ओंकारेश्वर पांडेय

हाल ही में प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा के साथ अपनी एक तस्वीर साझा की। इस तस्वीर के साथ उन्होंने जो लिखा, वह आधुनिक भारत के बौद्धिक और नैतिक संकट का सबसे संक्षिप्त ‘एक्स-रे’ है। गुहा ने ट्वीट किया:
“उसकी रीढ़ (Spine) मुझसे ज़्यादा सीधी है—और यह सिर्फ उम्र का फर्क नहीं हो सकता।“
यह केवल एक व्यक्ति की प्रशंसा नहीं थी, बल्कि उन तमाम ‘झुके हुए’ कंधों पर तमाचा था, जिन्होंने सुविधा के लिए सत्य की बलि दे दी। उन्होंने केवल उम्र का अंतर नहीं बताया था। उन्होंने एक डरावने सच की ओर इशारा किया था—कि आज के दौर में ‘सच’ बोलना और ‘सीधा खड़ा होना’ एक दुर्लभ कला बन गई है।
सत्य का आधार: हमारी सभ्यता की साँस
हमारी भारतीय वैदिक सभ्यता का तो डीएनए (DNA) ही सत्य है। हम वह लोग हैं जो जीवन भर भले ही भागते रहें, लेकिन अपनी अंतिम यात्रा में भी दुनिया को यही याद दिलाते हुए विदा होते हैं— ‘राम नाम सत्य है‘। जब अंत ही सत्य है, तो जीवन झूठ की बैसाखियों पर क्यों? हमारे उपनिषदों का सीधा आदेश है: ‘सत्यं वद, धर्मं चर‘ (सत्य बोलो और धर्म के मार्ग पर चलो)। लेकिन आज हमने ‘सुविधा’ को धर्म और ‘झूठ’ को नीति बना लिया है।
वैदिक उद्घोष और मेरुदंड का धर्म
भारतीय मनीषा में ‘सीधे खड़े होने’ को केवल शारीरिक मुद्रा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उपलब्धि माना गया है। तैत्तिरीय उपनिषद (2.9.1) की वह अमर पंक्ति जिसे आपने स्मरण किया, वह पूर्ण रूप में इस प्रकार है:
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान। न बिभेति कदाचन।।
(अर्थ: जो उस ब्रह्म के आनंद को जान लेता है, वह फिर कभी किसी से नहीं डरता।)
ऋग्वेद में भी ‘ऋत‘ (Cosmic Truth) की चर्चा है। वहाँ स्पष्ट है कि जो सत्य के साथ है, वही ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ है। जिसकी रीढ़ सीधी है, वही सत्य को धारण कर सकता है। विवेकानंद ने भी इसी को स्वर देते हुए कहा था— “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।“ यह ‘उठना’ झुककर चलने वाली भीड़ के बीच अंगद की तरह पैर जमाने का आह्वान है।
सचिव, वैद्य और गुरु: पतन की त्रिमूर्ति
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस (सुंदरकांड) में सत्ता और समाज के पतन का जो सूत्र दिया है, वह आज के ‘गोदी मीडिया’ और ‘दरबारी बुद्धिजीवियों’ पर सटीक बैठता है:
सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।
(अर्थ: यदि मंत्री, चिकित्सक और गुरु—ये तीनों भय या किसी लाभ की आशा से ‘प्रिय‘ (चाटुकारितापूर्ण) बोलने लगें, तो राज्य, धर्म और शरीर का शीघ्र ही विनाश निश्चित है।)
आज मीडिया ‘सचिव’ (सलाहकार) की भूमिका में है, अकादमिया ‘गुरु’ की और विशेषज्ञ ‘वैद्य’ की। जब ये तीनों सत्य की कड़वी दवा के बजाय सत्ता के कानों को सुहाने वाला ‘झूठ का शहद’ चटाने लगें, तो लोकतंत्र का ‘शरीर’ सड़ने लगता है।
कानूनी अपराध और संवैधानिक मर्यादा
