रामलला के खजाने पर किसकी नजर? दान और जवाबदेही का बड़ा सवाल

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एसआईटी की जांच में दान, आभूषण और बैंकिंग व्यवस्था की पड़ताल; आस्था के केंद्र में पारदर्शिता और जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस तेज।

ओ.पी. पाल

अयोध्या के भव्य और ऐतिहासिक श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और समर्पण के प्रतीक स्वरूप चढ़ाए गए दान और बहुमूल्य आभूषणों को लेकर हाल ही में एक बड़ा विवाद सुर्खियों में है। मंदिर प्रबंधन, दान और बैंकिंग प्रणाली में कथित अनियमितताओं एवं वित्तीय हेरफेर के आरोपों ने न केवल प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है बल्कि करोड़ों सनातनी श्रद्धालुओं की भावनाओं को भी झकझोर कर रख दिया है। इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल ने अब तक की सबसे बड़ी और निर्णायक कार्रवाई शुरू कर दी है। इस पूरे प्रकरण, एसआईटी की जांच पद्धति, प्रशासनिक व कानूनी पेचीदगियों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं नजर ड़ाली जाए तो देशभर की मीडिया ने प्रमुखता से उछलते इस मुद्दे पर मंदिर की बैंकिंग व्यवस्था और दान प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठाए। वहीं जहां तक एसआईटी जांच का सवाल है, उसमें एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी है। अब अपनी विस्तृत जांच में एसआईटी देश और दुनिया के उन सभी श्रद्धालुओं, उद्योगपतियों, राजनेताओं या धार्मिक संस्थाओं, जिन्होंने रामलला के चरणों में सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात या अन्य बहुमूल्य आभूषण अर्पित किए थे, उनसे सीधे उनसे संपर्क कर रही है लेकिन यह भी एक टेढ़ी खीर है क्योंकि अधिकांश दान गुप्त रुप से दिया जाता है, जिसका हिसाब बनाना श्रद्धालुओं के विवेक पर निर्भर करेगा?

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर केवल एक कंक्रीट या पत्थरों का ढांचा नहीं है बल्कि यह सदियों के संघर्ष, तपस्या और दुनिया भर के करोड़ों सनातनी हिंदुओं की अगाध श्रद्धा का साक्षात केंद्र है। ऐसे पावन स्थान पर चढ़ने वाले दान और आभूषणों में एक रत्ती भर की भी हेरफेर या चोरी केवल एक वित्तीय अपराध नहीं है बल्कि यह जन-आस्था पर एक बहुत बड़ा आघात है। एसआईटी द्वारा शुरू की गई ‘रिवर्स ट्रैकिंग’ और मुख्यमंत्री को सौंपी गई प्रारंभिक रिपोर्ट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले में किसी भी स्तर पर ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है चाहे वे ट्रस्ट के प्रभावशाली पदाधिकारी हों या बैंक के बड़े अधिकारी हों। यदि उन्होंने रामलला के खजाने पर कुदृष्टि डाली है तो उनका जेल जाना तय है। आने वाले दिन इस ऐतिहासिक जांच के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं क्योंकि जैसे ही पहली आधिकारिक एफआईआर दर्ज होगी और दानदाताओं के सबूतों का मिलान शुरू होगा, ‘रामलला के लुटेरों’ के चेहरे पूरी तरह से बेनकाब हो जाएंगे। मंदिर के गर्भगृह और परिसर में रखे गए दानपात्रों से निकलने वाली नकदी, सोने-चांदी के आभूषणों और अन्य कीमती रत्नों की गिनती तथा उन्हें बैंक में सुरक्षित जमा करने की पूरी प्रक्रिया पर उंगलियां उठना स्वाभाविक है।

