– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

पश्चिम एशिया में 17-18 जून 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14-सूत्रीय इस्लामाबाद एमओयू को क्षेत्रीय शांति की ऐतिहासिक पहल माना गया था। इसमें युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना, ईरानी तेल निर्यात पर राहत और 60 दिनों में व्यापक शांति समझौते का रोडमैप शामिल था। लेकिन महज 24 घंटे के भीतर हालात फिर बिगड़ते दिखाई देने लगे।
ईरान ने आरोप लगाया कि अमेरिका और इज़राइल ने लेबनान मोर्चे पर युद्धविराम की शर्तों का पालन नहीं किया। इसके जवाब में तेहरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को पुनः बंद करने की घोषणा कर दी। दूसरी ओर अमेरिका का दावा है कि समुद्री यातायात सामान्य है और दर्जनों व्यापारिक जहाज अब भी इस मार्ग से गुजर रहे हैं। यही विरोधाभास वैश्विक बाजारों और कूटनीति में अनिश्चितता पैदा कर रहा है।
क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज?
होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा है। दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यदि यहां व्यवधान बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है, जिससे वैश्विक महंगाई फिर भड़क सकती है।
सबसे अधिक प्रभाव भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों पर पड़ने की आशंका है। भारत के लिए इसका अर्थ होगा पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, उर्वरक और परिवहन लागत में वृद्धि तथा महंगाई पर अतिरिक्त दबाव।
वित्तीय बाजारों में बेचैनी

ऊर्जा संकट की आशंका से शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। तेल कंपनियों को लाभ मिल सकता है, जबकि विमानन, परिवहन और ऊर्जा-निर्भर उद्योगों पर दबाव बढ़ेगा। ऐसे माहौल में निवेशक आमतौर पर सोना और अन्य सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं।
क्या समझौता टूट चुका है?
फिलहाल नहीं। एमओयू औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अमेरिका और ईरान दोनों 23-25 जून को स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित वार्ता के लिए तैयार हैं। कतर और पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ देश भी सक्रिय हैं।
आगे क्या?
आगामी वार्ता में चार बड़े सवालों पर फैसला होगा—
- लेबनान में स्थायी युद्धविराम कैसे सुनिश्चित होगा?
- होर्मुज जलडमरूमध्य को स्थायी रूप से खुला रखा जा सकेगा या नहीं?
- ईरान पर प्रतिबंधों में राहत की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी या नहीं?
- 60-दिवसीय शांति रोडमैप बच पाएगा या नहीं?
निष्कर्ष
21 जून 2026 तक की स्थिति बताती है कि इस्लामाबाद एमओयू न तो पूरी तरह सफल हुआ है और न ही पूरी तरह विफल। यह अपने पहले और सबसे कठिन परीक्षण से गुजर रहा है। होर्मुज पर बढ़ता तनाव, लेबनान में जारी संघर्ष और अमेरिका-ईरान के परस्पर आरोप संकेत देते हैं कि पश्चिम एशिया की शांति अभी बेहद नाजुक अवस्था में है। आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह समझौता इतिहास में शांति की शुरुआत के रूप में दर्ज होगा या फिर कुछ दिनों की उम्मीद देकर वैश्विक संकट की नई कहानी लिख जाएगा।








