(व्यंग्य) : ज्ञान प्रदूषण

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

डॉ. विजय गर्ग …… सेवानिवृत्त प्रिंसिपल 

एक समय था जब ज्ञान प्राप्त करना तपस्या माना जाता था। लोग गुरुकुलों में वर्षों बिताते थे, पुस्तकालयों की धूल फाँकते थे और विद्वानों के सान्निध्य में बैठकर जीवन का सार समझने का प्रयास करते थे। आज का युग अत्यंत प्रगतिशील है। अब ज्ञान पाने के लिए न गुरु की आवश्यकता है, न पुस्तक की और न ही अध्ययन की। केवल एक स्मार्टफोन और इंटरनेट का पैक पर्याप्त है। ज्ञान स्वयं आपके पीछे-पीछे दौड़ता है, चाहे आप उसे बुलाएँ या नहीं।

आज वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और पर्यावरण प्रदूषण पर खूब चर्चा होती है, लेकिन सबसे खतरनाक प्रदूषण पर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो—“ज्ञान प्रदूषण”।

ज्ञान प्रदूषण वह स्थिति है जब जानकारी इतनी अधिक हो जाए कि वास्तविक ज्ञान कहीं भीड़ में खो जाए। आज हर व्यक्ति विशेषज्ञ है, हर व्यक्ति विश्लेषक है और हर व्यक्ति सलाहकार। जिसने जीवन में क्रिकेट की गेंद तक नहीं पकड़ी, वह राष्ट्रीय टीम की रणनीति तय कर रहा है। जिसने विज्ञान की किताब से सुरक्षित दूरी बनाए रखी, वह परमाणु ऊर्जा पर शोधार्थियों जैसी टिप्पणियाँ कर रहा है। और जिसने कभी एक पौधा तक नहीं लगाया, वह पर्यावरण संरक्षण पर ऑनलाइन संगोष्ठियों का संचालन कर रहा है।

सोशल मीडिया ने इस प्रदूषण को महामारी का रूप दे दिया है। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल पर ज्ञान की गंगा, यमुना और सरस्वती एक साथ बहने लगती हैं। कोई पाँच मिनट में करोड़पति बनने का मंत्र दे रहा है, कोई सात दिन में अंग्रेज़ी सिखाने का दावा कर रहा है, तो कोई यह सिद्ध कर रहा है कि चाय पीने से लेकर साँस लेने तक की हमारी हर आदत गलत है।

सबसे रोचक बात यह है कि अब ज्ञान का मूल्य उसकी सत्यता से नहीं, बल्कि उसके ‘फॉरवर्ड’ होने की गति से तय होता है। यदि कोई संदेश दस समूहों में पहुँच गया तो वह स्वतः सत्य का दर्जा प्राप्त कर लेता है। उसके बाद तथ्य बेचारे किसी कोने में बैठकर अपने अस्तित्व पर आँसू बहाते रहते हैं।

कहावत थी—“अधजल गगरी छलकत जाए।” अब तो पूरी सोशल मीडिया ही छलक रही है। आधी-अधूरी जानकारी वाले लोग ऐसे आत्मविश्वास से बोलते हैं मानो सृष्टि निर्माण समिति के स्थायी सदस्य रहे हों। यदि कोई उनसे प्रमाण माँग ले तो उत्तर मिलता है—“मैंने वीडियो में देखा है” या “व्हाट्सएप पर आया था।”

ज्ञान प्रदूषण का सबसे आधुनिक संस्करण है—“तत्काल विशेषज्ञता”। किसी विषय पर दो मिनट का वीडियो देखते ही व्यक्ति विशेषज्ञ बन जाता है। कल तक वह शेयर बाज़ार का ज्ञाता था, आज स्वास्थ्य सलाहकार है और कल अंतरिक्ष विज्ञान पर व्याख्यान देता दिखाई देगा। प्रतिभा का ऐसा विस्फोट मानव इतिहास में शायद ही कभी देखा गया हो।

शिक्षा जगत की स्थिति भी कम दिलचस्प नहीं है। विद्यार्थी पुस्तकें कम और सारांश अधिक पढ़ते हैं। उन्हें विषय की गहराई नहीं चाहिए, केवल परीक्षा में आने वाले संभावित प्रश्नों की सूची चाहिए। ज्ञान अब लक्ष्य नहीं रहा, बल्कि अंकों तक पहुँचने का एक साधन मात्र बन गया है।

इस प्रदूषण का एक गंभीर दुष्प्रभाव यह भी है कि लोग सुनना भूलते जा रहे हैं। हर किसी के पास बोलने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन सुनने के लिए समय नहीं। परिणामस्वरूप संवाद की जगह बहस ने और बहस की जगह शोर ने ले ली है।

विडंबना यह है कि सूचना के इस अथाह महासागर में विवेक की बूंदें लगातार दुर्लभ होती जा रही हैं। हम पहले से कहीं अधिक जानते हैं, लेकिन शायद पहले से कम समझते हैं। हमारे पास तथ्यों का विशाल भंडार है, पर उन्हें परखने का धैर्य नहीं।

मुझे लगता है कि अब “ज्ञान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड” की स्थापना का समय आ गया है। यह बोर्ड प्रमाणित करेगा कि कौन-सा ज्ञान असली है, कौन-सा नकली है और कौन-सा केवल मनोरंजन के उद्देश्य से फैलाया जा रहा है। साथ ही नागरिकों को “ज्ञान प्रदूषण मास्क” भी वितरित किए जाएँ, ताकि वे अधकचरी सूचनाओं और झूठे तथ्यों के विषैले कणों से सुरक्षित रह सकें।

अंततः, ज्ञान स्वयं कभी प्रदूषण नहीं बनता। प्रदूषण तब पैदा होता है जब जानकारी विवेक से अलग हो जाती है, जब अध्ययन की जगह अनुमान ले लेता है और जब सत्य की जगह सनसनी विराजमान हो जाती है।

आज आवश्यकता ज्ञान बढ़ाने की नहीं, बल्कि ज्ञान को समझने, परखने और सही संदर्भ में उपयोग करने की है। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब लोग पुस्तकालयों में ज्ञान खोजने नहीं, बल्कि उसे प्रदूषण-मुक्त कराने जाया करेंगे।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!