घनश्याम बादल

मनुष्य ने विज्ञान रचा, सभ्यताएं बनाईं, सत्ता के ढांचे खड़े किए और आधुनिकता के अनगिनत प्रतिमान गढ़े, लेकिन यदि मानव जीवन की सबसे मौलिक और सबसे पवित्र संस्था की पहचान करनी हो तो वह “मां” है। मां केवल जन्म देने वाली स्त्री नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मनुष्यता बचाए रखने वाली सबसे बड़ी शक्ति है। वह जीवन का पहला स्पर्श है, पहला विश्वास है, पहला विद्यालय है और वह पहली छाया है जिसके बिना संसार का कोई भी वैभव अधूरा है।
मदर्स डे केवल कैलेंडर पर दर्ज एक औपचारिक दिवस नहीं होना चाहिए। यह दिन समाज से कुछ असहज प्रश्न पूछने का भी अवसर है। क्या हम सचमुच अपनी माताओं को वह सम्मान दे पा रहे हैं जिसकी वे अधिकारी हैं? क्या हमने मां को केवल त्याग, सेवा और कर्तव्य का पर्याय मान लिया है? क्या आधुनिक समाज ने मां के अस्तित्व को भावनात्मक सम्मान के बजाय सुविधाजनक “भूमिका” में बदल दिया है?
भारतीय संस्कृति में मां को सदैव सर्वोच्च स्थान दिया गया। यहां “मातृदेवो भव” केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक दर्शन था। इसी संस्कृति ने धरती को “मातृभूमि”, भाषा को “मातृभाषा” और प्रकृति को “धरती मां” कहा। यशोदा का वात्सल्य, जिजाबाई की राष्ट्र चेतना और पन्ना धाय का बलिदान भारतीय मातृत्व की उन ऊंचाइयों के प्रतीक हैं जहां व्यक्तिगत सुख से ऊपर समाज और संस्कार खड़े दिखाई देते हैं।
लेकिन विडंबना यह है कि मां को देवी कहने वाला समाज ही आज अपनी माताओं को सबसे अधिक अकेला छोड़ता दिखाई दे रहा है। आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ में रिश्तों की गर्माहट लगातार कम होती जा रही है। घर बड़े हो गए हैं, लेकिन परिवार छोटे पड़ गए हैं। सुविधाएं बढ़ी हैं, पर संवेदनाएं सिकुड़ती चली गई हैं। वृद्धाश्रमों में बढ़ती माताओं की संख्या केवल सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि हमारी संवेदनहीन होती मानसिकता का कठोर आईना है।
आज की मां का संघर्ष पहले से कहीं अधिक कठिन है। वह केवल रसोई और परिवार तक सीमित स्त्री नहीं रही। वह नौकरी करती है, आर्थिक जिम्मेदारियां उठाती है, बच्चों के भविष्य की चिंता करती है और परिवार की भावनात्मक धुरी भी बनी रहती है। वह घर और कार्यस्थल के बीच लगातार संतुलन साधती है, लेकिन उसके श्रम को आज भी “कर्तव्य” कहकर सामान्य बना दिया जाता है।
डिजिटल युग ने मातृत्व की चुनौतियों को और जटिल बना दिया है। आज की मां अपने बच्चों को केवल शिक्षित नहीं, बल्कि मानसिक रूप से सुरक्षित रखने के संघर्ष में भी लगी हुई है। मोबाइल की लत, सोशल मीडिया का दबाव, नैतिक भ्रम और प्रतिस्पर्धा की अंधी संस्कृति के बीच वह अपने बच्चों को आधुनिक भी बनाना चाहती है और संस्कारित भी। यही आधुनिक मातृत्व का सबसे कठिन द्वंद्व है।
दुर्भाग्य यह है कि समाज मां के त्याग को इतना “स्वाभाविक” मान चुका है कि उसकी पीड़ा दिखाई ही नहीं देती। जिस मां ने पूरी जिंदगी परिवार की आवाज सुनते हुए बिताई, वृद्धावस्था में वही मां अक्सर किसी के दो मिनट के साथ के लिए तरसती है। मदर्स डे पर महंगे उपहार और सोशल मीडिया संदेश उस खालीपन को नहीं भर सकते जिसे संवाद, सम्मान और अपनत्व ही भर सकते हैं।
मां का सम्मान केवल भावुक शब्दों से नहीं, सामाजिक व्यवहार से सिद्ध होता है। घरों में निर्णय प्रक्रिया में माताओं की भागीदारी बढ़नी चाहिए। उनके स्वास्थ्य, मानसिक तनाव और व्यक्तिगत इच्छाओं को भी उतनी ही गंभीरता से समझा जाना चाहिए जितनी परिवार के अन्य सदस्यों की जरूरतों को समझा जाता है। बच्चों को बचपन से यह सिखाया जाना चाहिए कि मां का त्याग उसकी मजबूरी नहीं, बल्कि प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।
सरकारों और संस्थाओं की भी बड़ी जिम्मेदारी है। कामकाजी माताओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल, पर्याप्त मातृत्व अवकाश, बच्चों की देखभाल की सुविधाएं और वृद्ध माताओं के लिए सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था किसी भी संवेदनशील समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए। जिस समाज में मां सुरक्षित नहीं, वह समाज सभ्यता का दावा नहीं कर सकता।
आज दुनिया तेजी से लाभ, उपभोग और व्यक्तिगत सफलता की संस्कृति में बदल रही है। रिश्तों की जगह सुविधाएं ले रही हैं। ऐसे समय में मां का अस्तित्व मनुष्यता की अंतिम शरणस्थली जैसा प्रतीत होता है। मां वह शक्ति है जो टूटकर भी परिवार को टूटने नहीं देती। वह स्वयं आंसू पीकर दूसरों के चेहरे पर मुस्कान बनाए रखती है। उसका त्याग इतना मौन होता है कि इतिहास भी अक्सर उसे दर्ज नहीं कर पाता।
मदर्स डे का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा जब हम मां को केवल “मां” नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र अस्तित्व वाले इंसान के रूप में भी स्वीकार करेंगे—जिसकी अपनी इच्छाएं हैं, अपने सपने हैं, अपनी थकान है और अपनी संवेदनाएं हैं।
क्योंकि मां को सम्मान किसी एक दिन से नहीं मिलता।
मां को सम्मान पूरे जीवन के व्यवहार से मिलता है।
“मां केवल रिश्ता नहीं, मनुष्य के भीतर बची हुई संवेदना की अंतिम रोशनी है।”









