मोबाइल की चाहत में उजड़े परिवार की त्रासदी समाज, अभिभावकों और शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी
डॉ. विनोद बब्बर

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में मोबाइल फोन को लेकर हुए पारिवारिक विवाद के बाद माता-पिता और उनके युवा पुत्र की मृत्यु का समाचार अत्यंत पीड़ादायक है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कुणाल चांदगुडे नामक युवक विवाद के बाद तिसगांव क्षेत्र की खवड्या पहाड़ी पर पहुंच गया था। करीब तीन घंटे तक माता-पिता, ग्रामीणों, पुलिस और अग्निशमन दल के कर्मचारी उसे सुरक्षित नीचे उतारने का प्रयास करते रहे।
पिता मुरलीधर बेटे के पास पहुंचे और उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन दोनों पहाड़ी से नीचे गिर गए। इसके बाद मां संगीता की भी खाई में गिरने से मृत्यु हो गई। इस घटना के कुछ विवरणों को लेकर अलग-अलग रिपोर्टें सामने आई हैं और पुलिस जांच जारी है, इसलिए इसके कारणों तथा घटनाक्रम पर अंतिम निष्कर्ष निकालने में सावधानी आवश्यक है। फिर भी यह त्रासदी परिवारों में घटते संवाद, भावनात्मक असंतुलन और भौतिक वस्तुओं के बढ़ते आकर्षण पर गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े करती है।
भौतिक साधन ही परवरिश नहीं
आखिर आज के किशोरों और युवाओं में निराशा, आवेग और असहिष्णुता क्यों बढ़ रही है? दिन-रात परिश्रम करके बच्चों के लिए सुविधाएं जुटाने वाले माता-पिता की विवशता कई बार संतान को दिखाई क्यों नहीं देती? मित्रों के बीच प्रभाव जमाने के लिए महंगे मोबाइल, गैजेट और ब्रांडेड वस्तुएं जीवन से भी अधिक महत्त्वपूर्ण कैसे हो जाती हैं?
आज के बच्चों में अपार ऊर्जा और प्रतिभा है, लेकिन उस ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने का उत्तरदायित्व परिवार, विद्यालय और समाज—तीनों का है। बच्चे हमारा भविष्य हैं। वे आगे चलकर राष्ट्र और समाज की जिम्मेदारी संभालेंगे। इसलिए उन्हें केवल भौतिक साधन उपलब्ध कराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेना उचित नहीं है। बचपन से ही उनमें संवेदना, अनुशासन, परिश्रम, धैर्य और उत्तरदायित्व का भाव विकसित करना होगा।
विज्ञापन रच रहे कृत्रिम आवश्यकताएं
विज्ञापन और उपभोक्तावाद का वर्तमान दौर मनुष्य के भीतर लगातार नई तथा कई बार अनावश्यक इच्छाएं पैदा कर रहा है। बार-बार दिखाई जाने वाली चमकदार वस्तुएं किशोर मन में यह भ्रम उत्पन्न करती हैं कि महंगा मोबाइल, तेज रफ्तार वाहन या ब्रांडेड कपड़े ही प्रतिष्ठा और सफलता के प्रमाण हैं।
दूसरी ओर, संयुक्त परिवार को केवल बंधन या बोझ बताने वाली प्रवृत्ति भी बढ़ी है। दादा-दादी और नाना-नानी से दूरी केवल रिश्तों से दूरी नहीं है; इसका अर्थ अनुभव, लोकज्ञान, परंपरा और जीवन जीने की कला से भी वंचित होना है। आधुनिक संसाधन उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन वे बच्चों के जीवन में श्रद्धा, संवेदना और संस्कार की रिक्तता नहीं भर सकते।
आज किसी बच्चे को उसकी गलती पर टोकना भी कई बार हितैषी होने के बजाय उसका विरोधी बन जाने जैसा समझा जाता है। एक पुरानी सीख है—भोजन में थोड़ी देर हो जाए तो बच्चा संभल सकता है, लेकिन सही समय पर संस्कार और भावनात्मक सहारा न मिले तो जीवनभर दिशाहीनता बनी रह सकती है।
पिछली पीढ़ी की असली पूंजी
संसाधनों के प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन संस्कारों के महत्त्व को भी नकारा नहीं जा सकता। पिछली पीढ़ियों ने सीमित साधनों के बावजूद ऊंचे लक्ष्य प्राप्त किए, क्योंकि उनके पास सहयोग, संवाद, धैर्य, अनुशासन और श्रम की पूंजी थी।
