मानसून सत्र : सदन में शोर कितना, जनता को राहत कितनी?

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हरियाणा विधानसभा के सामने असली परीक्षा—क्या बहस सड़कों, रोजगार, कानून-व्यवस्था, सफाई और नागरिक सुविधाओं में बदलाव ला पाएगी?

ऋषिप्रकाश कौशिक

हरियाणा विधानसभा का मानसून सत्र शुरू हो चुका है। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों और नीतियों के साथ सदन में है, विपक्ष सवालों की लंबी सूची लेकर खड़ा है। पहले ही दिन जिस तरह टकराव, नारेबाजी, स्थगन और विधायकों के निलंबन तक बात पहुंची, उसने यह संकेत तो दे दिया कि सत्र शांत नहीं रहने वाला। लेकिन हरियाणा की जनता के लिए इससे बड़ा सवाल कुछ और है—सदन कितना गरम रहा, यह महत्वपूर्ण है या सदन से जनता के हिस्से में क्या निकला?

यही इस मानसून सत्र की असली कसौटी होनी चाहिए।

तीन दिन की बैठक, समस्याएं पूरे वर्ष की

सत्र 27 अगस्त से 1 सितंबर तक निर्धारित है, लेकिन बीच के अवकाश के कारण सदन की वास्तविक बैठकें सीमित हैं। ऐसे में प्रत्येक घंटे का महत्व बढ़ जाता है। विधानसभा के आधिकारिक आंकड़ों में बड़ी संख्या में प्रश्न और नोटिस दर्ज हैं तथा कई सरकारी विधेयक भी कार्यवाही का हिस्सा हैं।

इसका अर्थ है कि विधायकों के पास मुद्दों की कमी नहीं है, कमी केवल समय की है।

और जब समय सीमित हो तो प्रश्न यह भी उठता है कि उसमें से कितना समय वास्तविक चर्चा को मिलेगा और कितना राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में निकल जाएगा?

लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है। सरकार से कठोर प्रश्न पूछना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, जिम्मेदारी भी है। उसी प्रकार उन प्रश्नों का तथ्यात्मक उत्तर देना सरकार का दायित्व है। लेकिन यदि प्रश्न नारे में और उत्तर राजनीतिक पलटवार में बदल जाए, तो अंततः नुकसान उस मतदाता का होता है जिसने अपने प्रतिनिधि को विधानसभा में अपनी समस्या उठाने के लिए भेजा है।

गुरुग्राम का पानी केवल गुरुग्राम की समस्या नहीं

इस मानसून ने एक बार फिर हरियाणा के शहरी विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। विशेष रूप से गुरुग्राम में जलभराव, यातायात जाम, टूटी सड़कें, सीवर और ड्रेनेज जैसी समस्याएं बार-बार सामने आ रही हैं।

गुरुग्राम केवल एक शहर नहीं है। वह हरियाणा की आर्थिक पहचान और देश-दुनिया के सामने प्रदेश का चेहरा भी है। वहां हर वर्ष बारिश के बाद सड़कें पानी में डूबें और फिर सरकार, विपक्ष तथा विभिन्न एजेंसियां एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालती रहें, तो विधानसभा को पूछना चाहिए—आखिर जवाबदेह कौन है?

जीएमडीए, नगर निगम, एचएसवीपी और दूसरे विभागों के बीच जिम्मेदारी स्पष्ट क्यों नहीं होती? हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी स्थायी समाधान क्यों दिखाई नहीं देता?

सदन यदि केवल जलभराव पर चर्चा करके आगे बढ़ जाता है तो कुछ नहीं बदलेगा। प्रभाव तब दिखाई देगा जब चर्चा से जिम्मेदारी तय हो, समयबद्ध कार्ययोजना बने और अगली बारिश से पहले उसके परिणाम जमीन पर दिखाई दें।

रोजगार के आंकड़ों से आगे युवा का सवाल

हरियाणा की राजनीति में रोजगार हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। सरकारी भर्तियां, भर्ती परीक्षाएं, अनुबंध व्यवस्था, हरियाणा कौशल रोजगार निगम और निजी क्षेत्र में रोजगार—इन सभी विषयों पर सत्ता और विपक्ष के अपने-अपने दावे हैं।

मगर युवा का सवाल बहुत सीधा है—मुझे स्थायी और सम्मानजनक रोजगार कब मिलेगा?

