डॉ. शैलेश शुक्ला

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक शक्ति केवल चुनावों, संसदों और संवैधानिक संस्थाओं से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहाँ सत्ता से प्रश्न पूछने की कितनी स्वतंत्रता मौजूद है। यदि पत्रकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों और नागरिकों को सरकार की नीतियों की आलोचना करने पर राष्ट्रविरोधी, देशद्रोही या व्यवस्था विरोधी घोषित किया जाने लगे, तो लोकतंत्र का मूल स्वरूप धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र में सरकार राष्ट्र नहीं होती, सरकार केवल एक अस्थायी राजनीतिक व्यवस्था होती है जिसे जनता सीमित अवधि के लिए चुनती है। राष्ट्र जनता, संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों से निर्मित होता है। इसलिए किसी सरकार की आलोचना करना राष्ट्र की आलोचना नहीं माना जा सकता। यह लोकतांत्रिक अधिकार ही नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र की आवश्यक शर्त है।
भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि प्रेस की स्वतंत्रता इसी संवैधानिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। लोकतंत्र में मीडिया का कार्य सरकारों का प्रचार करना नहीं, बल्कि जनहित में उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करना होता है। यदि पत्रकार केवल सरकार की प्रशंसा करें और कठिन प्रश्न पूछने से बचें, तो पत्रकारिता का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। स्वतंत्र पत्रकारिता का अर्थ ही यह है कि वह सत्ता के दावों की जाँच करे, सरकारी नीतियों के प्रभाव का विश्लेषण करे और जनता के उन प्रश्नों को सामने लाए जिन्हें अक्सर सत्ता अनदेखा करना चाहती है।
भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर बहसें सामने आई हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्था (Reporters Without Borders) ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ द्वारा जारी ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ में भारत की रैंकिंग को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। इस सूचकांक में पत्रकारों की सुरक्षा, मीडिया की स्वतंत्रता, राजनीतिक हस्तक्षेप, कानूनी दबाव और आर्थिक नियंत्रण जैसे अनेक मानकों को शामिल किया जाता है। यह संकेत देता है कि विश्व समुदाय भारत में प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति को गंभीरता से देख रहा है।
लोकतंत्र का मूल आधार विविध विचारों और स्वतंत्र विमर्श पर टिका होता है। यदि कोई पत्रकार सरकार की आर्थिक नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों, कानून व्यवस्था, बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार या मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर प्रश्न उठाता है, तो वह लोकतांत्रिक दायित्व निभा रहा होता है। उसे राष्ट्रविरोधी कहना लोकतांत्रिक मूल्यों की आत्मा को आहत करना है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन लोकतंत्र स्थायी व्यवस्था है। यदि सरकार को ही राष्ट्र मान लिया जाए, तो लोकतंत्र का स्थान व्यक्तिपूजा और राजनीतिक केंद्रीकरण ले लेगा।
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास भी इसी सत्य की पुष्टि करता है। बाल गंगाधर तिलक के ‘केसरी’, महात्मा गांधी के ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’, गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ तथा बाबूराव विष्णु पराड़कर की पत्रकारिता ने अंग्रेजी शासन की नीतियों की खुलकर आलोचना की थी। यदि उस समय ब्रिटिश सरकार की आलोचना को देशद्रोह मान लिया जाता, तो भारत का स्वतंत्रता आंदोलन ही असंभव हो जाता।
मीडिया किसी राजा का बाजा नहीं हो सकता। पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता के निकट खड़ा होना नहीं, बल्कि जनता के पक्ष में खड़ा होना है। जब मीडिया सत्ता से अत्यधिक निकटता बना लेता है, तब उसकी विश्वसनीयता कमजोर होने लगती है। जनता धीरे-धीरे उसे स्वतंत्र माध्यम नहीं, बल्कि राजनीतिक उपकरण के रूप में देखने लगती है। यही कारण है कि लोकतांत्रिक समाजों में मीडिया की स्वायत्तता को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों—जैसे नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और नीदरलैंड्स—में प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक स्थिरता का आधार माना गया है। वहाँ सरकारों की आलोचना करने वाले पत्रकारों को लोकतंत्र के आवश्यक प्रहरी के रूप में देखा जाता है। इसके विपरीत जिन देशों में मीडिया पर राजनीतिक नियंत्रण बढ़ता है, वहाँ लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर होने लगती हैं।
यह भी सत्य है कि पत्रकारिता को अपनी जिम्मेदारियों का पालन पूरी ईमानदारी और नैतिकता के साथ करना चाहिए। अपुष्ट समाचार, फेक न्यूज़, सांप्रदायिक उन्माद या पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग लोकतंत्र के लिए हानिकारक हैं। लेकिन इन समस्याओं का समाधान सरकारी नियंत्रण नहीं हो सकता। लोकतंत्र में मीडिया की गलतियों का समाधान स्वतंत्र न्यायपालिका, प्रेस परिषद, मीडिया नैतिकता और नागरिक जागरूकता के माध्यम से होना चाहिए, न कि राजनीतिक दमन के माध्यम से।
भारत ने आपातकाल का दौर भी देखा है, जब प्रेस सेंसरशिप लागू की गई थी और समाचार पत्रों की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई थी। बाद में भारतीय लोकतंत्र ने स्वयं उस दौर को एक गंभीर ऐतिहासिक भूल के रूप में स्वीकार किया। आपातकाल का अनुभव यह सिखाता है कि जब प्रेस स्वतंत्र नहीं रहता, तब लोकतंत्र की अन्य संस्थाएँ भी प्रभावित होने लगती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत में पत्रकारिता को राष्ट्रविरोध और राष्ट्रभक्ति के संकीर्ण राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के रूप में समझा जाए। सरकार की आलोचना करने वाला पत्रकार देशद्रोही नहीं होता। वह लोकतंत्र के उस आवश्यक तंत्र का हिस्सा होता है जो सत्ता को जवाबदेह बनाए रखता है। यदि प्रश्न पूछना अपराध बन जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे भयतंत्र में बदलने लगता है।
भारत यदि वास्तव में विश्व का सबसे बड़ा और परिपक्व लोकतंत्र बनना चाहता है, तो उसे प्रेस की स्वतंत्रता को केवल संवैधानिक आदर्श नहीं, बल्कि व्यावहारिक वास्तविकता बनाना होगा। पत्रकारों को बिना भय, दबाव और राजनीतिक प्रतिशोध के काम करने का वातावरण देना होगा। मीडिया पर किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष राजनीतिक नियंत्रण लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है। एक स्वस्थ राष्ट्र वही होता है जहाँ पत्रकार सरकारों से असहमति व्यक्त कर सकें, कठोर प्रश्न पूछ सकें और जनहित में सत्य को सामने ला सकें। यही लोकतंत्र की असली शक्ति है, और यही किसी भी सभ्य समाज की पहचान भी।








