ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल 2026 की रिपोर्ट में भारत की 91वीं रैंकिंग ने बढ़ाई चिंता, सुशासन के लिए नई चुनौती
– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने या देने तक सीमित अपराध नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था, न्याय व्यवस्था और नागरिकों के विश्वास को भीतर से खोखला करने वाली ऐसी दीमक है, जो धीरे-धीरे पूरे शासन तंत्र को कमजोर कर देती है। यदि कैंसर शरीर को अंदर से नष्ट करता है, तो भ्रष्टाचार राष्ट्र की संस्थाओं, नीतियों और नैतिक मूल्यों को उसी प्रकार क्षीण करता है।
भारत का आम नागरिक जन्म प्रमाण पत्र से लेकर भूमि रिकॉर्ड, पुलिस, स्थानीय निकाय, कराधान, लाइसेंस, निर्माण अनुमति और अनेक सरकारी सेवाओं तक कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की पीड़ा का अनुभव करता है। कई लोग इसे “चाय-पानी” कहकर सामान्य मान लेते हैं, जबकि यही छोटी-छोटी रिश्वतें आगे चलकर बड़े भ्रष्टाचार की जड़ बन जाती हैं।
मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, अधिवक्ता होने के नाते जनता के बीच यह जनजागरण करना चाहता हूं कि आज आवश्यकता केवल भ्रष्टाचार की शिकायत करने की नहीं, बल्कि उसे सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बनाने की है। ऐसे समय में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (सीपीआई) 2026 भारत सहित पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी बनकर सामने आया है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत 39 अंकों के साथ 91वें स्थान पर है। विशेष बात यह है कि 0 अंक का अर्थ अत्यधिक भ्रष्ट व्यवस्था तथा 100 अंक का अर्थ अत्यंत स्वच्छ और पारदर्शी शासन व्यवस्था है। भारत में भ्रष्टाचार एक गंभीर चुनौती है, किंतु इस स्तर की रैंकिंग निश्चित रूप से चिंताजनक है। यह स्थिति भारत की प्रतिष्ठा, निवेश वातावरण और विकास यात्रा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
यह रिपोर्ट केवल किसी देश की रैंकिंग नहीं बताती, बल्कि उसकी प्रशासनिक विश्वसनीयता, निवेश आकर्षण, शासन की गुणवत्ता और संस्थागत पारदर्शिता का वैश्विक संकेतक भी मानी जाती है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए यह केवल अंक या स्थान का प्रश्न नहीं, बल्कि उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा, निवेशकों के विश्वास और नागरिकों की उम्मीदों का विषय भी है।
भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित वैश्विक सूचकांकों में से एक है। इसे प्रतिवर्ष ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित किया जाता है। यह रिपोर्ट सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की धारणा को 0 से 100 के पैमाने पर मापती है। इसकी विशेषता यह है कि यह किसी एक संस्था की राय पर आधारित नहीं होती, बल्कि विश्व बैंक, विश्व आर्थिक मंच, एशियाई विकास बैंक सहित अनेक स्वतंत्र वैश्विक स्रोतों और विशेषज्ञों के आकलन को समाहित करती है। इसी कारण इसकी विश्वसनीयता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार की जाती है।
वर्ष 2026 की रिपोर्ट की वैश्विक तस्वीर भी चिंता उत्पन्न करने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के दो-तिहाई से अधिक देशों का स्कोर 50 से कम है, अर्थात अधिकांश देशों में सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार गंभीर चुनौती बना हुआ है। यह स्पष्ट संकेत है कि भ्रष्टाचार केवल विकासशील देशों की समस्या नहीं, बल्कि विकसित देशों के लिए भी एक सतत चुनौती है।
डेनमार्क 89 अंकों के साथ सबसे स्वच्छ देशों में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है। इसके बाद फिनलैंड, न्यूजीलैंड और नॉर्वे जैसे देश हैं। इन देशों की सफलता का आधार केवल कठोर कानून नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाएं, पारदर्शी सरकारी प्रक्रियाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका, प्रभावी मीडिया, नागरिक सहभागिता और राजनीतिक ईमानदारी है। दूसरी ओर दक्षिण सूडान, सोमालिया और वेनेजुएला जैसे देश सबसे अधिक भ्रष्ट देशों में शामिल हैं।
भारत की स्थिति इस रिपोर्ट में विशेष चर्चा का विषय बनी है। एक ओर डिजिटल प्रशासन, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, आधार आधारित सेवाओं, सरकारी खरीद में डिजिटलीकरण तथा अनेक प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से सकारात्मक प्रगति हुई है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार, राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता की कमी, प्रवर्तन एजेंसियों की प्रभावशीलता तथा प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दे अभी भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं।
भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। विदेशी निवेश आकर्षित करने, वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने, डिजिटल अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल आर्थिक सुधार पर्याप्त नहीं होंगे। निवेशक केवल बाजार का आकार नहीं देखते, बल्कि वे यह भी देखते हैं कि किसी देश में कानून का शासन कितना मजबूत है और भ्रष्टाचार का स्तर कितना कम है।