विधानसभा में बेरोजगारी के प्रतिशत पर सत्ता और विपक्ष बहस कर सकते हैं, लेकिन किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में वर्षों लगाने वाले युवक के लिए प्रतिशत से अधिक महत्वपूर्ण नियुक्ति है।

सत्र की सार्थकता तभी होगी जब सरकार यह स्पष्ट करे कि कितने रिक्त पद हैं, कितनी भर्तियां कब पूरी होंगी और भर्ती प्रक्रिया को समयबद्ध तथा विवादमुक्त बनाने की व्यवस्था क्या होगी।

सफाई कर्मचारियों की आवाज भी सदन तक पहुंचे

प्रदेश में सफाई एवं अग्निशमन कर्मचारियों से जुड़े आंदोलन और मांगें भी लगातार सामने आती रही हैं। शहरों में कूड़ा जमा हो तो उसका प्रभाव किसी राजनीतिक दल पर नहीं, सीधे नागरिक पर पड़ता है।

बारिश के मौसम में सफाई व्यवस्था बिगड़ना स्वास्थ्य का प्रश्न भी बन जाता है।

ऐसे विषयों को केवल कर्मचारी बनाम सरकार के विवाद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार को कर्मचारियों की मांगों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और विपक्ष को भी केवल राजनीतिक समर्थन से आगे बढ़कर व्यावहारिक समाधान सुझाना चाहिए।

क्योंकि हड़ताल लंबी चलती है तो नुकसान सरकार या कर्मचारी संगठन से पहले आम नागरिक उठाता है।

कानून-व्यवस्था पर आंकड़े नहीं, भरोसा चाहिए

अपराध और कानून-व्यवस्था भी विपक्ष द्वारा उठाए जाने वाले प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं। सरकार स्वाभाविक रूप से अपने आंकड़े और कार्रवाई सामने रखेगी, विपक्ष घटनाओं का हवाला देकर उसे घेरेगा।

लेकिन यहां भी कसौटी जनता का अनुभव है।

क्या महिला रात में सुरक्षित महसूस करती है? क्या व्यापारी रंगदारी या अपराध के भय से मुक्त है? क्या सामान्य व्यक्ति को थाने में सहजता से सुनवाई मिलती है?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक नहीं है तो केवल अपराध के आंकड़ों की तुलना पर्याप्त नहीं होगी।

पहले दिन का घटनाक्रम अच्छा संकेत नहीं

मानसून सत्र के पहले दिन कांग्रेस विधायकों और सुरक्षाकर्मियों के बीच कथित धक्का-मुक्की को लेकर सदन में भारी हंगामा हुआ और कार्यवाही दो बार स्थगित करनी पड़ी। विपक्ष ने लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल उठाया, जबकि विधानसभा अध्यक्ष ने नियमों के पालन पर जोर दिया।

यह विवाद अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन चिंता यह है कि कहीं पूरा सत्र इसी प्रकार के टकराव की भेंट न चढ़ जाए।

सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि मजबूत सरकार वह नहीं होती जो विपक्ष की आवाज कम सुनाई दे, बल्कि वह होती है जो सबसे कठोर सवाल का भी तथ्य और धैर्य के साथ उत्तर दे।

विपक्ष को भी समझना होगा कि सरकार को घेरने का सबसे प्रभावी तरीका केवल वेल में पहुंचना नहीं, बल्कि ऐसे तथ्य, दस्तावेज और तर्क सामने रखना है जिनका सरकार को उत्तर देना पड़े।

विधेयक पास करना ही पर्याप्त नहीं

विधानसभा कानून बनाने की सर्वोच्च प्रदेश स्तरीय संस्था है। इसलिए किसी सत्र की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने विधेयक पारित हुए।

असली सवाल होना चाहिए—उन पर कितनी चर्चा हुई?

