(वर्तमान आर्थिक संघर्षों का सैद्धांतिक विश्लेषण) : काम का दिन 6 घंटे: मजदूर संघर्ष की नई दिशा

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सरदूल सिंह

भारत के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों—मानेसर, पानीपत, नोएडा सहित कई शहरों—में इन दिनों मजदूर वर्ग अपने आर्थिक अधिकारों को लेकर आंदोलित है। वेतन, भत्ते, सेवा सुरक्षा और काम की शर्तों, काम का दिन जो 8 घंटे से बढ़ाकर 12 कर दिया गया है उसे वापस 8 घंटे करवाने को लेकर चल रहे ये संघर्ष लगातार तेज हो रहे हैं।

लेकिन एक बुनियादी सवाल आज भी अनुत्तरित है ईमानदार नेतृत्व में ईमानदार रूप में किए जा रहे—इतने संघर्षों के बावजूद मजदूर वर्ग की स्थिति में निर्णायक बदलाव क्यों नहीं आ पा रहा है?

वास्तव में, इसका कारण संघर्षों में सिद्धांतों की उपेक्षा किया जाना है। आज जो आंदोलन हो रहे हैं, वे मुख्यतः आर्थिक संघर्ष हैं, जो तात्कालिक राहत तो दे सकते हैं, लेकिन शोषण की जड़ को समाप्त नहीं कर पाते। आर्थिक संघर्ष और वर्ग संघर्ष में पाए जाने वाले अंतर को समझे बिना और लागू किए बिना वांछित परिणाम नहीं आ सकते।

वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में वर्गीय चेतना के अभाव में शोषण की गति और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि समाज की विभिन्न परतें—मजदूर, किसान, छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग, कर्मचारियों की वास्तविक स्थिति—धीरे-धीरे आर्थिक रूप से कमजोर होती जा रही हैं। उनकी क्रयशक्ति घट रही है और जीवन स्तर लगातार गिर रहा है। छोटे उत्पादक और कारीगर भी इस व्यवस्था में टिक नहीं पा रहे, जिससे समाज में परोलेटेरिएट वर्ग का विस्तार और पूंजी का केंद्रीयकरण तेजी से बढ़ा है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से वर्गीय असमानता को और गहरा कर रही है।

आर्थिक संघर्ष की सीमाएं

मजदूर वर्ग अपने कार्य संस्थानों या विभागों जैसे शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, जलदाय, कारखानों, कार्यालयों में जिन आर्थिक अधिकारों के लिए संघर्ष करता है, वह मुख्यतः वेतन वृद्धि, भत्तों, पेंशन और सेवा सुरक्षा तक सीमित रहता है। इन संघर्षों के परिणामस्वरूप कुछ आंशिक उपलब्धियां मिलती हैं, लेकिन व्यवस्था में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं होता।

यही कारण है कि कुछ समय बाद समस्याएं फिर उसी रूप में या बदले रूप में सामने आ जाती हैं। इससे मजदूरों में निराशा और नेतृत्व के प्रति अविश्वास पैदा होता है। इसी विश्वास के कारण बहुत सारे संगठन भी बनने शुरू हो जाते हैं।

वर्ग संघर्ष की आवश्यकता:-

इसके विपरीत, वर्ग संघर्ष केवल आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन का लक्ष्य रखता है। ” हर राजनीतिक संघर्ष, वर्ग संघर्ष होता है।” जिसमें पूरे मजदूर वर्ग को संगठित कर शोषण की जड़, कार्य दिवस अवधि को कानूनी रूप से छोटा करते हुए,सबको रोजगार गारंटी तथा फ्री टाइम की मांग को उभार कर व्यवस्था पर प्रहार किया जाता है।

इतिहास बताता है कि जब भी परोलेटेरिएट वर्ग (काम में लगे तथा वे युवा जिन्हें अभी काम मिला ही नहीं)। ने अपने संघर्ष को वर्गीय रूप दिया है, तभी उसे स्थायी उपलब्धियां हासिल हुई हैं।

श्रम कानूनों में बदलाव: किसके हित में?