भारतीय संविधान की प्रस्तावना ‘न्याय’ और ‘स्वतंत्रता’ की बात करती है, लेकिन अनुच्छेद 19(1)(a) जो अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है, वह ‘सत्य की जवाबदेही’ से मुक्त नहीं है। कानून की नज़र में ‘Perjury’ (झूठी गवाही) एक दंडनीय अपराध है। मीडिया जब जनहित के नाम पर जानबूझकर भ्रम फैलाता है, तो वह सामूहिक ‘पर्जरी’ है।
अदालतों में गीता पर हाथ रखकर शपथ ली जाती है कि “जो कहूँगा सच कहूँगा”। लेकिन जब न्यूज़ रूम की टेबल को ही गवाही की मेज़ बना दिया जाए और वहाँ से रोज़ झूठ परोसा जाए, तो यह न केवल संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के खिलाफ एक ‘बौद्धिक अपराध’ है। समय का न्याय (The Justice of Time) बड़ा निर्मम होता है; वह केवल सत्ता को नहीं, बल्कि उस सत्ता के लिए झूठ की ढाल बनने वालों को भी इतिहास के कूड़ेदान में डाल देता है।
महाभारत का वह किस्सा: जब ‘झूठ‘ ने रथ के पहिए ज़मीन पर उतार दिए
धर्मराज युधिष्ठिर का रथ हमेशा ज़मीन से चार अंगुल ऊपर चलता था—उनके सत्य की शक्ति के कारण। लेकिन महाभारत के युद्ध में जैसे ही उन्होंने ‘अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा‘ (अश्वत्थामा मारा गया, पर मनुष्य या हाथी…) कहते हुए अर्धसत्य का सहारा लिया, उनके रथ के पहिए ज़मीन पर आ गिरे।
यही आज के हमारे दौर का हाल है। जैसे ही पत्रकारिता, राजनीति और समाज ने ‘अर्धसत्य’ और ‘झूठ’ की राह पकड़ी, भारत का नैतिक रथ जो दुनिया के सामने ‘विश्वगुरु’ बनकर ऊँचा चलता था, वह स्वार्थ की कीचड़ में धँस गया। एक छोटा सा झूठ पूरी सभ्यता के गौरव को मिटा सकता है, और हम तो रोज़ झूठ की नदियाँ बहा रहे हैं।
गूगल, डिजिटल युग और अमेरिका का पतन
आज की गूगल संचालित डिजिटल दुनिया गवाह है—दुनिया अब अमेरिका से इसीलिए दूर हो रही है क्योंकि उसने ‘प्रोपेगेंडा’ और ‘झूठ’ को अपना हथियार बनाया। फारस की खाड़ी में जो अमेरिका आज अलग-थलग पड़ा है, वह सैन्य शक्ति की कमी से नहीं, बल्कि अपनी ‘टेढ़ी रीढ़’ और ‘झूठे नैरेटिव’ के कारण डूबा है। जब एक महाशक्ति झूठ बोलने लगती है, तो पूरी दुनिया का उस पर से भरोसा उठ जाता है। भारत के साथ भी यही खतरा है। दुनिया हमें इसलिए मानती थी क्योंकि हम बुद्ध, गांधी और सत्य के देश थे। जैसे ही हमने असत्य का हाथ थामा, हम भी अकेले पड़ने लगे।
मीडिया और भविष्य का हिसाब
आज का मीडिया यह न भूले कि डिजिटल फुटप्रिंट मिटते नहीं हैं। आज आप जो झूठ ‘राष्ट्रभक्ति’ के नाम पर परोस रहे हैं, वह असल में राष्ट्र की रीढ़ तोड़ रहा है। झूठ बोलना केवल एक नैतिक बुराई नहीं, बल्कि एक ‘कानूनी जुर्म’ भी है जिसका हिसाब समय की अदालत बहुत बेरहमी से लेती है।
ट्रंप, पीट्स और मेरुदंड का वैश्विक संकट
झूठ और रीढ़ के लचीलेपन का परिणाम केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह चर्चित प्रकरण याद कीजिए, जब ईरान के साथ तनाव और सैन्य विफलता के बाद उन्होंने इसका ठीकरा अपने सहयोगियों पर फोड़ा था। उन्होंने पीट्स हेगसेठ (Pete Hegseth) की ओर इशारा करते हुए कहा था:
“Pete, you said it. You said it!”
