गंगा-गंगा” नाम का स्मरण भी दिलाता है मोक्ष — स्कन्द पुराण
गुरुग्राम। आचार्य पुरोहित संघ के अध्यक्ष कथावाचक पं. अमर चन्द भारद्वाज ने बताया कि सनातन धर्म में ज्येष्ठ शुक्ल दशमी का दिन अत्यंत पावन एवं पुण्यदायी माना गया है। इसी दिव्य तिथि पर “श्रीगंगा दशहरा” का महापर्व श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष यह पावन पर्व 25 मई 2026, सोमवार को अधिक ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार जब ज्येष्ठ मास अधिकमास रूप में आता है, तब गंगा दशहरा उसी अधिक ज्येष्ठ मास में मान्य होता है।
पं. अमर चन्द भारद्वाज ने बताया कि पुराणों में वर्णित है कि पूर्वाह्ण-व्यापिनी ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तथा हस्त नक्षत्र के पावन योग में स्वर्ग से पतित-पावनी माँ श्रीगंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा लोककल्याण हेतु पृथ्वी पर अवतरित हुईं और भगवान शिव ने अपनी जटाओं में उन्हें धारण कर मानवता का कल्याण किया। तभी से यह पर्व सनातन संस्कृति में मोक्ष, पवित्रता और आत्मशुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
भारद्वाज ने बताया कि स्कन्द पुराण, धर्मारण्य खण्ड़ अध्याय : 31 श्लोक संख्या -7 में माँ गंगा की महिमा का अत्यंत मार्मिक वर्णन मिलता है—
“गंगा गंगेति यो ब्रूयात योजनानां शतैरपि।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके स गच्छति॥”
अर्थात जो मनुष्य सैकड़ों योजन मतलब कि सौ योजन = 800 मील (1200 किलोमीटर ),, जबकि यहाँ सैकड़ो योजन दूर रहकर भी श्रद्धा से “गंगा-गंगा” नाम का स्मरण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अंततः विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
यह शास्त्रीय वचन स्पष्ट करता है कि माँ गंगा केवल जलधारा नहीं, बल्कि दिव्य चेतना, करुणा और मोक्ष की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। सच्ची श्रद्धा से किया गया उनका स्मरण भी मनुष्य के जीवन को पवित्र बना देता है।
आज के समय में अत्यधिक गर्मी, स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयाँ, वृद्धावस्था, दूरी अथवा अन्य परिस्थितियों के कारण प्रत्येक व्यक्ति का हरिद्वार अथवा तीर्थस्थलों तक पहुँचना संभव नहीं हो पाता। ऐसे में शास्त्र स्वयं यह मार्ग बताते हैं कि यदि श्रद्धा सच्ची हो तो घर पर रहकर भी गंगा पूजन एवं स्नान का पुण्य प्राप्त किया जा सकता है।
प्रातःकाल स्नान के जल में गंगाजल की कुछ बूंदें मिलाकर श्रद्धा से यह मंत्र बोलें—
“ॐ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गङ्गायै नमः॥”
तत्पश्चात “गंगे च यमुने चैव…” अथवा “गंगा गंगेति…” श्लोक का स्मरण करते हुए स्नान करें। शास्त्रों के अनुसार जहाँ श्रद्धा से गंगा का आवाहन किया जाता है, वहाँ माँ गंगा का दिव्य तत्व स्वतः उपस्थित हो जाता है।
पं. अमर चन्द भारद्वाज ने बताया कि गंगा दशहरा के दिन निम्न पुण्य कार्य विशेष फलदायी माने गए हैं—
- गंगाजल मिश्रित जल से स्नान
- माँ गंगा का ध्यान एवं दीपदान
- गंगा मंत्र एवं स्तोत्रों का जप
- जल, अन्न, वस्त्र एवं फल का दान
- पितरों के लिए तर्पण
- वृक्षारोपण एवं जल संरक्षण का संकल्प
- मन, वाणी और आचरण की शुद्धि का प्रयास
गंगा दशहरा का वास्तविक संदेश केवल नदी स्नान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के दोषों, कटुता, अहंकार, लोभ और अधर्म को त्यागकर जीवन को धर्ममय एवं पवित्र बनाने की प्रेरणा देता है। माँ गंगा भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं — करुणा, पवित्रता, त्याग और लोककल्याण की जीवंत धारा।
यदि मनुष्य सच्चे हृदय से माँ गंगा का स्मरण करे, अपने दोषों को त्यागने का संकल्प ले तथा धर्म, सेवा और सदाचार का मार्ग अपनाए, तो वही वास्तविक “गंगा दशहरा” है — अर्थात् जीवन से दस प्रकार के पापों का अंत।









