सुधरेगी। जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है जितनी योग्यता।

आर्थिक अभाव को भी मिले प्राथमिकता

वर्तमान व्यवस्था में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को विशेष सहायता देना आवश्यक है। चाहे बच्चा किसी भी जाति या समुदाय का हो, गरीबी उसकी शिक्षा और प्रतिस्पर्धा की क्षमता को प्रभावित करती है। सरकार को ऐसे विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, पुस्तकें, छात्रावास, डिजिटल संसाधन और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए।

आर्थिक सहायता और सामाजिक प्रतिनिधित्व को एक-दूसरे का विकल्प मानना उचित नहीं होगा। जातिगत भेदभाव और आर्थिक अभाव दो अलग समस्याएँ हैं; उनके समाधान के उपाय भी आवश्यकतानुसार अलग हो सकते हैं।

व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा हो

आरक्षण सहित प्रत्येक सार्वजनिक नीति की निष्पक्ष और आंकड़ा-आधारित समीक्षा होनी चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि उसका लाभ वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुँच रहा है या नहीं, कौन-से समुदाय अब भी प्रतिनिधित्व से वंचित हैं और क्या कुछ परिवार लगातार लाभ प्राप्त कर रहे हैं जबकि सबसे कमजोर लोग पीछे छूट रहे हैं।

‘क्रीमी लेयर’, शिक्षा की गुणवत्ता, पदों की प्रकृति और वास्तविक सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे विषयों पर राजनीतिक नारों के बजाय प्रमाणों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए। सुधार का उद्देश्य अधिकार छीनना नहीं, व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण और प्रभावी बनाना होना चाहिए।

सम्मान का आधार बने परिश्रम

आरक्षण पर चर्चा करते समय ऐसी भाषा से बचना चाहिए जिससे किसी चयनित व्यक्ति की योग्यता पर केवल उसकी जाति के कारण संदेह किया जाए। ऐसा करना उसके परिश्रम और आत्मसम्मान—दोनों को चोट पहुँचाता है। उसी प्रकार अधिक अंक प्राप्त करने के बाद अवसर से वंचित रह गए युवाओं की निराशा को भी अनसुना नहीं किया जा सकता।

समाधान समाज को दो विरोधी खेमों में बाँटने में नहीं, बल्कि अवसरों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ाने में है। जब अच्छे विद्यालय, कॉलेज और रोजगार सीमित होंगे तो प्रत्येक चयन संघर्ष का कारण बनेगा। अवसर बढ़ेंगे तो सामाजिक तनाव भी कम होगा।

भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें मेरिट का मान हो, मेहनत का सम्मान हो और मानवता का ध्यान रखा जाए। योग्यता तथा सामाजिक न्याय में से किसी एक को चुनना हमारी मजबूरी नहीं होनी चाहिए। हमारा लक्ष्य ऐसी समान अवसर वाली व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें जन्म किसी की क्षमता पर ताला न लगाए और अभाव किसी प्रतिभा को आगे बढ़ने से न रोक सके।

यही संतुलन देश को सक्षम संस्थान, संवेदनशील प्रशासन और समरस समाज दे सकता है।

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Author: Bharat Sarathi

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