यह उस असुरक्षित नायक का विलाप है जिसकी अपनी कोई रीढ़ नहीं होती। जब योजना विफल होती है, तो वे उन कंधों को ढूँढते हैं जिन पर दोष मढ़ा जा सके। ट्रंप का यह बयान इस बात का प्रमाण है कि जब आप रीढ़ के बजाय ‘चाटुकारिता’ पर भरोसा करते हैं, तो अंततः आप अकेले और असहाय खड़े होते हैं।
ट्रंप ने पीट्स हेगसेठ से जो कहा वह असल में उस हर चाटुकार के लिए चेतावनी थी जो सत्ता को खुश करने के लिए झूठ बुनता है। अंत में सत्ता आपको ही बलि का बकरा बनाएगी।
भविष्य की चेतावनी
मीडिया को समझना होगा कि ‘झुकना’ केवल एक राजनैतिक विकल्प नहीं है, बल्कि यह एक ‘जैविक आत्महत्या’ है। अरस्तू ने कहा था— “सत्य मेरा मित्र है, लेकिन उससे भी बड़ा मित्र सत्य है।“
हमेशा के लिए याद रखने योग्य सूत्र:
1.सत्य की गूँज: झूठ बोलने की उम्र छोटी होती है, लेकिन उसका हिसाब सदियों तक देना पड़ता है।
2.संवैधानिक धर्म: पत्रकार का धर्म संविधान की रक्षा करना है, सत्ता की आरती उतारना नहीं।
3.मेरुदंड की शक्ति: इतिहास उन्हें याद नहीं रखता जो ‘व्यावहारिक’ होकर झुक गए, बल्कि उन्हें याद रखता है जिनकी अस्थियां (जैसे महर्षि दधीचि) सत्य के लिए वज्र बन गईं।
सीधा खड़ा होना ही राष्ट्रभक्ति है
रामचंद्र गुहा की वह बात हम सबके लिए एक सबक है। राष्ट्रभक्ति का मतलब सत्ता की जी-हुज़ूरी करना नहीं, बल्कि देश के सामने आईने की तरह सच बोलना है। चाटुकारिता का ‘कूबड़’ लेकर हम विश्वगुरु नहीं बन सकते।
आइए, अपनी रीढ़ को फिर से सीधा करें। याद रखें, इतिहास लचीले और झुकने वाले लोगों का नहीं, बल्कि उन लोगों का होता है जो तूफान में भी सच के साथ सीधे खड़े रहे। क्योंकि अंततः, सत्य ही एकमात्र ऐसी चीज़ है जो डूबती नहीं।
चीनी कहावत है: “अगर तुम सीधे खड़े हो, तो टेढ़े साये से मत डरो।” नीति कहती है –”मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं न तु गच्छति” : मरो तो मरो, पर नीचता की ओर मत झुको। सीधी रीढ रखो, दुनिया की लात मत खाओ।
सत्य के साथ खड़े हों, क्योंकि बाकी सब गोलमाल है।
चाहे वह गुहा का अनुभव हो या तुलसी का दोहा—सत्य यही है कि सीधी रीढ़ विद्रोह नहीं, वह मनुष्य होने की न्यूनतम शर्त है। यदि आप आज सीधे खड़े नहीं हो सकते, तो कल आप अपनी संतानों को सिर उठाकर जीना नहीं सिखा पाएंगे।
“सत्यमेव जयते नानृतम्” — सत्य की ही जीत होती है, झूठ की नहीं।








