गंगा दशहरा और विजय दशमी का वास्तविक अर्थ : आत्मजागरण और धर्म के दस लक्षण

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आचार्य डॉ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’

पानीपत। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा तथा शारदीय नवरात्रों के उपरांत आने वाली विजय दशमी केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मजागरण, स्वाध्याय और अंतर्मन की शुद्धि के महान पर्व हैं। किसी भी पर्व को केवल बाहरी रीति-रिवाजों तक सीमित न रखकर उसके वैदिक आशय और आध्यात्मिक संदेश को समझना आवश्यक है।

उपवास का वास्तविक अर्थ केवल भोजन का त्याग नहीं है। “उपवास” का तात्पर्य है—ईश्वर, देवी या अखण्ड ज्योति के समीप बैठकर आत्मचिंतन और ध्यान में लीन होना। दुर्भाग्यवश आज अधिकांश लोग व्रत को केवल खान-पान की व्यवस्था तक सीमित कर देते हैं और आत्ममंथन का दुर्लभ अवसर खो बैठते हैं। नवरात्रों में अखण्ड ज्योति के सम्मुख बैठकर यदि साधक ध्यान और स्वाध्याय करे तो उसके भीतर धर्म के दस दिव्य गुण विकसित होते हैं—त्याग, सत्य, दान, धैर्य, क्षमा, अस्तेय, शौच, अक्रोध, दम तथा इन्द्रियनिग्रह।

मनुस्मृति में धर्म के इन दस लक्षणों का उल्लेख इस प्रकार किया गया है—

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।

इन गुणों को धारण करने वाला व्यक्ति सहिष्णु, सरल, संतोषी और सुसंस्कृत बनता है। यही धर्म का प्रथम स्वरूप है, जिसे धृति, धैर्य और सहनशीलता कहा गया है। यदि नवरात्रि के व्रतों के पश्चात भी हमारे भीतर सहिष्णुता और संयम उत्पन्न नहीं हुआ, तो यह आत्मचिंतन का विषय है। भगवान श्रीराम के जीवन का मूल आधार भी यही धृति और मर्यादा थी।

बसंत नवरात्र के स्वाध्याय से जहां ‘राम’ अर्थात ज्ञान का उदय होता है, वहीं ज्येष्ठ शुक्ल दशमी का गंगा दशहरा और शारदीय नवरात्रों की विजय दशमी उन आध्यात्मिक साधनाओं के फलस्वरूप प्राप्त होने वाली विजय के प्रतीक हैं।

महाकवि कालिदास के रघुवंशम् के अनुसार रघुवंशी राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ का अश्व इन्द्र ने ईर्ष्यावश चुराकर महर्षि कपिल के आश्रम के समीप बांध दिया। जब राजा सगर के पुत्र वहां पहुंचे तो उन्होंने महर्षि कपिल पर ही चोरी का संदेह कर लिया। परिणामस्वरूप ऋषि के क्रोध से सगर के सहस्रों पुत्र भस्म होकर अधोगति को प्राप्त हुए। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि बिना कारण संत-महात्माओं और ब्राह्मणों का अपमान कितना घातक हो सकता है।

बाद में महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति हेतु कठोर तप किया, जिसे आज भी “भागीरथ प्रयास” कहा जाता है। ब्रह्माजी ने कहा कि स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने वाली गंगा के वेग को संभालना संभव नहीं होगा, तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन ही गंगा का पृथ्वी पर अवतरण और लोककल्याण के लिए प्रवाह प्रारंभ हुआ माना जाता है।

गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि पवित्रता, करुणा, तप, त्याग और मोक्ष की प्रतीक हैं। उनके दर्शन और स्नान का वास्तविक अर्थ है—मन, वचन और कर्म की शुद्धि।

महर्षियों ने कहा है—

मुखं प्रसन्नं विमला च दृष्टिः
कथानुरागो मधुरा च वाणी।
स्नेहोऽधिकः सम्भ्रमदर्शनं च
सदानुरक्तस्य जनस्य लक्ष्मः।।

अर्थात जिसका मन निर्मल होता है, उसकी वाणी मधुर, दृष्टि पवित्र और व्यवहार स्नेहपूर्ण होता है। यही धर्म का सच्चा स्वरूप है।

गंगा दशहरा और विजय दशमी हमें बाहरी आडंबरों से ऊपर उठकर आत्मशुद्धि, सहिष्णुता, सत्य, क्षमा और सदाचार का संदेश देते हैं। यदि हम इन पर्वों के वास्तविक अर्थ को जीवन में उतार लें, तभी इनका उत्सव सार्थक होगा।

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Author: Bharat Sarathi

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