छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ पर अदालत सख्त, हिरासत में पूछताछ जरूरी
एडमिट कार्ड के नाम पर फर्जीवाड़े की कोशिश, CBSE ने किया खारिज
गुरुग्राम। शिक्षा के नाम पर बड़े फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है, जहां एक निजी स्कूल ने केवल 8वीं तक मान्यता होने के बावजूद 9वीं और 10वीं की कक्षाएं चलाकर अभिभावकों से फीस वसूली। जब बोर्ड परीक्षा का समय आया, तो छात्रों को एडमिट कार्ड तक नहीं दिए गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए प्रिंसिपल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सौरभ गुप्ता की अदालत ने आरोपी प्रिंसिपल रिदिमा शर्मा को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि आरोप बेहद गंभीर हैं और मामले की तह तक जाने के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है। रिदिमा शर्मा स्कूल चेयरमैन विनय कटारिया की पत्नी हैं, जिन्हें पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।
मामले की शिकायत राजेंद्र सिंह ने पुलिस को दी थी। उनका आरोप है कि उनकी बेटी का दाखिला स्कूल में यह कहकर कराया गया था कि संस्थान सीबीएसई से मान्यता प्राप्त है। स्कूल ने विभिन्न मदों में फीस भी वसूली, लेकिन परीक्षा से पहले एडमिट कार्ड जारी नहीं किए गए।
जांच में सामने आया कि स्कूल को केवल कक्षा 8 तक ही मान्यता थी, इसके बावजूद 9वीं और 10वीं की कक्षाएं चलाई जा रही थीं। इतना ही नहीं, छात्रों को अन्य स्कूलों में नामांकित दिखाकर एडमिट कार्ड लेने की कोशिश भी की गई, जिसे सीबीएसई ने खारिज कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल नियमों के उल्लंघन का नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ का है, जिसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विश्लेषण: शिक्षा या व्यापार?
गुरुग्राम जैसे विकसित शहर में इस तरह का फर्जीवाड़ा कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि किसी स्कूल को केवल 8वीं तक मान्यता थी, तो 10वीं तक की कक्षाएं लंबे समय तक कैसे चलती रहीं? यह शिक्षा विभाग की निगरानी प्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है।
आज के दौर में शिक्षा तेजी से व्यवसाय का रूप लेती जा रही है, जहां कई संस्थान गुणवत्ता और मान्यता के बजाय मुनाफे को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में अभिभावकों के लिए भी जरूरी है कि वे किसी भी स्कूल में दाखिला लेने से पहले उसकी मान्यता की आधिकारिक पुष्टि करें।
इस तरह के मामलों में सख्त कानूनी कार्रवाई—जैसे मान्यता रद्द करना, भारी जुर्माना और आपराधिक मुकदमे—ही भविष्य में इस प्रकार के फर्जीवाड़ों पर प्रभावी रोक लगा सकते हैं।
“जब शिक्षा ही धोखे का जरिया बन जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान केवल पैसों का नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के भविष्य का होता है।”








