कमलेश पांडेय

यदि आप देश-दुनिया को सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाने के बजाए लाभप्रद और वर्चस्वमय हिंसा-प्रतिहिंसा को बढ़ावा देने की सीख सिखाने के आदी हो चुके हैं तो सावधान हो जाइए। यह आपकी अप्राकृतिक हरकत है जिसकी कीमत आपको कभी न कभी चुकानी ही पड़ेगी। यह अकाट्य सत्य है क्योंकि देर-सबेर हुतात्माओं/निरीह पशु-प्राणियों के आत्मा के चक्रब्यूह (जबरदस्त गोलबंदी) में आप घिरेंगे और फिर आपके साथ भी वही होगा, जिसके सबक बेदर्द इतिहास के पन्नों में भरे पड़े हैं।
जो बोइयेगा, वही काटियेगा, यह प्रकृति का अपरिवर्तित नियम है। सनातन धर्म में अकाल मृत्यु का स्रोत ऐसे ही प्रारब्ध जनित कर्मों का प्रतिफल है। आतंक उत्पादक और निर्यातक अमेरिका-ईरान इसी अकाट्य नैसर्गिक नियम के शिकार होते प्रतीत हो रहे हैं, फिर भी उन्हें सद्बुद्धि नहीं आई है जबकि इजरायल तो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जूझ रहा है। वह धर्मयुद्ध का शिकार है। वह अल्पसंख्यक यहूदी होने की कीमत चुका रहा है। वहीं, शांतिप्रिय और गुटनिरपेक्ष देश भारत चाहकर भी वसुधैव कुटुम्बकम की भावना सबके दिलोदिमाग में नहीं जगा पा रहा है। उसके सर्वे भवंतु सुखिनः वाली सोच की धज्जियां पाकिस्तान उड़ा-उड़वा रहा है।
इसलिए सबको ठंडे दिमाग से सोचने की जरूरत है। चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध हो या भारत-पाकिस्तान युद्ध या फिर संभावित चीन-ताइवान युद्ध, या फिर अन्य द्विदेशीय सीमा संघर्ष, सबको टालना, टलवाना जरूरी है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ को कठोर होना पड़ेगा। वीटो पावर प्राप्त पांचों देशों को और अधिक जिम्मेदार बनना पड़ेगा। हथियारों और दवाओं को कारोबार नहीं, बल्कि सुरक्षा और सेवा के नजरिये से देखना पड़ेगा।
ऐसा इसलिए कि पूरी दुनिया में इस्लामिक शासन लाने के स्वप्नद्रष्टा देश ईरान द्वारा पूंजीवादी लोकतांत्रिक मुल्क अमेरिका के 15 सूत्री अमेरिकी शांति योजना को ठुकरा दिया है। इससे मध्य पूर्व में तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है, जो क्षेत्रीय और वैश्विक कूटनीति को प्रभावित कर रहा है। इससे युद्ध का अभूतपूर्व विस्तार और द्विपक्षीय बर्बादी तय है। कूटनीतिक मामलों के जानकारों के मुताबिक, जहां ईरान ने अमेरिकी 15-सूत्री योजना (जिसमें परमाणु सुविधाओं का विघटन और मिसाइल सीमाएं शामिल हैं) को “अत्यधिक” बताकर खारिज कर दिया, वहीं ईरान ने अमेरिकी-इजरायल गुटबंदी के ऊपर अपनी पांच महत्वपूर्ण शर्तें रखीं हैं, जैसे युद्ध क्षतिपूर्ति, होर्मुज जलडमरूमध्य पर संप्रभुता और हमलों का अंत आदि। इससे संघर्ष लंबा खिंच सकता है, क्योंकि ईरान हमले जारी रखे हुए है।
इस पूरे प्रकरण में कठोर क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं मिली हैं। जहां अरब-खाड़ी देशों, यथा- सऊदी, यूएई आदि और जॉर्डन ने ईरान की कार्रवाइयों की निंदा की, वहीं परस्पर एकजूट होकर ईरान की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं पर विराम लगाने के उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्धता भी जताई। साथ ही, यूएनएससी में प्रस्ताव लाया गया। जबकि अमेरिकी एजेन्ट पाकिस्तान बनावटी मध्यस्थ बना रहा है, लेकिन सबके बीच पारस्परिक अविश्वास गहरा गया है।
जहां तक वैश्विक प्रभाव की बात है तो संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी कि होर्मुज बंद होने से तेल (20% वैश्विक आपूर्ति) कारोबार प्रभावित हो रहा है, जिससे कीमतें $100+ पहुंचीं और अर्थव्यवस्थाएं चरमरा रही हैं। इससे प्रभावित यूरोप, भारत, पूर्वी एशियाई देश और अन्य ने शांति की मांग की, जबकि अपना शांति प्रस्ताव खारिज होते ही अमेरिका ने और अधिक सैनिक ईरान की ओर भेज दिए हैं। इससे कूटनीतिक चुनौतियां भी उपजी हैं। जहां यह अस्वीकृति ट्रंप प्रशासन की पहल को झटका देती है, वहीं ईरान को मजबूत बनाती है और मध्यस्थों (पाकिस्तान, मिस्र) की भूमिका कमजोर करती है। इससे भविष्य में सैन्य एस्केलेशन या नए मध्यस्थ (रूस?) का उभार संभव है।
