शब्दों का मेला, मनोरंजन के झुनझुने से चेतना की अलख तक

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विवेक रंजन श्रीवास्तव

साहित्य क्या है? क्या यह भरे पेट अघाए हुए आदमी के मन बहलाव का सजीला खिलौना मात्र है, जिसे दिनभर की थकान के बाद तकिए के सिरहाने रखकर सो जाया जाए, या फिर यह आत्मा के भीतर सुलगती वह चिंगारी है जो आदमी को चैन से सोने नहीं देती?

यह सवाल उतना ही पुराना है जितनी हमारी अपनी चेतना। सच तो यह है कि साहित्य मनोरंजन की उंगली पकड़कर यात्रा शुरू भले ही करे, लेकिन उसकी अंतिम परिणति हमेशा गहरे आत्म-मंथन में होती है।

यदि हम वक्त के रथ पर सवार होकर इतिहास के बीहड़ में झांकें, तो राजा-महाराजाओं के दौर में साहित्य का एक अजीब रंग-रूप दिखाई देता है। वह युग था जब कविता राजसी वैभव के गलियारों में सजी-धजी दासी की तरह खड़ी थी। चारण और भाट कवि दरबार की मखमली गद्दियों पर बैठकर राजा के घोड़े की टापों में भी ब्रह्मांड की गूंज सुन लेते थे। तलवारों की खनक और सुरा के प्यालों के बीच जो साहित्य रचा गया, वह दरबारी मनोरंजन का चरम था। वहां राजा को खुश रखना ही सबसे बड़ा धर्म था। लेकिन उसी वैभव के साए से दूर, झोपड़ियों और धूल-धूसरित रास्तों पर कबीर, तुलसी और सूरदास जैसे अलमस्त फकीर भी घूम रहे थे। कबीर जब बाजार में खड़े होकर समाज के पाखंड पर लाठी भांजते थे, तो वह मनोरंजन नहीं, सामंती ढोंग तथा विसंगतियों के खिलाफ एक खुली बगावत थी। राजाओं का वह दरबारी मनोरंजन तो इतिहास के पन्नों में दफन हो गया, लेकिन इन संतों की गंभीर चेतना आज भी संदर्भ है।

विधाओं के संसार में प्रवेश करें तो अक्सर लोग कविता और शायरी को केवल महफिलों की ज़ीनत मान बैठते हैं। ग़ालिब की मखमली शायरी या मीर का दर्द सुनकर लोग ‘वाह-वाह’ तो कह देते हैं, पर क्या वह सिर्फ मनोरंजन है? नहीं, वह तो जीवन के उस दर्शन का अक्स है जो इंसान को अपनी ही तकदीर से आंखें मिलाने का हौसला देता है। जब आधुनिक दौर में दुष्यंत कुमार की गज़ल पुकारती है कि ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं’, तो कविता महफिलों के इत्र से सराबोर लिबास को उतारकर सीधे संघर्ष की तपती सड़कों पर उतर आती है। तब वह दिल बहलाने का साधन नहीं, बल्कि व्यवस्था की नींद उड़ाने वाला शंखनाद बन जाती है।

यही मिजाज व्यंग्य और कहानियों का भी है। व्यंग्य कोई ऐसी तितली नहीं है जो केवल गुदगुदाकर उड़ जाए। हरिशंकर परसाई या शरद जोशी जब अपनी कलम उठाते हैं, तो पाठक हंसता जरूर है, लेकिन वह हंसी होठों पर आकर जम जाती है। वह एक ऐसी कड़वी दवा है जो शहद में लपेटकर दी जाती है। जब परसाई समाज के खोखलेपन पर चोट करते हैं, तो पाठक तिलमिला उठता है। इसी तरह मुंशी प्रेमचंद की ‘पूस की रात’ या ‘कफ़न’ को पढ़कर भला किसे महज मनोरंजन का आनंद मिलेगा? घीसू और माधव के कफ़न के पैसों से पूड़ियां खाने के दृश्य को पढ़कर आम पाठक के भीतर का इंसान भी रो पड़ता है। यह रोना ही साहित्य की जीत है, जहां कहानी मनोरंजन की देहली लांघकर मानवीय चेतना का विमर्श बन जाती है।

आज के समय की बयार कुछ बदली हुई है। साहित्यिक गोष्ठियों और सम्मेलनों के मंच कहीं-कहीं आत्ममुग्धता के लाउडस्पीकर बनते दिखाई देते हैं, जहां गंभीर संवाद की जगह केवल पीठ थपथपाने और वाहवाही बटोरने का दौर चल पड़ता है। प्रकाशन जगत भी अब कई बार ‘साहित्य’ से अधिक ‘बिकने वाले माल’ की तलाश में दिखाई देता है। बाजार की इस चकाचौंध में गंभीर और वैचारिक लेखन को अक्सर ‘बोझिल’ कहकर किनारे कर दिया जाता है, जबकि सतही और सनसनीखेज लेखन को सिर-आंखों पर बिठाया जाता है। साहित्य को मनोरंजन का ऐसा सस्ता कैप्सूल बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे निगलते ही इंसान अपने आसपास की कड़वी हकीकत से बेखबर हो जाए।

आखिरकार, साहित्य की यात्रा मनोरंजन से शुरू जरूर होती है, क्योंकि जो रचना रोचक नहीं होगी, पाठक उसे छुएगा भी नहीं। लेकिन अगर वह केवल मनोरंजन पर ही ठहर गई, तो वह पानी के बुलबुले जैसी होगी—सुंदर, पर क्षणभंगुर। कालजयी साहित्य वही है जो पाठक के मन को पहले अपनी रसमयता से रिझाए, फिर उसे धीरे से पकड़कर जीवन के गूढ़ सत्यों के सामने खड़ा कर दे।

मनोरंजन यदि साहित्य का जिस्म है, तो गंभीर चेतना उसकी आत्मा है। जिस्म के बिना आत्मा अदृश्य है और आत्मा के बिना जिस्म महज शव। एक श्रेष्ठ रचनाकार इन दोनों के संतुलन से ही समाज को एक नया सवेरा देता है।

यह भी उतना ही सत्य है कि साहित्यिक गोष्ठियां, कवि सम्मेलन और मुशायरे केवल मनोरंजन के आयोजन नहीं हैं। वे आम जन और साहित्य के बीच जीवंत संवाद के सेतु हैं। इन्हीं मंचों से अनेक नई प्रतिभाओं को पहचान मिलती है, विचारों का आदान-प्रदान होता है और साहित्य पुस्तकालयों की अलमारियों से निकलकर समाज के बीच सांस लेता है। यदि इन आयोजनों में आत्ममुग्धता और औपचारिकता के स्थान पर सार्थक विमर्श और रचनात्मक संवाद को प्राथमिकता मिले, तो वे समाज की वैचारिक चेतना को और अधिक समृद्ध कर सकते हैं। इसलिए इन आयोजनों को भरे पेट वाले लोगों का विलास कहना उचित नहीं होगा; बल्कि इन्हें साहित्य की सामाजिक यात्रा का आवश्यक पड़ाव माना जाना चाहिए। जिस प्रकार अखबारों में समाचारों के बीच साहित्य का एक पृष्ठ पाठक को संवेदनशील बनाता है, उसी प्रकार ये आयोजन भी समाज में संवेदना, संवाद और सृजनशीलता की लौ जलाए रखने का महत्वपूर्ण दायित्व निभाते हैं।

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Author: Bharat Sarathi

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