नीट आंदोलन: छात्र शक्ति ने लोकतंत्र को फिर किया जागृत

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग ने दिखाया कि लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण संघर्ष व्यवस्था को आत्ममंथन के लिए बाध्य कर सकता है।

सौरभ वार्ष्णेय

देश के लोकतांत्रिक इतिहास में समय-समय पर ऐसे जनआंदोलन हुए हैं, जिन्होंने सत्ता और व्यवस्था को जनता की आवाज़ सुनने के लिए विवश किया। किसानों के आंदोलन से लेकर भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों तक अनेक उदाहरण इस बात के साक्षी हैं कि लोकतंत्र में संगठित, शांतिपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण जनशक्ति परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बन सकती है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर उठा छात्र आंदोलन इसी परंपरा की नई कड़ी के रूप में सामने आया है।

नीट केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि देश के लाखों विद्यार्थियों के सपनों और भविष्य का आधार है। ऐसे में यदि परीक्षा की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं, तो उसका प्रभाव केवल परिणामों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की साख पर पड़ता है। वर्षों की कठिन तैयारी के बाद यदि छात्रों को यह महसूस होने लगे कि सफलता योग्यता के बजाय व्यवस्था की खामियों पर निर्भर हो सकती है, तो असंतोष और आक्रोश स्वाभाविक है।

इसी असंतोष ने देशभर के छात्रों को एक मंच पर ला खड़ा किया। सोशल मीडिया के माध्यम से संगठित होकर युवाओं ने जंतर-मंतर सहित अनेक स्थानों पर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखी। इस आंदोलन की विशेषता यह रही कि इसका केंद्र छात्रों की मांगें थीं। इससे यह संदेश भी गया कि आज का युवा केवल डिजिटल दुनिया तक सीमित नहीं है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर संविधानसम्मत तरीके से अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना भी जानता है।

बढ़ते जनदबाव के बीच केंद्र सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की आवश्यकता महसूस की। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, परीक्षा प्रणाली में सुधार के संकेत और पारदर्शिता पर बढ़ती गंभीरता को अनेक लोगों ने छात्र आंदोलन के प्रभाव के रूप में देखा। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक सिद्धांत भी है कि सरकारें अंततः जनता की चिंताओं के प्रति जवाबदेह होती हैं। जब किसी आंदोलन की नींव तथ्यों, अनुशासन और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित होती है, तो उसका नैतिक प्रभाव अधिक व्यापक होता है।

भारतीय इतिहास इस बात का प्रमाण है कि छात्र शक्ति केवल शिक्षा संस्थानों तक सीमित नहीं रही। स्वतंत्रता आंदोलन, जेपी आंदोलन और विभिन्न सामाजिक अभियानों में युवाओं ने परिवर्तन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नीट आंदोलन ने भी यह याद दिलाया कि छात्र केवल भविष्य के मतदाता नहीं, बल्कि वर्तमान के सक्रिय नागरिक हैं, जो व्यवस्था में पारदर्शिता, समान अवसर और जवाबदेही की मांग कर सकते हैं।

हालाँकि, किसी भी छात्र आंदोलन की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका उद्देश्य व्यवस्था सुधार बना रहे, न कि राजनीतिक ध्रुवीकरण। शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर सभी पक्षों—सरकार, विपक्ष, न्यायपालिका, शैक्षणिक संस्थानों और समाज—की जिम्मेदारी है कि वे इसे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर देखें। परीक्षा प्रणाली इतनी मजबूत होनी चाहिए कि पेपर लीक, नकल माफिया और संगठित भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं की पुनरावृत्ति की संभावना न्यूनतम रह जाए।

नीट विवाद ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल दोषियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता परीक्षा संचालन की पूरी व्यवस्था में व्यापक सुधार की है। डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करना, तकनीकी निगरानी बढ़ाना, संस्थागत जवाबदेही तय करना, समयबद्ध जांच सुनिश्चित करना और दोषियों के लिए कठोर दंड व्यवस्था लागू करना अब समय की मांग है। लाखों विद्यार्थियों का भविष्य किसी प्रशासनिक चूक या आपराधिक नेटवर्क के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों से नहीं, बल्कि संवाद की संस्कृति से तय होती है। जब छात्र समुदाय किसी मुद्दे पर लगातार अपनी चिंता व्यक्त करता है, तो सरकार की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि समय रहते संवाद स्थापित कर समाधान खोजना भी होती है। दूसरी ओर, आंदोलनों का शांतिपूर्ण और संविधानसम्मत बने रहना भी उतना ही आवश्यक है। हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर कर देता है।

नीट आंदोलन ने केवल परीक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर नहीं किया, बल्कि लोकतंत्र में छात्र शक्ति की प्रासंगिकता को भी पुनर्स्थापित किया है। इसका सबसे बड़ा संदेश यही है कि परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों, संगठित प्रयासों और लोकतांत्रिक संघर्ष से आता है। जब उद्देश्य स्पष्ट हो, संघर्ष न्यायपूर्ण हो और माध्यम संविधानसम्मत हों, तब परिवर्तन की संभावना प्रबल हो जाती है। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी सीख भी।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!