डॉ० घनश्याम बादल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगातार लंबे कार्यकाल को लेकर हाल के दिनों में भारतीय जनता पार्टी द्वारा जिस प्रकार उत्सव मनाया गया, उसने एक बार फिर भारतीय राजनीति के दो सबसे प्रभावशाली प्रधानमंत्रियों पंडित जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी—की तुलना को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। यह तुलना केवल दो व्यक्तियों की नहीं बल्कि दो युगों, दो राजनीतिक दृष्टियों और दो विकास प्रतिमानों की तुलना है। एक ओर नेहरू हैं, जिन्होंने नवस्वतंत्र भारत की नींव रखी, तो दूसरी ओर नरेंद्र मोदी हैं, जो इक्कीसवीं सदी के भारत को नई दिशा देने का दावा करते हैं। ऐसे में प्रश्न यह नहीं है कि कौन बड़ा है, बल्कि यह है कि दोनों ने अपने-अपने समय में भारत को क्या दिया और कहाँ चूके।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। उस समय देश विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक हिंसा, शरणार्थी संकट, गरीबी, अशिक्षा और आर्थिक बदहाली से जूझ रहा था। भारत के सामने लोकतंत्र को स्थापित करने और राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने की चुनौती थी। नेहरू ने इस चुनौती को स्वीकार किया और संसदीय लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, योजना आयोग, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों तथा वैज्ञानिक संस्थानों जैसी व्यवस्थाओं की मजबूत नींव रखी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भाखड़ा-नांगल जैसे बड़े बांध और भारी उद्योगों की स्थापना उनके दीर्घकालिक दृष्टिकोण का परिणाम थे। उन्होंने लोकतंत्र को केवल संविधान की किताब तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे व्यवहार में भी स्थापित किया। यही कारण है कि अनेक राजनीतिक मतभेदों के बावजूद नेहरू को आधुनिक भारत के प्रमुख राष्ट्र-निर्माताओं में गिना जाता है।
हालांकि नेहरू की विरासत आलोचनाओं से मुक्त नहीं है। उनकी समाजवादी आर्थिक नीतियों ने सार्वजनिक क्षेत्र को तो मजबूत किया लेकिन निजी उद्यमों पर अत्यधिक नियंत्रण ने बाद के वर्षों में तथाकथित ‘लाइसेंस-परमिट राज’ को जन्म दिया। आर्थिक विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी रही और भारत लंबे समय तक गरीबी और संसाधनों की कमी से जूझता रहा। उनकी विदेश नीति, विशेषकर चीन के प्रति विश्वासपूर्ण दृष्टिकोण, 1962 के भारत-चीन युद्ध में गंभीर आघात के रूप में सामने आया। ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा युद्ध की वास्तविकता के सामने बिखर गया और इस पराजय ने नेहरू की छवि को गहरी चोट पहुंचाई। कश्मीर नीति को लेकर भी उनके निर्णय आज तक बहस का विषय बने हुए हैं।
दूसरी ओर नरेंद्र मोदी का उदय ऐसे समय में हुआ जब भारत लोकतांत्रिक रूप से परिपक्व हो चुका था और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ चुका था। 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले मोदी ने स्वयं को परिवर्तन और निर्णायक नेतृत्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। उनके कार्यकाल में आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अभूतपूर्व विस्तार देखने को मिला। राजमार्गों, रेलवे, हवाई अड्डों और डिजिटल नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ। डिजिटल भुगतान प्रणाली और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने शासन व्यवस्था को नई दिशा दी। जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत अभियान और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने करोड़ों लोगों तक सरकारी सेवाओं की पहुंच बढ़ाई। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू कर देश को एकीकृत कर व्यवस्था देने का प्रयास किया गया। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का निर्णय भी उनके कार्यकाल की सबसे चर्चित राजनीतिक घटनाओं में से एक है।
