हरियाणा राज्यसभा चुनाव: जीत के बाद भी क्यों थम नहीं रहा सियासी घमासान?

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— कमलेश भारतीय

हरियाणा विधानसभा में हुआ राज्यसभा चुनाव किसी तिलिस्म से कम नहीं रहा। जहां कांग्रेस को सीधे 37 वोट मिलने थे और जीत लगभग तय मानी जा रही थी, वहीं परिणाम इतना नजदीकी रहा कि पार्टी के उम्मीदवार बाल-बाल बचकर जीत दर्ज कर सके। महज़ कुछ अंकों के अंतर से मिली इस जीत ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को हिला दिया है।

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने इस पूरे घटनाक्रम के बाद इनेलो को कांग्रेस की “बी टीम” करार दिया। हालांकि, यदि इनेलो मतदान में हिस्सा लेती और समीकरण बदलते, तो कांग्रेस भी शायद यही आरोप भाजपा या इनेलो पर मढ़ती। ऐसे में इनेलो का मतदान से दूरी बनाना कई मायनों में रणनीतिक फैसला माना जा रहा है।

कांग्रेस ने इस चुनाव के बाद अपने ही पांच विधायकों के नाम सार्वजनिक कर दिए हैं, जिन पर क्रॉस वोटिंग का आरोप है। दूसरी ओर, चार वोट रद्द हो जाने से भी समीकरण बिगड़े। यदि भाजपा का एक वोट रद्द न होता, तो परिणाम पूरी तरह उलट सकता था। इसी को लेकर विधानसभा में कांग्रेस ने भाजपा पर “वोट चोरी” और “लोकतंत्र की हत्या” जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

वहीं भाजपा का पलटवार भी उतना ही तीखा है—पार्टी सवाल उठा रही है कि कांग्रेस पहले अपने घर को संभाले और स्पष्ट करे कि उसके विधायक “बिकाऊ” हैं या नहीं।

इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि कांग्रेस विधायकों को हिमाचल में “बाड़ेबंदी” के तहत रखा गया, लेकिन इसके बावजूद क्रॉस वोटिंग हुई। यह संकेत देता है कि राजनीतिक रणनीति काफी पहले से तैयार की जा चुकी थी।

कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने रिटर्निंग ऑफिसर पर भाजपा के पक्ष में काम करने का आरोप लगाया, जबकि अधिकारी ने सभी फैसलों को नियमों के अनुरूप बताया।

वहीं नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा को खुद पार्टी विधायकों के बीच उत्पन्न असंतोष को संभालने के लिए आगे आना पड़ा, जब कुछ विधायक पार्टी कार्यालय के बाहर धरने पर बैठ गए।

अब कांग्रेस ने पांच विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है, लेकिन पार्टी के भीतर असंतोष थमता नजर नहीं आ रहा। कुछ नेताओं का कहना है कि कुल नौ वोट इधर-उधर हुए, लेकिन कार्रवाई केवल पांच पर ही क्यों? यह सवाल पार्टी के भीतर गुटबाजी को और उजागर कर रहा है।

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि राजनीति में जीत ही सब कुछ नहीं होती—कभी-कभी जीत के बाद का संकट ज्यादा गहरा होता है।

भाजपा जहां इस नतीजे को अपनी रणनीतिक सफलता मान रही है, वहीं कांग्रेस के लिए यह “जीत में छुपी हार” जैसा अनुभव बन गया है। अगर भाजपा का एक वोट रद्द न होता, तो शायद कहानी बिल्कुल अलग होती और सतीश नांदल की “हैट्रिक” पूरी हो जाती।

फिलहाल, हरियाणा की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है और यह स्पष्ट है कि यह सियासी संग्राम अभी थमने वाला नहीं।

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Author: Bharat Sarathi

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