रक्षाबंधन: जानिए पवित्र पर्व से जुड़ी धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं

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रक्षा-सूत्र से भाई-बहन के स्नेह तक—सदियों पुरानी परंपरा का सामाजिक संदेश

संजय कुमार सुमन

भारत की सांस्कृतिक परंपरा में रक्षाबंधन केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, उत्तरदायित्व और पारस्परिक संरक्षण का संकल्प है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस त्योहार पर बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधकर उसके सुखी और दीर्घायु जीवन की कामना करती है। भाई भी बहन के सम्मान, सहयोग और सुरक्षा का वचन देता है।

‘रक्षाबंधन’ शब्द ‘रक्षा’ और ‘बंधन’ से मिलकर बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है—सुरक्षा का बंधन। प्राचीन परंपराओं में रक्षा-सूत्र केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं था। पुरोहित यजमानों को, गुरु शिष्यों को और महिलाएं युद्ध पर जाने वाले परिजनों को मंगलकामना के साथ रक्षा-सूत्र बांधती थीं। समय के साथ यह पर्व मुख्यतः भाई-बहन के आत्मीय संबंध का प्रतीक बन गया।

इंद्राणी ने बांधा था रक्षा-सूत्र

रक्षाबंधन से जुड़ी प्राचीन कथाओं में देवासुर संग्राम का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार देवताओं और असुरों के युद्ध में देवराज इंद्र की स्थिति कमजोर पड़ गई थी। तब उनकी पत्नी शची अर्थात इंद्राणी ने धार्मिक अनुष्ठान से अभिमंत्रित रक्षा-सूत्र इंद्र की कलाई पर बांधा और उनकी विजय की कामना की।

इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की। यह कथा बताती है कि रक्षा-सूत्र की मूल भावना केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा करना नहीं, बल्कि किसी प्रियजन के कल्याण और सुरक्षा की कामना करना भी है।

रक्षा-सूत्र बांधते समय आज भी प्रचलित मंत्र में राजा बलि का उल्लेख मिलता है—

“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”

अर्थात जिस रक्षा-सूत्र से महाबली राजा बलि को बांधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षा-सूत्र! तुम अडिग रहना।

राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा

भागवत परंपरा से जुड़ी लोकप्रिय कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर दानवीर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी। उन्होंने दो पग में पृथ्वी और आकाश नाप लिया। तीसरा पग रखने के लिए बलि ने अपना मस्तक आगे कर दिया।

बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसके यहां रहने का वचन दिया। भगवान विष्णु के वैकुंठ नहीं लौटने से माता लक्ष्मी चिंतित हुईं। उन्होंने राजा बलि को रक्षा-सूत्र बांधकर अपना भाई बनाया। बलि ने उपहार मांगने को कहा तो माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को उनके वचन से मुक्त कर वैकुंठ लौटने की अनुमति मांगी। राजा बलि ने बहन की इच्छा स्वीकार कर ली। तभी से यह कथा राखी के माध्यम से बने आत्मीय रिश्ते और उसकी मर्यादा का उदाहरण मानी जाती है।

श्रीकृष्ण और द्रौपदी का आत्मीय संबंध

महाभारत से जुड़ी एक लोकप्रिय लोककथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की अंगुली में चोट लगने पर द्रौपदी ने तत्काल अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर उनकी अंगुली पर बांध दिया था। द्रौपदी के इस स्नेह से भावविभोर श्रीकृष्ण ने संकट के समय उनकी रक्षा करने का संकल्प लिया।

लोकमान्यता इसे रक्षा-सूत्र की भावना से जोड़ती है। हालांकि महाभारत के मूल पाठ में इसे आधुनिक रक्षाबंधन अनुष्ठान के रूप में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया है। फिर भी यह कथा निस्वार्थ प्रेम और संकट में साथ निभाने का प्रभावशाली प्रतीक बन चुकी है।

सिकंदर, रुखसाना और राजा पोरस

एक प्रचलित ऐतिहासिक किंवदंती के अनुसार सिकंदर की पत्नी रुखसाना ने भारतीय राजा पोरस को रक्षा-सूत्र भेजकर युद्ध में अपने पति के प्राण नहीं लेने का अनुरोध किया था। कहा जाता है कि पोरस ने इस रिश्ते का सम्मान करते हुए युद्ध में सिकंदर पर प्राणघातक प्रहार नहीं किया।