आज हमने बच्चों को संभावित चुनौतियों के लिए तैयार करने का बड़ा दायित्व मोबाइल फोन, इंटरनेट और अनियंत्रित डिजिटल माध्यमों को सौंप दिया है। तकनीक सहायक हो सकती है, अभिभावक या शिक्षक का विकल्प नहीं। बच्चे को केवल नियंत्रण नहीं, संवाद और विश्वास चाहिए। उसकी बात सुने बिना केवल उपदेश देना भी उतना ही अधूरा है, जितना हर मांग मान लेना।
शिक्षक को उसके वास्तविक दायित्व से न करें दूर
परिवार के बाद बच्चे के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव शिक्षक का पड़ता है, लेकिन आज शिक्षक की स्थिति भी चिंताजनक है। अनुशासन स्थापित करने के उसके अधिकार सीमित हो गए हैं, जबकि उस पर अनेक गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ बढ़ता जा रहा है।
मतदाता सूचियां तैयार करने, उनका सत्यापन करने और चुनावी प्रक्रिया में दायित्व निभाने वाला शिक्षक लोकतंत्र की व्यवस्था तो संभाल रहा है, लेकिन उसे भविष्य निर्माण के अपने मूल दायित्व के लिए पर्याप्त समय और स्वतंत्रता नहीं मिल रही। जब शिक्षक को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का अवसर ही नहीं मिलेगा तो वह बच्चों में जीवन-मूल्य और संस्कार कैसे विकसित करेगा?
अकेलापन भी बड़ी चुनौती
मनुष्य के मन में प्रेम, ममता और वात्सल्य के साथ क्रोध, निराशा तथा नकारात्मक भावनाएं भी जन्म ले सकती हैं। प्रकृति का सान्निध्य, खेलकूद, मित्रता और आपसी विवादों को स्वयं सुलझाने के अनुभव बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाते हैं। अत्यधिक सुरक्षा और हर समस्या का तत्काल समाधान भी बच्चे की संघर्ष क्षमता कमजोर कर सकता है।
छोटे परिवारों, व्यस्त जीवन और माता-पिता दोनों के कामकाजी होने के कारण अनेक बच्चे लंबे समय तक अकेले रहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि कामकाजी माता-पिता बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं दे सकते। असली प्रश्न साथ बिताए समय की मात्रा से अधिक उसकी गुणवत्ता, नियमित संवाद और बच्चे की भावनात्मक स्थिति को समझने का है।
दोषारोपण नहीं, आत्ममंथन की जरूरत
किसी एक दुखद घटना के आधार पर पूरी किशोर पीढ़ी को संस्कारहीन कहना उचित नहीं होगा। ऐसी घटनाओं के पीछे पारिवारिक तनाव, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक दबाव, डिजिटल प्रभाव और व्यक्तिगत परिस्थितियों सहित अनेक कारण हो सकते हैं। आवश्यकता किशोर को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि समय रहते उसके व्यवहार में आ रहे बदलावों को पहचानने की है।
यदि कोई बच्चा लगातार चिड़चिड़ा रहे, स्वयं को अलग कर ले, अत्यधिक निराशा व्यक्त करे अथवा जीवन समाप्त करने जैसी बातें कहे तो उसे हठ या नाटक मानकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। तत्काल संवेदनशील संवाद, विशेषज्ञ परामर्श और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना आवश्यक है।
कुणाल नाम का संस्कृत अर्थ हर वस्तु में सुंदरता देखने वाले व्यक्ति से जोड़ा जाता है। प्रश्न यह है कि हमारे बच्चे माता-पिता की भावनाओं और संसार में व्याप्त सुंदरता को क्यों नहीं देख पा रहे? इसका उत्तर केवल बच्चों से नहीं, हम सभी से मांगा जाना चाहिए।
किशोर पीढ़ी को महंगे उपकरणों से अधिक माता-पिता का समय, शिक्षकों का मार्गदर्शन, परिवार का विश्वास और समाज का संवेदनशील वातावरण चाहिए। संस्कार केवल उपदेश से नहीं आते; वे परिवार और समाज के आचरण, संवाद तथा उदाहरण से विकसित होते हैं।








