हिंदी मीडिया में महिलाओं की भागीदारी अब भी सीमित, नेतृत्व पदों पर पुरुषों का दबदबा कायम
मुख्यधारा की पत्रकारिता में महिलाओं की आवाज़ और दृष्टिकोण को बराबरी का स्थान देने की जरूरत
डॉ. शैलेश शुक्ला

जब 1826 में पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन शुरू किया, तब यह केवल एक समाचार पत्र की शुरुआत नहीं थी, बल्कि हिंदी समाज के लिए आधुनिक चेतना की खिड़की खुलने का क्षण था। लेकिन विडंबना यह रही कि इस खिड़की से समाज के आधे हिस्से—महिलाओं—को बराबरी से बाहर देखने और अपनी आवाज दर्ज कराने में दो सदियों से अधिक का समय लग गया।
आज जब हिंदी पत्रकारिता अपने 200 वर्षों का उत्सव मना रही है, तब यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या महिलाओं के लिए यह सचमुच उत्सव का क्षण है, या फिर आत्ममंथन का समय?
आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति के आंकड़े एक असहज सच्चाई सामने रखते हैं। हिंदी के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में महिला पत्रकारों की संख्या अब भी बेहद सीमित है। कई बड़े अखबारों में यह प्रतिशत 10 से 25 के बीच सिमटा हुआ है। यानी सौ पत्रकारों में मुश्किल से दस या बीस महिलाएं। यह स्थिति उस लोकतांत्रिक समाज के चौथे स्तंभ के लिए गंभीर सवाल खड़े करती है, जो बराबरी और प्रतिनिधित्व की बात करता है।
स्थिति और चिंताजनक तब हो जाती है जब हम मुख्य पृष्ठ और संपादकीय लेखों को देखते हैं। हिंदी समाचार पत्रों में मुख्य पृष्ठ के अधिकांश लेख पुरुषों द्वारा लिखे जाते हैं। यानी जो खबरें समाज की दिशा तय करती हैं, जो राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती हैं, उनमें महिलाओं की आवाज लगभग अनुपस्थित है। यह केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि दृष्टिकोण, प्रतिनिधित्व और न्याय का प्रश्न है।

नेतृत्व के स्तर पर तस्वीर और भी असंतुलित दिखाई देती है। हिंदी मीडिया संस्थानों में संपादक, मालिक और निर्णय लेने वाले अधिकांश पद अब भी पुरुषों के कब्जे में हैं। हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत के लगभग डेढ़ सौ वर्षों बाद मृणाल पांडे जैसी महिला मुख्य संपादक के रूप में सामने आईं, लेकिन उनके बाद भी महिला नेतृत्व अपवाद ही बना रहा।
समाचार संगठनों में नेतृत्व की कमी का सीधा असर खबरों की दिशा और प्रस्तुति पर पड़ता है। संपादकीय निर्णय, बीट का चयन, रिपोर्टिंग का दृष्टिकोण—सब कुछ प्रायः पुरुष दृष्टि से तय होता है। महिलाओं के अनुभव, संघर्ष और प्राथमिकताएं अक्सर उसी दृष्टिकोण से छनकर समाज तक पहुंचती हैं। यह न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि पत्रकारिता की गुणवत्ता के लिए भी हानिकारक है।
टेलीविजन मीडिया में महिला एंकरों की उपस्थिति पहली नजर में संतुलन का भ्रम पैदा करती है, लेकिन बहसों और विशेषज्ञ पैनलों की वास्तविकता अलग है। प्रमुख समाचार बहसों में महिलाओं की भागीदारी बेहद सीमित रहती है। रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति जैसे विषयों पर पुरुष विशेषज्ञों का वर्चस्व बना रहता है, जबकि महिलाओं को संस्कृति, समाज और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों तक सीमित कर दिया जाता है। यह 21वीं सदी में भी कायम लैंगिक रूढ़िवादिता का उदाहरण है।
