— सुरेश गोयल धूप वाला
पूर्व भाजपा जिला महामंत्री, भाजपा जिला हिसार

भारत में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं हैं, बल्कि वे सनातन संस्कृति, सामाजिक चेतना और लोककल्याण की प्राचीन परंपरा के जीवंत केंद्र रहे हैं। भारतीय समाज में श्रद्धालु अपनी श्रद्धा, विश्वास और सामर्थ्य के अनुसार मंदिरों में दान एवं चढ़ावा अर्पित करते हैं। यह दान किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और समाज की सेवा की भावना से दिया जाता है। इसलिए स्वाभाविक अपेक्षा है कि मंदिरों में प्राप्त चढ़ावे का उपयोग भी उसी लोकहितकारी उद्देश्य के अनुरूप हो।
आज आवश्यकता इस बात पर गंभीर और संतुलित राष्ट्रीय विमर्श की है कि मंदिरों में प्राप्त दानराशि का उपयोग अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जनकल्याणकारी कैसे बनाया जाए। यह विषय धार्मिक आस्था और सामाजिक उत्तरदायित्व—दोनों से जुड़ा है, इसलिए इसे किसी राजनीतिक या वैचारिक पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि व्यापक जनहित के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
यह निर्विवाद है कि मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित दान पर सरकार का अनावश्यक हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता। धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता, परंपराओं और श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान लोकतांत्रिक व्यवस्था का भी दायित्व है। किंतु स्वायत्तता के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। करोड़ों रुपये के चढ़ावे के उपयोग के संबंध में स्पष्ट व्यवस्था, पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है। आखिर यह धन समाज की श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है।
देश में अनेक ऐसे मंदिर हैं, जिन्होंने अपने संसाधनों का उत्कृष्ट उपयोग करते हुए अस्पताल, विद्यालय, अन्नक्षेत्र, गौशालाएँ, छात्रावास, धर्मशालाएँ, संस्कृत शिक्षा केंद्र तथा विभिन्न सेवा परियोजनाएँ स्थापित की हैं। इन संस्थानों ने यह सिद्ध किया है कि भारतीय परंपरा में धर्म और सेवा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। ऐसे उदाहरण समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
इसके विपरीत, कुछ स्थानों पर ऐसे भी उदाहरण सामने आते हैं जहाँ वर्षों से निजी अथवा पारिवारिक ट्रस्टों के रूप में संचालित मंदिरों में पर्याप्त चढ़ावा प्राप्त होने के बावजूद श्रद्धालुओं के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव बना रहता है। स्वच्छ पेयजल, शौचालय, विश्राम स्थल, पार्किंग, स्वच्छता, दिव्यांगजन-अनुकूल व्यवस्थाएँ और सुरक्षित आवास जैसी आवश्यक सुविधाएँ कई स्थानों पर पर्याप्त नहीं हैं। जब श्रद्धालु लंबी यात्रा करके मंदिर पहुँचते हैं और उन्हें आधारभूत सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होतीं, तो यह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक प्रतीत होती है।
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न वित्तीय पारदर्शिता का है। यदि दानराशि के उपयोग का सार्वजनिक विवरण उपलब्ध न हो या उसके उपयोग को लेकर लगातार प्रश्न उठते रहें, तो श्रद्धालुओं के मन में स्वाभाविक रूप से शंकाएँ उत्पन्न होती हैं। मंदिर किसी व्यक्ति, परिवार या समूह की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सामूहिक आस्था के केंद्र हैं। इसलिए उनके संसाधनों का उपयोग भी उच्च नैतिक मानकों और सार्वजनिक विश्वास के अनुरूप होना चाहिए।
समय की आवश्यकता है कि मंदिरों के संचालन के लिए ऐसी व्यापक आचार-संहिता विकसित की जाए, जो धार्मिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखते हुए वित्तीय पारदर्शिता और सुशासन को प्रोत्साहित करे। प्रत्येक मंदिर ट्रस्ट प्रतिवर्ष अपनी आय-व्यय का लेखा-जोखा सार्वजनिक करे। मंदिर के रखरखाव, कर्मचारियों के वेतन और धार्मिक आयोजनों पर होने वाले आवश्यक व्यय के पश्चात उपलब्ध राशि का एक निर्धारित भाग श्रद्धालुओं की सुविधाओं, निर्धनों की चिकित्सा, शिक्षा, गौसंरक्षण, संस्कृत एवं वैदिक अध्ययन, पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक आपदाओं में राहत तथा अन्य जनकल्याणकारी कार्यों में नियोजित किया जा सकता है। इससे मंदिरों की सामाजिक भूमिका और अधिक सशक्त होगी।
यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि उद्देश्य मंदिरों की आय पर नियंत्रण स्थापित करना नहीं, बल्कि उसके अधिक प्रभावी और लोकहितकारी उपयोग को प्रोत्साहित करना है। यदि देश के प्रमुख मंदिर सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्थान के बड़े केंद्र बनें, तो सनातन परंपरा की प्रतिष्ठा और भी सुदृढ़ होगी। श्रद्धालुओं का विश्वास भी बढ़ेगा कि उनके द्वारा अर्पित प्रत्येक अंश केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर समाज के व्यापक कल्याण में भी योगदान दे रहा है।
मंदिरों की वास्तविक भव्यता केवल स्वर्ण शिखरों, विशाल भवनों या करोड़ों रुपये के चढ़ावे से नहीं आँकी जाती। उनका सच्चा वैभव उस सेवा, करुणा और लोकमंगल में निहित है, जो वहाँ से समाज तक पहुँचती है। यदि मंदिरों का चढ़ावा आस्था के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और सामाजिक उत्थान का भी प्रभावी माध्यम बन सके, तो भारत की प्राचीन “सेवा ही धर्म है” की परंपरा नए युग में और अधिक गौरव के साथ प्रतिष्ठित होगी। यही श्रद्धा का सर्वोत्तम सम्मान और धर्म की सबसे सार्थक अभिव्यक्ति होगी।