अंतर्राष्ट्रीय युद्ध विशेषज्ञ बताते हैं कि ईरान द्वारा यूएस शांति योजना अस्वीकृति से मध्य पूर्व युद्ध अनिश्चितकाल तक लंबा खिंच सकता है, क्योंकि कोई नया समझौता होता नहीं दिखाई दे रहा है। वहीं, जिस तरह से पहले यूक्रेन के पीछे पूरा यूरोप/अमेरिका खड़े थे, अब ईरान के पीछे रूस/चीन जैसे कद्दावर देश खड़े हो चुके हैं। इससे इस युद्ध में युद्धोन्मादी देश अमेरिका की मिट्टी पलीद हो रही है। यूरोप का नाटो भी पूरी तरह से अमेरिका के पक्ष में खड़ा नहीं है, बल्कि अपना हाथ खींच चुका है। इससे ईरान के हौसले बुलंद हैं।
विशेषज्ञों के इस युद्ध से जुड़े अनुमान पहले 4-6 सप्ताह के थे, लेकिन अब महीनों या उससे अधिक का खतरा बता रहे हैं। प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने युद्ध को 4-5 सप्ताह का बताया था, जबकि पेंटागन ने 4-6 सप्ताह का अनुमान लगाया। लेकिन 26 दिनों बाद भी हमले जारी हैं, ईरान ने भी जबर्दस्त काउंटर किया है। उसने युद्ध रोकने सम्बन्धी एक काउंटर-प्रस्ताव भी रखा हुआ है। वर्तमान स्थिति यह है कि ईरान ने 15-सूत्री योजना को “अनुचित” ठहराया, और अपनी शर्तें (क्षतिपूर्ति, होर्मुज नियंत्रण) रखीं। वहीं, अमेरिका 50,000+ सैनिक भेज चुका है, जिससे और संघर्ष तीव्र होता जा रहा है।
विशेषज्ञ भविष्यवाणियां दिलचस्प हैं। पूर्व सलाहकार जॉन बोल्टन ने कहा कि न्यूनतम 4-5 सप्ताह लेकिन “महीनों” लग सकते हैं। कुछ विश्लेषक ईरान की हार मानते हैं लेकिन अवधि लंबी होने पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा। इसका कोई निश्चित अंत नहीं है, क्योंकि मध्यस्थ असफल दिखाई दे रहे हैं। भले ही ईरान के साथ युद्ध में करीब चार हफ्तों बाद अमेरिका ने समझौते की इच्छा जताई है, जो पूरी दुनिया के लिए अच्छी खबर है, लेकिन शांति की खातिर दोनों पक्षों को अपनी अपनी जिद छोड़नी होगी। अन्यथा पूरी दुनिया की आर्थिक बर्बादी तय है।
वैसे तो, अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिये ईरान तक 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव भेजा है। इसमें तेहरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को बंद करने और होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने जैसी मांगें शामिल हैं। जबकि कुछ रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने भी अपनी मांगें रखी है, जिसमें सबसे अहम यह है कि अमेरिका को पश्चिम एशिया में अपने सभी सैन्य ठिकाने बंद करने होंगे।
वहीं, पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रजा अमीरी मुकद्दम ने वॉशिंगटन और तेहरान के बीच किसी तरह की बातचीत से इनकार किया है। उधर, ईरान के एक सैन्य प्रवक्ता ने भी ट्रंप के प्रस्ताव का मजाक उड़ाया लेकिन, अहम यह है कि अब कम से कम शांति की चर्चा तो हो रही है।
ईरान और अमेरिका एक-दूसरे से जो चाहते है, वह मुश्किल है। कमोबेश इन्ही मामलों पर फरवरी में भी बातचीत अटकी थी। इन बिंदुओं को वह रेड लाइन कह सकते है, जिसे पार करना दोनों देशों के लिए असंभव है। लेकिन, आमतौर पर युद्ध के बीच बातचीत इसी तरह से शुरू होती है। इसलिए यकायक यह उम्मीद नहीं कर सकते कि दोनों देश सीधे आमने-सामने बैठ जाएंगे और उनकी बात बन जाएगी बल्कि दोनों को कॉमन ग्राउंड तलाशना होगा। तभी शांति की राह तैयार होगी।
चूंकि अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की कमी उन्हें सीधी बातचीत शुरू करने से रोक रही है। इससे पहले हुई सारे वार्ताएं नाकाम रही है और उनके दरम्यान ही अमेरिका-इस्राइल ने हमले शुरू कर दिए। ऐसे में तेहरान की हिचक समझी जा सकती है। लिहाजा, बातचीत पर आगे बढ़ने के लिए यह भी जरूरी है कि पहले ईरान पर हमले बंद किए जाएं। यह नहीं हो सकता कि ट्रंप संघर्षविराम का प्रस्ताव भेजें और साथ में पश्चिम एशिया में अपने सैनिकों की संख्या भी बढ़ाते जाएं। अब तक के संघर्ष ने इतना तो बता दिया कि ताकत के जोर से सिर्फ तबाही ही मिलेगी। ट्रंप को इस्राइल को भी हमले रोकने के लिए मनाना चाहिए, क्योंकि अगर एक भी पक्ष समझौते का पालन नहीं करता है. तो शांति को कोई मतलब नहीं रह जाएगा। कुलमिलाकर स्थिति जटिल है, और राहें मुश्किल, इसलिए चेत जाने में ही सबकी भलाई निहित है।







