एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

गोंदिया (महाराष्ट्र)। नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी पहल के रूप में उभरकर सामने आया है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने वाला यह अधिनियम केवल प्रतिनिधित्व का विस्तार नहीं, बल्कि नीति-निर्माण में महिलाओं की निर्णायक भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में एक ठोस कदम है।
हालांकि, इस अधिनियम की सफलता केवल सीटों की संख्या बढ़ाने से नहीं, बल्कि महिलाओं के स्वतंत्र और प्रभावी नेतृत्व से तय होगी। वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ी चुनौती “प्रॉक्सी राजनीति” के रूप में सामने आती है, जहां कई महिला जनप्रतिनिधियों के निर्णय उनके पति, पिता या अन्य पुरुष परिजनों द्वारा प्रभावित या नियंत्रित किए जाते हैं। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है और मतदाताओं के विश्वास के साथ भी छल है।
सख्त कानूनी प्रावधान की आवश्यकता

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी का स्पष्ट मत है कि यदि महिला सशक्तिकरण को वास्तविक रूप देना है, तो अधिनियम में यह प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए कि—
- महिला जनप्रतिनिधियों के कार्यों में किसी भी प्रकार की पारिवारिक या बाहरी दखलअंदाजी को अपराध की श्रेणी में रखा जाए।
- ऐसे मामलों में कठोर और निवारक दंड का प्रावधान हो।
यह कदम न केवल महिला नेतृत्व को स्वतंत्र बनाएगा, बल्कि पारिवारिक दबाव के कारण उत्पन्न होने वाले तनाव और विवादों को भी कम करेगा।
नेतृत्व के लिए आत्मनिर्भरता और संकल्प
महिलाओं के लिए यह अवसर केवल आरक्षण का लाभ लेने का नहीं, बल्कि अपनी पहचान स्थापित करने का है। इसके लिए आवश्यक है कि—
- वे स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित करें
- राजनीतिक और प्रशासनिक प्रशिक्षण प्राप्त करें
- किसी भी प्रकार के दबाव से मुक्त होकर नेतृत्व करें
साथ ही, महिलाओं को जनता से “एकल नेतृत्व” का वादा करना होगा, ताकि लोकतंत्र की आत्मा—जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि—वास्तव में वही निर्णय ले।
सरकार और समाज की भूमिका

इस अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सरकार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- नेतृत्व प्रशिक्षण और राजनीतिक शिक्षा कार्यक्रम शुरू किए जाएं
- महिला जनप्रतिनिधियों के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत तंत्र विकसित किया जाए
- समाज में यह सोच विकसित हो कि महिलाएं केवल सहयोगी नहीं, बल्कि सक्षम नेता हैं
राष्ट्रीय और वैश्विक समर्थन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सभी दलों से इस अधिनियम के समर्थन की अपील इसे राष्ट्रीय महत्व का विषय बनाती है। वहीं पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का समर्थन इस पहल को नैतिक और वैचारिक मजबूती प्रदान करता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह पहल सकारात्मक संकेत देती है, जहां रवांडा, नॉर्वे और फ्रांस जैसे देशों में महिला भागीदारी ने नीति-निर्माण को अधिक समावेशी बनाया है।
निष्कर्ष
नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में परिवर्तन का अवसर है। लेकिन यह परिवर्तन तभी सार्थक होगा जब—
- महिलाएं स्वयं नेतृत्व का संकल्प लें
- सरकार ठोस कानूनी प्रावधान लागू करे
- समाज मानसिकता में बदलाव लाए
यदि इन तीनों स्तरों पर समन्वय स्थापित होता है, तो यह अधिनियम न केवल महिला सशक्तिकरण का नया अध्याय लिखेगा, बल्कि भारत को एक अधिक न्यायपूर्ण, समावेशी और सशक्त राष्ट्र बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।









