— डॉ. शैलेश शुक्ला

भारत सहित विश्व के अधिकांश देशों में लोकतंत्र को सबसे जनोन्मुख, उत्तरदायी और न्यायसंगत शासन व्यवस्था माना जाता है। इसकी मूल अवधारणा अत्यंत स्पष्ट है—सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता है। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है, सरकार बनाती है और अंततः वही शासन की सर्वोच्च स्वामिनी होती है। आधुनिक लोकतंत्र का पूरा ढाँचा इसी सिद्धांत पर आधारित है कि शासन जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए होता है।
भारतीय संविधान भी इसी भावना को आत्मसात करता है। संविधान की प्रस्तावना “हम भारत के लोग” शब्दों से आरंभ होती है, जो स्पष्ट घोषणा करती है कि राष्ट्र की संप्रभुता और राज्यसत्ता का अंतिम स्रोत जनता ही है। सैद्धांतिक रूप से जनप्रतिनिधि जनता के सेवक हैं और प्रशासनिक संस्थाएँ नागरिकों के कल्याण के लिए अस्तित्व में हैं। लेकिन जब हम लोकतंत्र के व्यवहारिक पक्ष का मूल्यांकन करते हैं तो आदर्श और वास्तविकता के बीच एक गहरी खाई दिखाई देती है।
जनता सर्वोच्च, फिर भी व्यवस्था के सामने याचक क्यों?
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि संविधान में सर्वोच्च स्थान प्राप्त होने के बावजूद व्यवहार में आम नागरिक स्वयं को अक्सर असहाय और उपेक्षित महसूस करता है। जिस नागरिक को व्यवस्था का केंद्र होना चाहिए, वह अनेक बार उसके हाशिये पर खड़ा दिखाई देता है।
सरकारी कार्यालयों में अपने वैधानिक अधिकारों और सुविधाओं के लिए लोगों को बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। प्रमाण पत्र, भूमि अभिलेख, पेंशन, राशन, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सेवाएँ अथवा अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए लंबी और जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। कई बार नागरिकों को यह अनुभव होता है कि वे अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर रहे, बल्कि किसी कृपा के पात्र बनने का प्रयास कर रहे हैं। यह स्थिति लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।
चुनाव तक जनता मालिक, चुनाव बाद दूरी क्यों?
लोकतंत्र की आत्मा जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही में निहित है। लेकिन व्यवहार में अक्सर तस्वीर अलग दिखाई देती है। चुनाव आते ही जनता का महत्व बढ़ जाता है। नेता घर-घर पहुँचते हैं, हाथ जोड़ते हैं, वादों की झड़ी लगाते हैं और स्वयं को जनता का सेवक बताते हैं। किंतु चुनाव संपन्न होते ही जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच दूरी बढ़ने लगती है।
अनेक नागरिकों का अनुभव है कि जो प्रतिनिधि चुनाव से पहले सहज उपलब्ध रहते हैं, वे चुनाव जीतने के बाद सामान्य नागरिकों की पहुँच से दूर हो जाते हैं। इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर होता है और यह धारणा जन्म लेती है कि सत्ता जनता की नहीं, बल्कि सत्ता प्राप्त समूहों की संपत्ति बनकर रह गई है।
जनसेवा या विशेषाधिकार का माध्यम?
लोकतंत्र में राजनीति का उद्देश्य जनसेवा माना जाता है। निस्संदेह अनेक जनप्रतिनिधि और अधिकारी पूरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण के साथ कार्य करते हैं, किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, संसाधनों के दुरुपयोग और सत्ता के केंद्रीकरण जैसी समस्याएँ लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती हैं।
जब सार्वजनिक पदों का उपयोग जनहित के बजाय निजी लाभ और प्रभाव विस्तार के लिए होने लगे, तब लोकतंत्र का नैतिक आधार डगमगाने लगता है। जनता के करों से संचालित संसाधनों का लाभ यदि कुछ प्रभावशाली समूहों तक सीमित हो जाए और आम नागरिक उससे वंचित रह जाए, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य ही प्रभावित हो जाता है।
लोकतंत्र बनाम औपनिवेशिक मानसिकता
लोकतंत्र और राजतंत्र के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि लोकतंत्र में शासक और शासित का संबंध मालिक और प्रजा का नहीं, बल्कि सेवक और स्वामी का होता है। फिर भी हमारे प्रशासनिक ढाँचे में आज भी कहीं-न-कहीं औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेष दिखाई देते हैं।
कई संस्थाएँ नागरिकों को अधिकार-संपन्न भागीदार के रूप में देखने के बजाय आदेश और नियंत्रण की दृष्टि से देखती हैं। परिणामस्वरूप नागरिकों को अपनी वैध माँगों और अधिकारों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। यह स्थिति लोकतंत्र की आत्मा के अनुकूल नहीं कही जा सकती।
लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, निरंतर जवाबदेही है
लोकतंत्र का अर्थ केवल समय-समय पर चुनाव कराना नहीं है। चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण माध्यम अवश्य हैं, किंतु लोकतंत्र की सफलता इस बात से तय होती है कि शासन व्यवस्था कितनी पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित है।
यदि नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करना पड़े, सरकारी सेवाएँ समय पर न मिलें, निर्णय प्रक्रिया में जनता की भागीदारी सीमित हो और सत्ता का उपयोग विशेष हितों के लिए होने लगे, तो लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप कमजोर पड़ने लगता है।
नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण
लोकतंत्र की कमियों के लिए केवल राजनेताओं या प्रशासन को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। लोकतंत्र एक साझी व्यवस्था है जिसमें नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जागरूक मतदाता, सक्रिय नागरिक समाज, स्वतंत्र मीडिया, उत्तरदायी संस्थाएँ और मजबूत संवैधानिक व्यवस्थाएँ ही लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखती हैं।
जब नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों के प्रति सजग रहते हैं, तब शासन अधिक जवाबदेह बनता है। इसलिए लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ नागरिक चेतना का विस्तार भी आवश्यक है।
लोकतंत्र को उसके मूल स्वरूप में लौटाने की आवश्यकता
आज आवश्यकता इस बात की है कि लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित न समझा जाए। शासन व्यवस्था का प्रत्येक अंग इस भावना के साथ कार्य करे कि वह जनता का सेवक है और जनता ही उसकी वास्तविक स्वामी है।
सरकारी कार्यालयों को अधिक नागरिक-अनुकूल बनाना होगा। प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध करना होगा। जनप्रतिनिधियों को चुनावी वादों और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के प्रति अधिक गंभीर होना होगा। सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही नागरिकों को भी संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक अधिकारों और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता के प्रति अधिक सजग बनना होगा।
निष्कर्ष
भारतीय लोकतंत्र ने अनेक ऐतिहासिक उपलब्धियाँ अर्जित की हैं और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र के आदर्श और उसके व्यवहारिक स्वरूप के बीच अभी भी एक उल्लेखनीय दूरी बनी हुई है।
संविधान ने जनता को सर्वोच्च स्थान दिया है, लेकिन उस संवैधानिक भावना को राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवहार में पूरी तरह उतारना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब नागरिक स्वयं को व्यवस्था का याचक नहीं, बल्कि सम्मानित अधिकार-संपन्न स्वामी अनुभव करे; जब जनप्रतिनिधि सत्ता के अधिकारी नहीं, बल्कि जनता के उत्तरदायी सेवक के रूप में कार्य करें; और जब शासन का प्रत्येक निर्णय नागरिक हित को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करे।
लोकतंत्र की आत्मा भी यही है और उसका अंतिम लक्ष्य भी यही होना चाहिए।