जांच एजेंसी के लिए सच तक पहुंचना बड़ी चुनौती

इस प्रकरण में जांच में जुटी एसआईटी के सामने सत्यापन का अभाव और कई सवाल भी सामने हैं, मसलन दानपात्रों से निकाली गई भारी-भरकम नकदी और सोने-चांदी का वास्तविक और सटीक हिसाब किस स्तर पर रखा जा रहा था? क्या इसके सत्यापन के लिए कोई पारदर्शी और त्रिस्तरीय प्रणाली मौजूद थी? बैंकिंग प्रक्रिया के दौरान जब आभूषण और नकदी बैंक कर्मियों या ट्रस्ट के प्रतिनिधियों को सौंपी जा रही थी, तब अंतिम जवाबदेही किसकी तय की गई थी? वहीं क्या दानपात्र खोलने से लेकर बैंक लॉकर में जमा करने तक की पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी और स्वतंत्र निरीक्षकों की कड़ी निगरानी में थी? ऐसे सवालों से स्पष्ट है कि बैंक कर्मियों और मंदिर प्रशासन के कुछ स्तरों पर या तो भारी लापरवाही बरती गई या फिर आपसी मिलीभगत से एक बड़े गबन को अंजाम दिया गया।

उधर जांच दल के सूत्रों का भी मानना है कि केवल श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, संबंधित बैंकों और मंदिर प्रशासन के बही-खातों के भरोसे रहकर इस घोटाले की वास्तविक गहराई और गबन के सही आंकड़े का पता लगाना असंभव है। यदि रिकॉर्ड में ही हेरफेर कर दिया गया हो तो कागजी जांच कभी भी सच को सामने नहीं ला पाएगी। इसी कारण से एसआईटी रिवर्स ट्रैकिंग के फार्मूले में अब सीधे उन अंतिम कड़ियों यानी दानदाता तक पहुंच रही है, जिन्होंने इस पूरी व्यवस्था को अपनी आस्था सौंपी थी। जांच एजेंसी ने दानदाताओं से अनुरोध किया जा रहा है कि वे अपने दान से जुड़े सभी संभावित साक्ष्य जैसे आधिकारिक रसीदें, दान करते समय खींची गई तस्वीरें, वीडियो फुटेज, या उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स और बैंक से कीमती सामान निकालने के प्रमाण जांच टीम को सौंपें ताकि दानदाताओं से प्राप्त इन पुख्ता सबूतों का मिलान मंदिर ट्रस्ट के स्टॉक रजिस्टर और संबंधित बैंकों के डिपॉजिट इनवेंटरी से किया जाएगा।

गेम चेंजर बन सकता है पूरा प्रकरण

माना जा रहा है क्योंकि एसआईटी की जांच के बाद ‘रामलला के लुटेरों’ के लिए कानून के शिकंजे से बच पाना नामुमकिन हो जाएगा। छह दिनों की मथानी जैसी गहन और चौबीसों घंटे चली शुरुआती जांच के बाद, एसआईटी की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सौंपी गई प्रारंभिक जांच रिपोर्ट की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें संकलित किए गए डिजिटल साक्ष्य, दस्तावेजी सबूत, सीसीटीवी फुटेज और संदिग्धों के बयानों का ब्यौरा कुल 12 पेन ड्राइव में है। इस जांच के पहले सप्ताह में ही लगभग 150 ऐसे लोगों को चिह्नित किया गया है जिनकी भूमिका किसी न किसी रूप में इस चढ़ावा और आभूषण प्रबंधन प्रक्रिया में संदिग्ध पाई गई है। इनमें से कम से कम 25 लोग ऐसे हैं जिनके खिलाफ संज्ञेय अपराध वित्तीय हेरफेर के सीधे और पुख्ता सबूत मिले हैं।

संगठनात्मक और प्रशासनिक खामियां

एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट में पर गौर करें तो मंदिर ट्रस्ट के आंतरिक प्रबंधन की कुछ बेहद गंभीर और चौंकाने वाली खामियां भी उजागर हुई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गोपाल राव नामक व्यक्ति जो कि तकनीकी या कानूनी रूप से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के आधिकारिक सदस्य नहीं थे, वे मंदिर के भीतर कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील जिम्मेदारियां संभाल रहे थे। वहीं दूसरी ओर, ट्रस्ट के प्रमुख ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र पर यह आरोप लगा है कि वे अपनी तयशुदा प्रशासनिक और निगरानी संबंधी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी मुस्तैदी से करने में विफल रहे जिसे बड़ी चूक और चोरी को रास्ता मिला। इन प्राथमिक तथ्यों और संज्ञेय अपराधों के सामने आने के बाद अब एसआईटी, पुलिस में एक विस्तृत और गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज कराने की वैधानिक प्रक्रिया शुरू कर चुकी है।

