लोकतंत्र की असली पहचान सदन चलाना है, हंगामा नहीं, जनता के खून पसीने की कमाई जा रही व्यर्थ जिम्मेदार कौन?
डॉ. घनश्याम बादल

अस्सीवें स्वाधीनता दिवस पर जब देश तिरंगे को सलामी दे रहा है, तब संसद का वर्षाकालीन सत्र एक बड़ा और असहज सवाल छोड़कर विदा हुआ है कि हमने आज़ादी से लोकतंत्र तो हासिल कर लिया, लेकिन क्या लोकतांत्रिक आचरण को कहीं पीछे छोड़ दिया? वर्षा कालीन सत्र में में 19 बैठकें हुईं, लेकिन लोकसभा की उत्पादकता केवल 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत रही। दोनों सदनों से 12 विधेयक पारित भी हुए, लेकिन केवल एक विधेयक पर दोनों सदनों में चर्चा हो सकी। क्या यही है एक आज़ाद मुल्क और सच्चे लोकतंत्र की पहचान ?
यह केवल संसद की कार्यक्षमता का रिपोर्ट कार्ड नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक संस्कृति का आईना भी है, जिसकी नींव हमारे स्वतंत्रता आंदोलन ने त्याग, असहमति, संवाद और जन-जवाबदेही पर रखी थी।
सदन बहस के लिए या, बहिष्कार के लिए ?
सरकार का आरोप है कि विपक्ष ने सदन नहीं चलने दिया। विपक्ष का कहना है कि सरकार महत्वपूर्ण सवालों पर चर्चा से बचती रही। दोनों पक्षों के पास अपने-अपने तर्क हैं, लेकिन जनता के सामने परिणाम एक ही है—संसद का बहुमूल्य समय नष्ट हुआ और जनता के अनेक सवाल अनुत्तरित रह गए।
विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन व्यवधान लोकतंत्र का विकल्प नहीं हो सकता। नारे, पोस्टर और वेल में प्रदर्शन किसी मुद्दे को सुर्खियां तो दिला सकते हैं, समाधान नहीं। दूसरी ओर, बहुमत सरकार को यह अधिकार नहीं देता कि वह हर असहमति को बाधा मान ले और विधायी प्रक्रिया को केवल संख्याबल का खेल बना दे।
संसद में सरकार की जिम्मेदारी कानून बनाना जितनी है, विपक्ष की जिम्मेदारी उन कानूनों की कमियां सामने लाना भी उतनी ही है। दोनों अपने दायित्व से बचेंगे तो हार किसी दल की नहीं, लोकतंत्र की होगी।
खून पसीने की कमाई गर्त में ……….. हर मिनट की कीमत जनता चुकाती है
संसद का ठप होना केवल राजनीतिक गतिरोध नहीं है; इसकी आर्थिक कीमत भी है। उपलब्ध आंकडों के अनुसार संसद की कार्यवाही चलाने पर अगस्त 2012 मेंलगभग ₹2.5 लाख प्रति मिनट खर्च होता था यानी उस हिसाब सेकरीब ₹1.5 करोड़ प्रति घंटे और छह घंटे के एक कार्यदिवस की कीमत लगभग ₹9 करोड़ बैठती है। जबकि महंगाई एवं मूल्य सूचकांक के अनुसार देखें तो आज यह मूल्य कहीं अधिक हो जाता है और इस डर से आज संसद के कार्रवाई पर प्रत्येक मिनट 5 ,12000 रुपए का अनुमानित खर्च आता है।
यह पैसा किसी राजनीतिक दल की जेब से नहीं आम नागरिक के कर से आता है जो पेट्रोल, डीजल, जीएसटी, आयकर और रोजमर्रा की वस्तुओं पर कर चुकाता है। इसलिए संसद का प्रत्येक बाधित मिनट केवल समय की बर्बादी नहीं, करदाता के धन और लोकतांत्रिक अवसर का अपव्यय है।
इस सवाल को और गंभीरता से समझना होगा। यदि संसद में जनता के पैसे से उपलब्ध कराया गया समय प्रश्न पूछने, बहस करने, कानूनों की जांच करने और सरकार को जवाबदेह बनाने के बजाय नारेबाजी और स्थगन में चला जाए तो नुकसान केवल राजकोष का नहीं होता। जनता अपने प्रतिनिधियों को जिस काम के लिए दिल्ली भेजती है, वही काम अधूरा रह जाता है।
इसलिए संसद को ठप करने की राजनीति हो या बिना पर्याप्त चर्चा के विधेयक पारित करने की जल्दबाजी,दोनों पर जनता के धन और विश्वास के अपव्यय का सवाल उठना चाहिए।
बहुमत कानून बना सकता है, भरोसा नहीं
12 विधेयकों का पारित होना सरकार के लिए विधायी उपलब्धि हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की कसौटी केवल यह नहीं कि कितने कानून बने। असली प्रश्न यह है कि कितने कानूनों पर पर्याप्त चर्चा हुई, कितने सवालों के जवाब मिले और कितनी चिंताओं को विधायी प्रक्रिया में जगह मिली।
