“जन परिवाद समिति या ‘डांट दरबार’? महिला अधिकारियों की गरिमा पर सवाल”
“हरियाणा में बेटियों को अफसर बनाओ, फिर भरी सभा में अपमानित करो?”
– कमलेश भारतीय

जिस हरियाणा में नरेंद्र मोदी ने “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” का संदेश दिया, उसी प्रदेश में जन परिवाद समिति की बैठकों में महिला अधिकारियों के साथ सार्वजनिक व्यवहार कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या यह वही हरियाणा है, जहां बेटियों को आगे बढ़ाने और सम्मान देने की बात की जाती है?
कुछ समय पहले के एक घटनाक्रम में “दाढ़ी वाले बाबा” के नाम से चर्चित मंत्री अनिल विज ने एक महिला एसपी को जन परिवाद समिति की बैठक से बाहर जाने को कह दिया। कारण—महिला अधिकारी का यह कहना कि पुलिस नशा तस्करों को पकड़ती है, लेकिन अदालतें उन्हें बरी कर देती हैं। इस पर मंत्री का जवाब था—“मैं बाहर जाऊं या आप जाओगी?”
यह केवल एक सवाल नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक अपमान जैसा प्रतीत हुआ।
स्थिति यहीं नहीं रुकी। एक अन्य बैठक में एक महिला पुलिस अधिकारी पर केवल एक शिकायत के आधार पर तुरंत कर्मचारी को निलंबित करने का दबाव बनाया गया। अधिकारी ने नियमों का हवाला दिया कि यह अधिकार केवल एसपी के पास है, लेकिन उनकी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। भरी सभा में डांट-फटकार का सामना करती वह अधिकारी व्यवस्था की एक असहज तस्वीर पेश करती रही।
इस पूरे प्रकरण को लेकर पूर्व पुलिस अधिकारियों ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को ज्ञापन देकर स्पष्ट कहा कि मंत्रियों के व्यवहार पर नियंत्रण जरूरी है। क्योंकि यह केवल व्यक्तिगत गरिमा का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रशासनिक संतुलन और व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी विषय है।
हाल ही में मंत्री कृष्ण पंवार का एक बयान भी चर्चा में आया, जिसमें उन्होंने एक महिला अधिकारी से कहा—“आप महिला हैं, इसलिए अभी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे, लेकिन अगली बैठक में रिकॉर्ड सही कर लाना।” यह टिप्पणी भी कई मायनों में असहज और भेदभावपूर्ण प्रतीत होती है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि महिला अधिकारी भी इंसान हैं, उनसे भी गलतियां हो सकती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या उन गलतियों पर चर्चा का तरीका सार्वजनिक मंच पर अपमानजनक होना चाहिए? क्या बेहतर नहीं होगा कि इस तरह के मामलों पर कार्यालय में, गरिमा के साथ संवाद किया जाए?
जब बेटियों को पढ़ाकर, उन्हें अफसर बनाकर समाज में आगे बढ़ाया जाता है, तो उनके सम्मान की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। जन परिवाद समितियां जनता की समस्याओं के समाधान का मंच हैं, न कि किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाने का।
यदि संवाद में सम्मान और संतुलन बना रहे, तभी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच वास्तविक समन्वय स्थापित हो सकता है। वरना ऐसे दृश्य न केवल व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं, बल्कि समाज को भी गलत संदेश देते हैं।








