वेदप्रकाश विद्रोही ने प्रधानमंत्री को दी बधाई, साथ ही पूछा—‘12 साल सत्ता में रहना बड़ी बात है या 12 साल की उपलब्धियां?’
रेवाडी, 12 जून 2026। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगातार 12 वर्ष तक देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद पर बने रहने पर स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी नेता का लंबे समय तक सत्ता में बने रहना अपने आप में महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इतिहास किसी शासक का मूल्यांकन उसके कार्यकाल की अवधि से नहीं, बल्कि उसके शासनकाल में देश और समाज को मिले परिणामों से करता है।
‘इतिहास कार्यकाल नहीं, उपलब्धियों का मूल्यांकन करता है’
विद्रोही ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यदि प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्ष के शासनकाल का जश्न मना रहे हैं तो उन्हें साथ ही यह आत्मविश्लेषण भी करना चाहिए कि इन वर्षों में देश की सामाजिक, आर्थिक और लोकतांत्रिक स्थिति कितनी मजबूत हुई है। उनका आरोप है कि भाजपा-संघ के शासनकाल में सत्ता और संसाधनों का केंद्रीकरण बढ़ा है तथा आम नागरिक की आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हुई है।
उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार की सफलता का पैमाना उसके प्रचार अभियान या सत्ता में बने रहने की अवधि नहीं, बल्कि आमजन के जीवन स्तर में आया सकारात्मक परिवर्तन होना चाहिए।
‘देश की संपत्ति कुछ हाथों में सिमटती जा रही है’
वेदप्रकाश विद्रोही ने आर्थिक असमानता का मुद्दा उठाते हुए कहा कि देश की बड़ी संपत्ति सीमित संख्या में उद्योगपतियों और धनाढ्य वर्ग के हाथों में केंद्रित होती जा रही है। उन्होंने प्रश्न किया कि क्या यह सच नहीं है कि देश की बड़ी आर्थिक संपदा पर बेहद कम प्रतिशत आबादी का नियंत्रण है, जबकि दूसरी ओर करोड़ों लोग आज भी सरकारी सहायता पर निर्भर हैं।
उन्होंने कहा कि यदि देश में गरीबी और आर्थिक संकट कम हुए हैं तो फिर बड़ी संख्या में लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? उनके अनुसार यह स्थिति आर्थिक विकास के दावों और जमीनी वास्तविकताओं के बीच अंतर को दर्शाती है।
‘बेरोजगारी, महंगाई और कर्ज बढ़ा’
विद्रोही ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में बेरोजगारी और महंगाई आम नागरिकों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है। उन्होंने कहा कि युवाओं के सामने रोजगार का संकट है, जबकि किसानों, मजदूरों और मध्यम वर्ग पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ा है।
उन्होंने यह भी कहा कि देश पर सार्वजनिक कर्ज का बोझ लगातार बढ़ा है और रुपये की स्थिति भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर हुई है। उनके अनुसार आर्थिक प्रबंधन की सफलता का मूल्यांकन केवल बड़े आंकड़ों से नहीं, बल्कि आम नागरिक की क्रय शक्ति, रोजगार और जीवन स्तर से किया जाना चाहिए।
वैश्विक सूचकांकों का हवाला देकर उठाए सवाल
वेदप्रकाश विद्रोही ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की स्थिति भूख, प्रेस स्वतंत्रता, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, कानून के शासन और लैंगिक समानता जैसे क्षेत्रों में अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार अपने 12 वर्ष के कार्यकाल को ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है तो उसे इन क्षेत्रों में देश की स्थिति पर भी जवाब देना चाहिए।
‘लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं पर गंभीर प्रश्न’
विद्रोही ने आरोप लगाया कि पिछले वर्षों में लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वायत्तता को लेकर लगातार प्रश्न उठे हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि संस्थाओं की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और जवाबदेही से सुनिश्चित होती है।
उनका कहना था कि यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा कमजोर होता है तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।
‘जश्न से पहले आत्ममंथन जरूरी’
वेदप्रकाश विद्रोही ने कहा कि भाजपा और उसके सहयोगी संगठन प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्ष पूरे होने पर भले ही उत्सव मना रहे हों, लेकिन उन्हें यह भी बताना चाहिए कि इन वर्षों में आम नागरिक के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि सत्ता की अवधि से अधिक महत्वपूर्ण उसके परिणाम होते हैं और इतिहास भी उसी आधार पर निर्णय देता है।
मुख्य सवाल जो विद्रोही ने उठाए
- क्या 12 वर्ष तक सत्ता में बने रहना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है?
- क्या आर्थिक असमानता कम हुई है या बढ़ी है?
- क्या बेरोजगारी और महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण हुआ है?
- क्या आम नागरिक की आय और जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार आया है?
- क्या लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएं पहले से अधिक मजबूत हुई हैं?
- क्या देश के विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा है?
विद्रोही ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्ष के कार्यकाल का वास्तविक मूल्यांकन प्रचार और राजनीतिक उत्सवों से नहीं, बल्कि देश की आर्थिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक स्थिति के आधार पर होना चाहिए।