किसी विधेयक का जल्दी पारित हो जाना गति का प्रमाण हो सकता है, गुणवत्ता का नहीं। संसद कानून बनाने की मशीन नहीं, जनमत को कानून में बदलने का संवैधानिक मंच है।
स्वाधीनता का अर्थ केवल शासन बदलना नहीं था
स्वाधीनता दिवस हमें केवल यह याद नहीं दिलाता कि आज के दिन विदेशी शासन समाप्त हुआ था। यह भी याद दिलाता है कि स्वतंत्र भारत में सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह है। स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य केवल अंग्रेजों को हटाना मात्र नहीं ऐसा भारत बनाना था जहां असहमति देशद्रोह न हो, सत्ता निरंकुश न हो और आम आदमी की आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचे।
इसलिए संसद का हंगामा स्वाधीनता की उस मूल भावना के सामने भी एक बड़ा प्रश्न वाचक चिह्न बनकर खड़ा दिखाई देता है। शोर में प्रश्न दब जाएं और आरोप-प्रत्यारोप में उत्तरदायित्व खो जाए तो स्वतंत्रता का राजनीतिक अर्थ खोखला होने लगता है।
सरकार और विपक्ष करें आत्ममंथन :
सरकार को समझना होगा कि मजबूत बहुमत का अर्थ मजबूत लोकतंत्र तभी है, जब वह असहमति को सुनने का साहस भी रखे। महत्वपूर्ण विधेयकों को पर्याप्त चर्चा, संसदीय समितियों की जांच और विपक्ष की आपत्तियों के साथ आगे बढ़ाना चाहिए।
विपक्ष को भी यह तय करना होगा कि विरोध का हथियार सदन को रोकना नहीं, सदन में तर्क के साथ सरकार को घेरना है। लगातार व्यवधान विपक्ष के अपने ही हथियार को कुंद करता है, क्योंकि प्रश्न पूछने, बहस करने और सरकार को कठघरे में खड़ा करने का अवसर उसी से छिन जाता है।
सांसदों का आचरण :
अब समय आ गया है कि संसद की उत्पादकता को केवल आंकड़ों से नहीं, आचरण से भी मापा जाए। अनावश्यक व्यवधान, लगातार नारेबाजी और सदन की कार्यवाही बाधित करने की प्रवृत्ति पर सर्वदलीय सहमति से स्पष्ट नियम बनने चाहिए। साथ ही पीठासीन अधिकारियों को भी निष्पक्षता की ऐसी मिसाल कायम करनी होगी जिस पर सत्ता और विपक्ष दोनों भरोसा कर सकें। सदन चलाना केवल अध्यक्ष या सभापति की जिम्मेदारी नहीं; यह प्रत्येक सांसद की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
क्या हो आज़ादी का संकल्प?
स्वाधीनता दिवस पर तिरंगे को सलामी देने के साथ संसद के भीतर भी एक संकल्प होना चाहिए,सदन को रणभूमि नहीं, संवादभूमि बनाने का संकल्प। सरकार अपनी संख्या के अहंकार से बचे, विपक्ष व्यवधान के आचरण से। सत्ता जवाब दे और विपक्ष सवाल पूछे; सरकार सुने और विपक्ष सुने जाने का अवसर दे। विधेयक आए तो बहस हो, असहमति हो तो दर्ज़ हो और निर्णय अंततः संविधान की मर्यादा में हो।
आखिर जिस संसद के हर मिनट पर लाखों रुपये करदाताओं के खर्च होते हैं, उसका एक-एक मिनट जनता की अमानत है। उस अमानत को नारेबाजी में गंवाना भी अनुचित है और बिना पर्याप्त बहस के कानून बनाकर उसकी लोकतांत्रिक कीमत घटाना भी।
कैसी हो संसद
आज देश को ऐसी संसद चाहिए जहां आवाज़ ऊंची नहीं, तर्क ऊंचा हो; जहां माइक बंद करने की नौबत न आए क्योंकि संवाद बंद न हो; जहां बहुमत अपनी ताकत दिखाने के बजाय अपनी जिम्मेदारी निभाए और विपक्ष अपनी संख्या कम होने के बावजूद अपनी लोकतांत्रिक भूमिका पूरी करे।
आज़ादी का अमृत तभी सार्थक है जब संसद में लोकतंत्र जीवित दिखाई दे। तिरंगा केवल संसद भवन के ऊपर नहीं, संसदीय आचरण में भी ऊंचा रहना चाहिए। यही स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों के भारत के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।








