वानप्रस्थ में लोकगीतों की भव्य महफ़िल, सुरों में गूंजी सांस्कृतिक विरासत

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हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के लोकगीतों ने बांधा समां

हिसार। वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब में आयोजित लोकगीतों की रंगारंग महफ़िल में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत सुरों के माध्यम से जीवंत हो उठी। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय लोक परंपराओं को संरक्षित करना, नई पीढ़ी तक पहुंचाना तथा वरिष्ठ नागरिकों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना रहा।

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए क्लब के महासचिव डॉ. जे.के. डाँग ने कहा कि लोकगीत हमारी सांस्कृतिक पहचान और विरासत के प्रतीक हैं, जिनमें मिट्टी की सोंधी खुशबू और लोकजीवन की संवेदनाएं समाहित हैं। कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन डॉ. दवीना अमर ठकराल ने किया। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों और विविधता का उत्सव है।

महफ़िल में डॉ. कमलेश कुकरेजा ने पंजाबी लोकगीत “इक मेरी अख काशनी”, डॉ. पुष्पा खरब ने “एक चिड़ी के दो बच्चे थे”, विजय लक्ष्मी ने राजस्थानी गीत “म्हारी हथेलिया के बीच छाला पड़ेगा” तथा डॉ. दवीना अमर ठकराल ने “बत्ती बाल के बनेरे उत्ते रखणी आँ” प्रस्तुत कर खूब वाहवाही लूटी। आदेश मलिक, डॉ. सुनीता सुनेजा, योगेश सुनेजा और डॉ. आर.डी. शर्मा की प्रस्तुतियों ने भी श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया।

हरियाणवी लोकगीतों और रागनियों ने विशेष आकर्षण बटोरा। डॉ. इंदु गहलावत, डॉ. अजीत कुंडू, डॉ. आर.एस. हुड्डा, डॉ. आर.पी.एस. खरब तथा डॉ. एम.एस. राणा ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को लोक संस्कृति के रंगों में सराबोर कर दिया। डॉ. अजीत कुंडू द्वारा प्रस्तुत नशामुक्ति संदेश वाली रागनी को विशेष सराहना मिली।

कार्यक्रम के समापन पर डॉ. दवीना अमर ठकराल ने कहा कि लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों के संवाहक हैं। वहीं क्लब के अध्यक्ष डॉ. एस.के. अग्रवाल ने सभी कलाकारों, सदस्यों एवं आयोजकों का धन्यवाद करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन सांस्कृतिक एकता और लोक परंपराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लोकगीतों की यह महफ़िल मनोरंजन के साथ-साथ भारतीय लोक-संस्कृति और पारंपरिक मूल्यों के संरक्षण का एक सार्थक प्रयास साबित हुई।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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