समस्या केवल प्रतिनिधित्व की नहीं, बल्कि पूरी संरचनात्मक व्यवस्था की है। मीडिया संस्थानों में यौन उत्पीड़न की शिकायत समितियों की जानकारी तक कई कर्मचारियों को नहीं होती। मातृत्व अवकाश की सुविधाएं सीमित हैं, वेतन असमानता मौजूद है और पदोन्नति में लैंगिक पूर्वाग्रह स्पष्ट दिखाई देते हैं।
छोटे शहरों और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं के लिए यह संघर्ष और कठिन हो जाता है। परिवार की अनुमति, सामाजिक दबाव, सुरक्षा की चिंता और आर्थिक निर्भरता—ये सभी मिलकर उनके सामने अदृश्य बाधाएं खड़ी कर देते हैं। और यदि वे किसी तरह पत्रकारिता में प्रवेश कर भी लें, तो उन्हें राजनीति, अपराध, वित्त और खोजी पत्रकारिता जैसी तथाकथित ‘गंभीर’ बीट से दूर रखा जाता है।
हालांकि उम्मीद की किरणें भी मौजूद हैं। ‘खबर लहरिया’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र से शुरू हुई यह पहल आज राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुकी है। दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय की महिलाएं, जिन्हें समाज ने लंबे समय तक हाशिये पर रखा, आज मुख्यधारा की पत्रकारिता को चुनौती दे रही हैं। यह साबित करता है कि समस्या महिलाओं की क्षमता में नहीं, बल्कि अवसर और व्यवस्था में है।
हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति अंग्रेजी पत्रकारिता की तुलना में अधिक कमजोर दिखाई देती है। अंग्रेजी मीडिया में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत बेहतर है, जबकि हिंदी मीडिया अब भी गहरे पितृसत्तात्मक ढांचे से जूझ रहा है। हिंदी की महिला पत्रकारों को दोहरे संघर्ष का सामना करना पड़ता है—एक लैंगिक और दूसरा भाषाई।
स्थिति बदलने के लिए केवल संवेदनशीलता की बातें पर्याप्त नहीं हैं। ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले मीडिया संस्थानों में नेतृत्व के पदों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी। जब तक निर्णय लेने वाली मेजों पर महिलाएं बराबरी से नहीं बैठेंगी, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है।
इसके साथ ही यौन उत्पीड़न के खिलाफ सख्त और पारदर्शी तंत्र, मातृत्व सुविधाओं का विस्तार, लचीले कार्य घंटे और समान कार्य के लिए समान वेतन जैसी व्यवस्थाओं को गंभीरता से लागू करना होगा।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन मानसिकता का है। जब तक हम यह मानते रहेंगे कि कुछ बीट “महिलाओं के लिए उपयुक्त नहीं हैं”, तब तक कोई भी नीति प्रभावी नहीं होगी। हमें यह स्वीकार करना होगा कि विविधता केवल नैतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि बेहतर पत्रकारिता की शर्त है।
हेमंत कुमारी देवी से लेकर मृणाल पांडे और खबर लहरिया तक की यात्रा प्रेरणादायक जरूर है, लेकिन अभी अधूरी है। हिंदी पत्रकारिता का भविष्य तभी मजबूत होगा, जब महिलाओं की भागीदारी प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक होगी।
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का उत्सव तभी सार्थक होगा, जब समाज का आधा हिस्सा भी उसमें समान भागीदार बने। महिलाओं को पत्रकारिता में स्थान “दिया” नहीं जाना चाहिए—यह उनका अधिकार है।
अब समय केवल चर्चा का नहीं, बदलाव का है। हिंदी पत्रकारिता के अगले 200 वर्षों की कहानी ऐसी होनी चाहिए, जिसमें महिलाएं हाशिये पर नहीं, बल्कि केंद्र में हों। क्योंकि यह केवल महिलाओं की लड़ाई नहीं, बल्कि हिंदी पत्रकारिता की विश्वसनीयता, गुणवत्ता और लोकतांत्रिक भविष्य की लड़ाई है।