हाल के वर्षों में श्रम कानूनों में व्यापक बदलाव किए गए हैं। नए श्रम कोड के माध्यम से कार्यदिवस को 8 घंटे से बढ़ाकर 12 से 15 घंटे तक करने के प्रावधान सामने आए हैं। साथ ही, न्यूनतम मजदूरी और सेवा सुरक्षा से जुड़े अधिकार भी कमजोर हुए हैं।

यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से पूंजीपति वर्ग के हितों को मजबूत करते हैं और मजदूर वर्ग पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं। इससे असंतोष और संघर्ष की स्थितियां और तीव्र हो रही हैं।

6 घंटे कार्यदिवस: समय की मांग

ऐतिहासिक रूप से 8 घंटे का कार्यदिवस मजदूर आंदोलनों की बड़ी उपलब्धि रहा है, लेकिन वह 19वीं सदी की परिस्थितियों के अनुरूप था। उससे पहले काम का दिन 20,18,16,14,12,10 घंटे भी वह करता था 1890 में 8 घंटे का कानून बनवाना एक “सामान्य कार्य दिवस” माना गया लेकिन सिद्धांत रूप में यह शर्त लागू रखी गई थी कि कि ज्यों ज्यों तकनीक उन्नत होगी, उत्पादकता बढ़ेगी, काम के दिन को कानूनी रूप में घटाना अनिवार्य होगा। आज इतनी तकनीकी उन्नति के बावजूद भी हम 8 घंटे के कार्य दिवस को ही सामान्य कार्य दिवस मान बैठे हैं जो हमारी भूल है, हमारी गलती है जो अपराध बनती जा रही है।

इसलिए वर्तमान में काम के दिन को कानूनी रूप में 8 घंटे से घटाकर 6 करने पर काम के दिन का समय 25% घटेगा और रोजगार के अवसर 33% बढ़ेंगे जिससे बेरोजगारी भी खत्म होगी, क्रय शक्ति भी बढ़ेगी, मजदूर के आर्थिक हित भी पूरे होंगे।

आज तकनीकी प्रगति और उत्पादन क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। इसके बावजूद मजदूर /कर्मचारी संविदा/अस्थाई, न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर अधिक समय तक काम लिया जा रहा है, जो शोषण को और बढ़ाता है।

ऐसी स्थिति में काम के दिन को 8 घंटे से बढ़ाकर 12 करने से उत्पन्न शोषण से पीड़ित श्रमिकों के द्वारा केवल 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग करना पर्याप्त नहीं है।

आज जरूरत है कि कार्यदिवस को कानूनी रूप में 8 घंटे से घटाकर 6 घंटे या उससे कम किया जाए।यह मांग केवल मजदूरों को राहत देने तक सीमित नहीं है बल्कि— वर्गीय मांग है जो बेरोजगारी को कम करेगी, रोजगार के अवसर बढ़ाएगी। मजदूरों को सामाजिक और पारिवारिक जीवन के लिए समय देगी।

संघर्ष की नई दिशा:-

जब मजदूर वर्ग अपनी मांगों को वर्गीय रूप में प्रस्तुत करता है—जैसे रोजगार की गारंटी, काम के अनुसार दाम और कानूनी रूप में कार्यदिवस में कमी—तो यह संघर्ष केवल आर्थिक नहीं रहता, बल्कि वर्ग संघर्ष का रूप ले लेता है।

महान दार्शनिक भगतसिंह ने स्पष्ट किया था कि मजदूर वर्ग की मुक्ति केवल आर्थिक मांगों से नहीं, बल्कि वर्ग संघर्ष और सत्ता परिवर्तन से ही संभव है।

निष्कर्ष

आज का दौर मजदूर आंदोलनों के लिए एक निर्णायक मोड़ है। यदि ये आंदोलन केवल वेतन, भत्तों , सेवा शर्तों जैसी आंशिक आर्थिक मांगों तक सीमित रहते हैं, तो वे अस्थायी राहत तक ही सिमट जाएंगे लेकिन यदि परोलेटेरिट वर्ग एकजुट होकर “सबको योग्यता अनुसार काम, काम के अनुसार दाम” और “काम का दिन कानूनी रूप में 6 घंटे करो” जैसे नारों को अपने संघर्ष का आधार बनाता है तो यह व्यापक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। युवा पीढ़ी को रोजगार तथा काम के बोझ से पीड़ित मजदूरों को फ्री टाइम उपलब्ध करवा सकता है।

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Author: Bharat Sarathi

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