विदेश नीति के क्षेत्र में भी मोदी सरकार ने भारत की वैश्विक उपस्थिति को अधिक आक्रामक और सक्रिय बनाने का प्रयास किया। अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के साथ संबंधों को नई गति मिली। वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली दिखाई दी। भारत को विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करने और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए किए गए प्रयासों को भी व्यापक समर्थन मिला किन्तु मोदी सरकार भी आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। नोटबंदी के निर्णय को लेकर आज भी मतभेद हैं।
मोदी भक्त समर्थकों के अनुसार इससे औपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला, जबकि आलोचकों का मानना है कि इससे छोटे व्यापार और असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ। बेरोजगारी, कृषि संकट और बढ़ती आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहे हैं। विपक्ष और अनेक स्वतंत्र पर्यवेक्षकों ने यह आरोप भी लगाया है कि संस्थाओं की स्वायत्तता कमजोर हुई है और राजनीतिक सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ा है। सामाजिक ध्रुवीकरण तथा अल्पसंख्यकों की आशंकाओं को लेकर भी बहस जारी है। मणिपुर जैसी घटनाओं ने शासन और सामाजिक समरसता को लेकर कई प्रश्न खड़े किए हैं।
यदि दोनों प्रधानमंत्रियों की तुलना की जाए तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि नेहरू का सबसे बड़ा योगदान संस्थाओं का निर्माण और लोकतांत्रिक संस्कृति की स्थापना है जबकि मोदी का सबसे बड़ा योगदान शासन की कार्यक्षमता, बुनियादी ढांचे के विस्तार और डिजिटल परिवर्तन को माना जा सकता है। नेहरू ने जिस भारत की आधारशिला रखी, मोदी उसी भारत को नई आर्थिक और तकनीकी ऊंचाइयों तक पहुंचाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। एक ने राष्ट्र की नींव रखी, दूसरे ने उस भवन को नया आकार देने का प्रयास किया।आज राजनीतिक विवाद इस बात पर केंद्रित है कि सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री कौन रहे।
यदि कुल प्रधानमंत्रित्व काल की बात की जाए तो नेहरू का लगभग सोलह वर्ष नौ माह का कार्यकाल अब भी भारत के इतिहास में सबसे लंबा है। यदि केवल लोकसभा चुनावों के माध्यम से प्राप्त जनादेश के बाद के कार्यकाल को आधार बनाया जाए तो नरेंद्र मोदी एक नया रिकॉर्ड स्थापित करते दिखाई देते हैं किंतु इतिहास केवल कार्यकाल की लंबाई से नहीं लिखा जाता; इतिहास इस बात से लिखा जाता है कि किसी नेता ने अपने समय की चुनौतियों का सामना किस प्रकार किया और देश को किस दिशा में आगे बढ़ाया।
राजनीति को एक तरफ रखते हुए नेहरू और मोदी को एक-दूसरे के विरोधी ध्रुवों के रूप में देखने के बजाय भारतीय लोकतंत्र की विकास यात्रा के दो महत्वपूर्ण अध्यायों के रूप में देखा जाना चाहिए। नेहरू के बिना आधुनिक भारत की संस्थागत संरचना की कल्पना कठिन है और मोदी के बिना इक्कीसवीं सदी के भारत की राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा को समझना अधूरा होगा। दोनों की उपलब्धियों को स्वीकार करना और दोनों की विफलताओं से सीखना ही परिपक्व लोकतंत्र का परिचायक है।
इतिहास किसी एक नेता की जय-पराजय का मंच नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक यात्रा का दस्तावेज होता है। इसलिए नेहरू बनाम मोदी की बहस का सबसे सार्थक निष्कर्ष यही है कि भारत को आगे बढ़ाने में दोनों की भूमिकाएँ महत्वपूर्ण रही हैं, भले ही उनके रास्ते, प्राथमिकताएँ और विचारधाराएँ एक-दूसरे से भिन्न रही हों।








