धर्म–समाज के ठेकेदारों, आपको शत-शत नमन!

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

प्रशंसा और आलोचना दोनों को प्रसाद मानकर काम करने वालों को समर्पित एक व्यंग्यात्मक नमन।

-सुरेश गोयल धूप वाला
पूर्व जिला महामंत्री, भाजपा जिला हिसार

हमारे देश में यदि कोई सबसे कठिन और सबसे “मोटी चमड़ी” वाला व्यवसाय है, तो वह है—धर्म और समाज की ठेकेदारी। सड़क, पुल और इमारत के ठेकेदार तो बहुत देखे होंगे, लेकिन सामाजिक और धार्मिक ठेकेदारों जैसा अद्भुत प्राणी दुर्लभ ही मिलता है। ये ऐसे महापुरुष होते हैं जिन पर प्रशंसा का भी कोई असर नहीं होता और आलोचना का तो बिल्कुल भी नहीं। जितनी गालियाँ सुनते हैं, उतनी ही मजबूती से अगली बैठक की अध्यक्षता कर लेते हैं।

इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके कानों में भगवान ने शायद “आलोचना-रोधी फिल्टर” लगाकर भेजा होता है। सामने कोई कहे—”प्रधान जी, आपके जैसा ईमानदार कोई नहीं।” पीछे वही व्यक्ति कहता मिले—”अरे भाई, संस्था का हिसाब तो कभी दिखाओ!” लेकिन हमारे प्रधान जी की मुस्कान दोनों परिस्थितियों में एक जैसी रहती है। मानो उन्होंने जीवन का परम ज्ञान प्राप्त कर लिया हो।

किसी भी सामाजिक या धार्मिक संस्था में जाइए। मंच पर अध्यक्ष महोदय विराजमान होंगे। नीचे बैठे कुछ लोग हर तीसरे वाक्य में “प्रधान जी… प्रधान जी…” कहकर वातावरण को भक्तिमय बनाए रखेंगे। ऐसा प्रतीत होगा मानो संस्था नहीं, किसी महाराजा का दरबार लगा हो। लेकिन जैसे ही बैठक समाप्त होगी, वही लोग बाहर निकलते ही फुसफुसाना शुरू कर देंगे—”देख लेना, चंदे का पूरा हिसाब नहीं है… कुछ तो गड़बड़ है।”

मजेदार बात यह है कि संस्था में यदि दस लोग हैं तो एक व्यक्ति अध्यक्ष का गुणगान करेगा, जबकि बाकी नौ उसके निर्णयों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार कर रहे होंगे। कोई कहेगा—”प्रधान जी बहुत खर्चीले हैं।” दूसरा बोलेगा—”नहीं, बहुत कंजूस हैं।” तीसरा कहेगा—”हर काम में राजनीति करते हैं।” चौथा निर्णय देगा—”इनके बिना संस्था चल ही नहीं सकती।” बेचारा प्रधान समझ नहीं पाता कि वह महान है या बदनाम।

आजकल तो व्हाट्सऐप-फेसबुक विश्वविद्यालय ने भी इन ठेकेदारों का जीवन और कठिन बना दिया है। बैठक में सब प्रस्ताव के पक्ष में हाथ उठाते हैं, लेकिन रात होते-होते पाँच अलग-अलग समूहों में वही प्रस्ताव लोकतंत्र की चिता पर बैठा दिखाई देता है। सुबह तक संस्था के संविधान से लेकर प्रधान जी के खानदान तक का विश्लेषण हो चुका होता है।

फिर भी आश्चर्य देखिए, अगली सुबह प्रधान जी समय पर कार्यालय पहुँच जाते हैं। चेहरे पर वही मुस्कान, हाथ में वही डायरी और होठों पर वही वाक्य—”आइए भाइयों, समाज सेवा करनी है।” लगता है मानो आलोचना इनके लिए टॉनिक हो। जितनी अधिक आलोचना, उतनी अधिक सक्रियता।

सच पूछा जाए तो समाज सेवा करना आसान नहीं है। घर का समय, अपना धन, अपनी प्रतिष्ठा और ऊपर से मुफ्त की सलाहें—सब कुछ झेलना पड़ता है। कई बार तो ऐसा लगता है कि समाज सेवा से अधिक कठिन काम समाज सेवकों की आलोचना सुनना है। आलोचक भी बड़े ईमानदार होते हैं; स्वयं कभी आगे नहीं आएँगे, लेकिन दूसरों के हर कदम में कमी अवश्य निकालेंगे। उनकी दृष्टि इतनी पैनी होती है कि उन्हें चाय के खर्च का हिसाब तो दिखाई देता है, पर अपने योगदान की राशि कभी याद नहीं रहती।

इसलिए मैं तो धर्म और समाज के उन सभी “ठेकेदारों” को दिल से प्रणाम करता हूँ, जो प्रशंसा और निंदा, दोनों को प्रसाद मानकर काम करते रहते हैं। क्योंकि यदि वे भी आलोचकों की बातों से घबरा जाएँ, तो समाज की आधी संस्थाओं पर ताला लग जाए और बाकी आधी केवल व्हाट्सऐप की बहसों में चलती रहें।

अतः, हे धर्म और समाज के महान ठेकेदारों! आप सचमुच महान हैं। आपकी चमड़ी लोकतंत्र की सबसे मजबूत दीवार है। भगवान आपको और भी अधिक धैर्य, सहनशक्ति और आलोचना पचाने की क्षमता दें, क्योंकि समाज में आपकी सबसे बड़ी योग्यता शायद यही है कि आप हर ताने को मुस्कुराकर सुन लेते हैं और फिर अगले दिन उसी उत्साह से “समाज सेवा” में जुट जाते हैं।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!