कानूनी विशेषज्ञों में वैचारिक मतभेद

इस हाई-प्रोफाइल मामले में बिना एफआई दर्ज किए छह दिनों तक की गई प्रारंभिक जांच को लेकर देश के प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों के बीच एक दिलचस्प कानूनी बहस छिड़ गई है। इसमें पूर्व पुलिस महानिदेशक सूर्यकुमार शुक्ला का कानूनी तर्क और दृष्टिकोण है कि इतनी बड़ी मात्रा में नकदी और जेवरात की गणना में कहीं न कहीं भारी चूक हुई है और इसमें बैंककर्मियों की लापरवाही या सीधी मिलीभगत साफ दिखती है। ट्रस्ट और बैंक दोनों स्तरों पर निगरानी तंत्र की बेहद कमजोरी का फायदा अपराधियों ने उठाया। वहीं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति डी.पी. सिंह ने कहा कि गबन और वित्तीय धोखाधड़ी जैसे जटिल मामलों में सीधे एफआईआर दर्ज करने से पहले तथ्यों को खोजने के लिए प्रारंभिक जांच करना पूरी तरह वैध है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ मामले के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि प्रारंभिक जांच में संज्ञेय अपराध की पुष्टि होने पर तुरंत एफआई दर्ज कर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए जबकि इसके विपरीत अयोध्या के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रियनाथ सिंह ने इस प्रक्रिया को अनुचित और कानून के सिद्धांतों के खिलाफ बताया। उनका तर्क है कि औपचारिक एफआईआर दर्ज किए बिना किसी भी मामले की इस स्तर पर जांच नहीं की जानी चाहिए।

आग में घी ड़ालता राजनीतिक घमासान

अयोध्या और राम मंदिर का मुद्दा हमेशा से ही भारत की राजनीति के केंद्र में रहा है। ऐसे में रामलला के चढ़ावे में घोटाले की खबर आते ही विपक्षी दलों ने सरकार और मंदिर प्रशासन को आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया है। खासतौर से राज्य के प्रमुख सियासी दल समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस पूरे मामले और सरकार द्वारा कराई जा रही एसआईटी जांच बेहद तीखा और व्यंग्यात्मक तंज कसा है। अखिलेश ने कहा कि कहीं जांच की रिपोर्ट ही चोरी न हो जाए, फिर कहेंगे 15 दिन और इंतजार कर लो, रिपोर्ट सौंपने में दिन बढ़ेंगे क्योंकि सबूत ठिकाने लगाने हैं। उनका यह साफ करता है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक जांच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा चुनावी और राजनीतिक हथियार भी बनेगा। विपक्ष का यहां तक आरोप है कि जांच के नाम पर केवल समय खींचा जा रहा है ताकि मुख्य दोषियों को बचाया जा सके और सबूतों को मिटाया जा सके।

न्यायपालिका का रुख

इस बीच, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में दायर याचिका को लेकर टिप्पणियां करते हुए इस मामले में किसी भी प्रकार की तत्काल आपात स्थिति से साफ इनकार कर दिया। पीठ कहा कि राज्य सरकार पहले ही इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान ले चुकी है और एसआईटी के माध्यम से आवश्यक और कड़ी कानूनी पहल कर रही है। जब कार्यपालिका सक्रिय रूप से जांच कर रही है तो अदालत द्वारा तत्काल हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। यह जनहित याचिका मोहित अशोक नामक एक याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में दायर थी, जिसमें उन्होंने राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए गए चढ़ावे और वित्तीय अनियमितताओं की एक पूर्णतः स्वतंत्र एजेंसी से उच्च स्तरीय जांच कराने तथा मंदिर के गठन के बाद से अब तक के पूरे वित्तीय लेन-देन और आभूषणों का भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से एक विस्तृत और निष्पक्ष ऑडिट कराने की मांग की थी।

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Author: Bharat Sarathi

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