भारत में भ्रष्टाचार के अनेक रूप हैं। छोटे स्तर पर सरकारी कार्यालयों में सुविधा शुल्क, भूमि रिकॉर्ड में हेरफेर, पुलिस या स्थानीय प्रशासन में रिश्वत, ठेकों में अनियमितताएं, सरकारी खरीद में पक्षपात तथा लाइसेंस और परमिट में अवैध भुगतान जैसी समस्याएं व्यापक रूप से चर्चा में रहती हैं। बड़े स्तर पर राजनीतिक वित्तपोषण, सार्वजनिक परियोजनाओं में लागत वृद्धि तथा सत्ता और व्यवसाय के बीच अपारदर्शी संबंध भी चिंता का विषय हैं।
एक गंभीर सामाजिक समस्या यह भी है कि भ्रष्टाचार को अनेक लोग व्यवस्था का सामान्य हिस्सा मान चुके हैं। “काम जल्दी हो जाए” या “बिना परेशानी के काम निकल जाए” जैसी मानसिकता भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। जब रिश्वत देने वाला और लेने वाला दोनों इसे सामान्य व्यवहार मान लेते हैं, तब कानून भी सीमित प्रभाव छोड़ता है। इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष केवल सरकारी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है।
हाल के वर्षों में भारत ने ई-गवर्नेंस, डिजिटल भुगतान, डीबीटी, जीईएम, ऑनलाइन टेंडर प्रणाली, आयकर और जीएसटी के डिजिटलीकरण तथा डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधन जैसे अनेक सुधार किए हैं। इन पहलों ने भ्रष्टाचार की संभावनाओं को कम किया है। फिर भी केवल तकनीक समाधान नहीं है। यदि संस्थागत जवाबदेही कमजोर रहे, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई न हो और दोषियों को शीघ्र दंड न मिले, तो तकनीकी सुधारों का प्रभाव सीमित रह जाता है।
राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता आज सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक है। लोकतंत्र में चुनाव आवश्यक हैं, किंतु चुनावी वित्तपोषण यदि अपारदर्शी रहेगा तो नीति निर्माण पर निजी हितों का प्रभाव बढ़ सकता है। इसलिए राजनीतिक दलों की आय, चुनावी चंदे और व्यय में पारदर्शिता लोकतांत्रिक शासन की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है।
लोकपाल, लोकायुक्त, केंद्रीय सतर्कता आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, सूचना आयोग, न्यायपालिका, सतर्कता तंत्र और स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र के प्रहरी हैं। यदि ये संस्थाएं निष्पक्ष, स्वतंत्र और संसाधन-संपन्न हों तो भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।
सूचना का अधिकार अधिनियम ने भारत में पारदर्शिता बढ़ाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। अनेक घोटाले, अनियमितताएं और प्रशासनिक कमियां इसी कानून के माध्यम से सामने आईं। इसलिए सूचना तक नागरिकों की पहुंच को और अधिक मजबूत करना समय की आवश्यकता है।
विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नैतिक शिक्षा, ईमानदारी, सार्वजनिक जीवन के मूल्यों और संवैधानिक कर्तव्यों पर अधिक बल दिया जाना चाहिए। भविष्य की पीढ़ी यदि ईमानदारी को सफलता का आधार मानेगी, तभी भ्रष्टाचार के विरुद्ध दीर्घकालिक परिवर्तन संभव होगा।
कॉर्पोरेट क्षेत्र की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। रिश्वत देकर अनुबंध प्राप्त करना, कर चोरी, फर्जी बिलिंग या अनुचित प्रभाव का उपयोग करना भी भ्रष्टाचार का हिस्सा है। इसलिए मजबूत कॉर्पोरेट गवर्नेंस, स्वतंत्र ऑडिट, व्हिसलब्लोअर सुरक्षा और नैतिक व्यावसायिक आचरण आवश्यक हैं।
भ्रष्टाचार का सबसे अधिक नुकसान गरीब, मध्यम वर्ग और छोटे उद्यमियों को होता है। जिनके पास संसाधन कम होते हैं, वे रिश्वत देने में अधिक कठिनाई महसूस करते हैं। परिणामस्वरूप सामाजिक असमानता और बढ़ती है। इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष वास्तव में सामाजिक न्याय का भी संघर्ष है।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की यह रिपोर्ट भारत के लिए निराशा का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सुधार का अवसर है। यदि हम डिजिटल प्रशासन का विस्तार करें, शिकायत निवारण को प्रभावी बनाएं, स्वतंत्र संस्थाओं को मजबूत करें, राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता लाएं, न्यायिक प्रक्रियाओं को तेज करें और नागरिकों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध सक्रिय भागीदार बनाएं, तो भारत की स्थिति आने वाले वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बेहतर हो सकती है।
अंततः भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यह सरकार, न्यायपालिका, प्रशासन, मीडिया, उद्योग, नागरिक समाज और प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। जब तक रिश्वत देने वाला यह नहीं कहेगा कि “मैं सुविधा शुल्क नहीं दूंगा”, तब तक रिश्वत लेने वाला भी समाप्त नहीं होगा।
समय की मांग है कि भ्रष्टाचार को सुविधा नहीं, अपराध माना जाए; मौन नहीं, शिकायत की जाए; समझौता नहीं, प्रतिरोध किया जाए। तभी भारत वैश्विक मंच पर केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि सुशासन, पारदर्शिता और नैतिक नेतृत्व का भी उदाहरण बन सकेगा। यही विकसित भारत की वास्तविक पहचान होगी।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र








