जंतर-मंतर : रीलों की क्रांति

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आंदोलन से पहले कैमरा ऑन, मुद्दे से पहले कैप्शन तैयार और क्रांति से पहले पूछा जाता है—‘ब्रो, रील वायरल हुई या नहीं?’

विवेक रंजन श्रीवास्तव

दिल्ली का जंतर-मंतर कभी लोकतंत्र की धड़कन माना जाता था। अब कभी-कभी लगता है कि यह विरोध का मंच कम और ‘कंटेंट क्रिएशन स्टूडियो’ अधिक हो गया है। यहां आंदोलन शुरू होने से पहले कैमरे ऑन हो जाते हैं और उसके समाप्त होने से पहले रील अपलोड हो जाती है।

आज की क्रांति का पहला सवाल यह नहीं होता—‘मुद्दा क्या है?’ सवाल होता है—‘ब्रो, रील वायरल हुई या नहीं? व्यूज कितने आए?’

लोकतंत्र में असहमति ऑक्सीजन की तरह है। सत्ता से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है। लेकिन सवाल और शोर, प्रतिरोध और प्रदर्शन तथा आंदोलन और इवेंट मैनेजमेंट के बीच एक महीन रेखा होती है। अफसोस, आज वह रेखा अक्सर कैमरे के फिल्टर में गायब हो जाती है।

इतिहास गवाह है कि जिन आंदोलनों ने समाज को बदला, उनमें शामिल लोगों के हाथों में केवल तख्तियां नहीं थीं। उनके मस्तिष्क में अध्ययन, हृदय में संवेदना और दृष्टि में समाधान था। उन्होंने व्यवस्था को केवल गरियाया नहीं, बल्कि उसके बेहतर विकल्प भी प्रस्तुत किए।

आज कई बार लगता है कि कुछ युवाओं ने संविधान से पहले कैप्शन पढ़ लिया है और विचारधारा से पहले एल्गोरिदम समझ लिया है। नारे कंठस्थ हैं, लेकिन विषय के अध्ययन को ‘स्किप ऐड’ कर दिया गया है।

दृश्य लगभग तय रहता है—

एक हाथ में पोस्टर और दूसरे में स्मार्टफोन।

सामने माइक, कैमरा ऑन और भाषा सड़क से फिसलकर सीधे बगल की नाली में!

आजकल कुछ लोगों ने शालीनता को ‘क्रिंज’ घोषित कर दिया है। गाली देना ‘बोल्डनेस’, बदतमीजी ‘सैवेज एनर्जी’ और अशिष्टता ‘अनफिल्टर्ड पर्सनैलिटी’ बन चुकी है।

यह बीमारी अब लड़के और लड़की में भेद भी नहीं करती। नई पीढ़ी को कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ते देखकर खुशी होती है, लेकिन उसे यह समझना होगा कि कपड़ों अथवा भाषा का स्तर गिराने से किसी आंदोलन का वैचारिक स्तर ऊंचा नहीं होता।

कुछ युवा लड़कियां भी शायद यह मानने लगी हैं कि पुरुषों जैसी गालियां देना बराबरी का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र है। मानो नारी सशक्तीकरण का अंतिम अध्याय शब्दों की मर्यादा तोड़ने के बाद ही पूरा होता हो। समान अधिकारों का अर्थ अभद्रता का समान अवसर नहीं हो सकता। अपशब्दों की आतिशबाजी समानता नहीं, भाषा की सामूहिक पराजय है।

हर तीसरी रील का कैप्शन होता है—‘रिस्पेक्ट एवरीवन।’ वीडियो शुरू होते ही सम्मान की सबसे पहले धज्जियां उड़ाई जाती हैं।

लगता है, जैसे संस्कार ‘अनइंस्टॉल’ हो चुके हैं और सभ्यता का नया संस्करण अभी डाउनलोड होना बाकी है।

आंदोलन की ऊंचाई डेसीबल से नहीं, विचारों से मापी जाती है। भीड़ जुटा लेना मात्र नेतृत्व नहीं होता और ट्रेंड कर जाना इतिहास बनाना नहीं है। एल्गोरिदम आपको वायरल बना सकता है, लेकिन विचार ही आपको कालजयी बनाते हैं।

व्यवस्था की कमियां गिनाना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक यह बताना है कि उन्हें सुधारा कैसे जाए। केवल समस्या बताना सक्रियता है, जबकि समाधान प्रस्तुत करना बौद्धिक उत्तरदायित्व।

जेन-जी पढ़ी-लिखी और पूरी दुनिया को अपने इंस्टाग्राम में समेट लेने वाली पीढ़ी है। यदि वह सकारात्मक समाधान लेकर सामने आए तो जेन-एक्स को उससे भी अधिक प्रसन्नता होगी।

लोकतंत्र को हठ नहीं, विमर्श चाहिए। शोर नहीं, तर्क चाहिए। आक्रोश भी चाहिए, लेकिन ऐसा जो विवेक के अनुशासन में ढला हो। बेलगाम गुस्सा आग तो लगा सकता है, उजाला नहीं कर सकता।

प्रिय जेन-जी, आपकी ऊर्जा पर किसी को संदेह नहीं है। प्रश्न केवल इतना है कि उस ऊर्जा का ड्राइवर ज्ञान है या एल्गोरिदम? आपका जीपीएस संविधान है या ‘ट्रेंडिंग टैब’?

जंतर-मंतर जाइए। सरकारों से असहमत होइए। सत्ता से कठोर प्रश्न पूछिए। अन्याय के विरुद्ध डटकर खड़े रहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है।

लेकिन इतना अवश्य याद रखिए कि भगत सिंह केवल इंकलाब का नारा नहीं थे। वे गंभीर अध्ययन, वैचारिक अनुशासन और स्पष्ट कार्ययोजना का भी दूसरा नाम थे। उनके हाथ में पिस्तौल से पहले पुस्तक थी और उनके पास विरोध के साथ भविष्य की रूपरेखा भी थी।

बाकी… रीलें चौबीस घंटे में गायब हो जाती हैं।

इतिहास का सर्वर थोड़ा धीमा अवश्य है, लेकिन वहां हमेशा के लिए वही फाइल सेव होती है जिसमें शोर से अधिक विचार, गुस्से से अधिक जिम्मेदारी और विरोध से अधिक समाधान दर्ज हो।

राष्ट्र आज भी ऐसे युवाओं की प्रतीक्षा कर रहा है जिनकी आवाज में आक्रोश, शब्दों में शालीनता, तर्क में गहराई और हाथ में केवल पोस्टर नहीं, समाधान का ड्राफ्ट भी हो।

क्योंकि ‘डाउन-डाउन’ के नारे किसी देश को ‘अप-अप’ नहीं करते। उसके लिए पढ़ना पड़ता है—और कभी-कभी कैमरा बंद करके देश के बारे में सोचना भी पड़ता है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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