विधेयक का आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ेगा? नगर निकाय से संबंधित संशोधन नागरिक सुविधाओं को बेहतर करेंगे या केवल प्रशासनिक संरचना बदलेंगे? नए कानून से जवाबदेही बढ़ेगी या केवल नियमों की एक और परत जुड़ जाएगी?

कानून तभी सार्थक है जब उसका प्रभाव सरकारी फाइल से निकलकर नागरिक के जीवन तक पहुंचे।

90 विधायक नहीं, 90 क्षेत्रों की आवाज

हरियाणा विधानसभा में बैठने वाला प्रत्येक विधायक केवल किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं है। वह अपने विधानसभा क्षेत्र के लाखों लोगों का प्रतिनिधि है।

इसलिए सदन में केवल मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष या वरिष्ठ मंत्रियों की बहस ही महत्वपूर्ण नहीं होनी चाहिए। पलवल, नूंह, महेंद्रगढ़, सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, जींद, करनाल, यमुनानगर, अंबाला, रोहतक, झज्जर, रेवाड़ी और गुरुग्राम—हर क्षेत्र की अपनी समस्याएं हैं।

कहीं सिंचाई का पानी मुद्दा है, कहीं सड़क, कहीं स्कूल में शिक्षक नहीं, कहीं अस्पताल में डॉक्टर नहीं, कहीं सीवर और पेयजल की समस्या है।

विधानसभा की असली खूबसूरती तभी है जब इन स्थानीय समस्याओं को प्रदेश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था में स्थान मिले।

सरकार के लिए भी अवसर है

मानसून सत्र को केवल विपक्ष की परीक्षा मानना गलत होगा। यह सरकार के लिए भी अवसर है।

सरकार चाहे तो विपक्ष के सवालों को आलोचना के बजाय फीडबैक की तरह ले सकती है। जहां कमी है उसे स्वीकार कर समयबद्ध समाधान घोषित किया जा सकता है। किसी समस्या को स्वीकार करना सरकार की कमजोरी नहीं होती; समस्या जानने के बाद भी समाधान न करना कमजोरी होती है।

यदि किसी शहर में जलभराव है तो बताइए कि कब तक दूर होगा। यदि पद रिक्त हैं तो भर्ती की समयसीमा दीजिए। यदि कर्मचारियों की मांग लंबित है तो स्पष्ट कीजिए कि कौन-सी स्वीकार्य है और कौन-सी नहीं। यदि किसी योजना में देरी हुई है तो कारण और नई समयसीमा सदन के सामने रखिए।

ऐसे उत्तर विधानसभा के प्रति जनता का विश्वास मजबूत करते हैं।

सत्र समाप्त होने के बाद होना चाहिए जनता का हिसाब

पहली सितंबर को जब मानसून सत्र समाप्त होगा तब असली रिपोर्ट कार्ड बनना चाहिए।

कितने घंटे सदन चला?

कितना समय प्रश्नों और जनहित के मुद्दों पर लगा?

कितना समय हंगामे में गया?

कितने सवालों के ठोस जवाब मिले?

कितनी समस्याओं पर सरकार ने समयबद्ध कार्रवाई का भरोसा दिया?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसी सामान्य हरियाणवी को इस सत्र से यह उम्मीद मिली कि उसकी जिंदगी से जुड़ी कोई समस्या अब वास्तव में हल होगी?

यदि इसका उत्तर हां है तो तीन दिन का छोटा सत्र भी बड़ा प्रभाव छोड़ सकता है।

और यदि पूरा सत्र आरोप, नारे, निलंबन, बहिर्गमन और राजनीतिक बयानबाजी में सिमट गया तो विधानसभा की कार्यवाही समाचारों की सुर्खियां तो बना देगी, लेकिन प्रदेश की जनता के जीवन में शायद ही कोई फर्क आएगा।

लोकतंत्र में सदन की ऊंची आवाज से अधिक महत्वपूर्ण उसका जमीन पर दिखाई देने वाला परिणाम है। हरियाणा का मानसून सत्र कितना सफल रहा, इसका निर्णय सत्ता पक्ष या विपक्ष नहीं—अंततः प्रदेश की जनता करेगी।
Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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