सिकंदर और पोरस के बीच 326 ईसा पूर्व युद्ध हुआ था, लेकिन रुखसाना द्वारा राखी भेजे जाने की घटना का प्राचीन ऐतिहासिक स्रोतों में ठोस प्रमाण नहीं मिलता। इसलिए इसे प्रमाणित इतिहास के बजाय लोकप्रिय किंवदंती के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

रानी कर्णावती और हुमायूं

रक्षाबंधन से जुड़ा दूसरा चर्चित प्रसंग चित्तौड़ की रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूं का है। कहा जाता है कि वर्ष 1535 के आसपास गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण से संकट में घिरी रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी थी। हुमायूं सहायता के लिए निकला, लेकिन उसके पहुंचने से पहले चित्तौड़ पर संकट आ चुका था।

इस कहानी की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर विद्वानों में मतभेद हैं। तत्कालीन मुगल अभिलेखों में राखी भेजे जाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए इसे भी सांप्रदायिक सद्भाव और मानवीय संबंधों का संदेश देने वाली लोकगाथा कहना अधिक उचित होगा।

टैगोर ने राखी को बनाया एकता का सूत्र

रक्षाबंधन के आधुनिक इतिहास का सबसे प्रामाणिक और प्रेरक प्रसंग वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन आंदोलन से जुड़ा है। ब्रिटिश सरकार की विभाजनकारी नीति के विरोध में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने राखी को सामाजिक और सांप्रदायिक एकता का प्रतीक बनाया।

टैगोर के आह्वान पर हिंदू और मुसलमानों ने एक-दूसरे को रक्षा-सूत्र बांधकर बंगाल की एकता तथा परस्पर भाईचारे का संकल्प लिया। इस प्रकार राखी पारिवारिक दायरे से निकलकर राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव का माध्यम बनी। इतिहास में यह प्रसंग अपेक्षाकृत अधिक प्रमाणित माना जाता है।

उपहार नहीं, उत्तरदायित्व है रक्षाबंधन

बाजारवाद के प्रभाव से रक्षाबंधन पर महंगी राखियों और उपहारों का प्रचलन बढ़ा है, लेकिन त्योहार की सार्थकता लेन-देन में नहीं, बल्कि रिश्तों की आत्मीयता में है। उपहार प्रेम की सहज अभिव्यक्ति हो सकता है, पर उसे रिश्ते का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।

बहनों को भाइयों से केवल अपनी रक्षा का वचन लेने के बजाय प्रत्येक महिला के सम्मान का संकल्प भी लेना चाहिए। भाइयों को भी बहन की सुरक्षा का अर्थ उसके जीवन पर नियंत्रण नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा, स्वतंत्रता, सम्मान और निर्णयों में सहयोग समझना चाहिए।

रक्षाबंधन हमें यह संदेश देता है कि रक्षा एकतरफा दायित्व नहीं है। भाई और बहन दोनों जीवन के कठिन समय में एक-दूसरे का संबल बनें। यह भावना परिवार से आगे बढ़कर समाज के कमजोर, असहाय और वंचित लोगों के सम्मान एवं संरक्षण तक पहुंचे, तभी त्योहार की वास्तविक सार्थकता सिद्ध होगी।

स्नेह की डोर में बंधा सामाजिक संकल्प

समय के साथ रक्षाबंधन का स्वरूप व्यापक हुआ है। महिलाएं सैनिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ पेड़ों को भी रक्षा-सूत्र बांधती हैं। कई स्थानों पर जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर सामाजिक सौहार्द के लिए राखी बांधी जाती है।

रक्षाबंधन का वास्तविक संदेश यही है कि प्रेम के साथ उत्तरदायित्व और अधिकारों के साथ सम्मान भी जुड़ा होना चाहिए। विश्वास की यह छोटी-सी डोर हमें परिवार, समाज और राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधने की प्रेरणा देती है।

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Author: Bharat Sarathi

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